गज़ल
गज़ल
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दर्द का कैसा हम पर साया है
जिसको उल्फत करके पाया है।
साथ निभाने का करते थे वादा
मग़र बहुत ही धोखा खाया है।
जिनके खातिर अपनी खुशी लुटाई
उसी ने खूं के अश्क़ रुलाया है।
जिनकी बातें अमृत जैसी थीं
उसी ने हमको जहर पिलाया है ।
हमें छोड़कर तन्हा ज़ालिम ने
न जाने किसका घर महकाया है।
दिल पागल है नही मानता
बार-बार दिल को समझाया है।
रूठ गई हैं जो खुशियाँ मुझसे
इसलिए गमों को मैंने अपनाया है।
