दो नाव
दो नाव
समझाया था न मैंने तुम्हें,
दो नावों का सफ़र आसान नहीं होता,
जब नाविक एक हो तो नाव एक ही अच्छी लगती है,
मग़र तुम तो तुम हो,
कौन तुम्हें समझा सकता था भला,
तुमने वो चुना,
जो उस समय तुम्हें महान बना रहा था,
अब जब नाविक थकने लगा है,
तो अपनी नाव पर देता है पैर की ठोकर,
और चिल्लाता है उस लकड़ी की नाव पर,
जो बेजान, उसके चाबुक के इशारे पर किधर भी घूमने लगती थी,
अब भी वह नाव,
अपने नाविक के पैरों की ठोकर से पानी में इधर उधर बह निकली है ,
नाविक को सबसे आसान रास्ता यही लगा,
कि अपना सारा दोष डाल दे उस निर्जीव सी नाव पर,
जो उसके इशारे पर नाचने वाली गुड़िया मात्र थी,
वह नाव अगर बोल पाती,
तो बोलती कि मुझ पर ठोकरों से वार करने वाले मेरे नाविक,
मेरा दोष क्या था....?
यही कि जब तुमने चाबुक घुमाया,
मैं चल पड़ी तेरे इशारे पर,
अगर मैं भी हठी होती तो न मार पाता अपने ठोकरों से इस तरह मुझको,
और दूसरी चाबुक जब तेरे हाथ में देखी मैंने,
तभी रस्ता बदल लेती,
कसूर नाविक का होते हुए भी सज़ा नाव के हिस्से लिखी जा चुकी थी.....।।
Hera Faiyaz "Sahir"
