बिखरे तिनके – तिनकों में...
बिखरे तिनके – तिनकों में...
जब जिंदगी हर पल मुरझाती हो,
जब खामोशियां ही इक मात्र साथी हो..
जहां टुकड़ों–टुकड़ों में जिंदगी सिसकती हो,
जहां आत्मा हर पल रोती हो..
जहां अस्तित्व हर पल बिखरता हो,
जहां तेरा कोई वजूद ना हो..
जिन्होंने तुम्हें तुमसे ही छीन लिया हो,
जब जीवन की कोई राह बची ना हो,
जब बचा सिर्फ घूटन हो..
जहां अस्तित्व हर पल बिखरता हो,
जहां तुम्हारे होने पर ही सवाल उठाते हों..
जहां जिंदगी खुदकुशी करने को हर पल राजी हो,
जहां आंखों में आस कम, आंसू ज्यादा हो..
जहां आशाओं के परिंदे को काट दिया जाता हो,
जहां उड़ने से पहले ही उन्हें कैद कर दिया गया हो..
जहां अक्स हर पल बिखरे तिनके – तिनकों में,
जहां हर पल जीवन की टूटती डोर हो..
जहां सुनता ना हो कोई उन चीखों को,
जो गले में ही हर पल रुंध जाती हो..
जहां लूट लिया हो तुमसे जीने का अधिकार,
कर दो ऐसे जीवन का अंतिम त्याग...!
