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Darshtia Shah

Children Stories

3  

Darshtia Shah

Children Stories

बचपन

बचपन

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बचपन की तो बात निराली l

खेल कूद से फुरसत न पाई ll


मां का आंचल लागे प्यारा l

सबसे मीठा सबसे निराला ll


नादान भोली सी सुरत पाई l

सब ने है चाकलेट खिलाई ll


रोटी से पहले पिता की डांट खाई l

जब से बीच मे ही छोड़ दी पढ़ाई ll


बहनों का लाडला मैं भाई l

प्यार से राखी मैने बंधाई ll


छोटे भाई से हुईं हाथापाई l

मां ने उठक बैठक लगाई ll


जैसे ही दोस्त ने पुकारा l

मानो दिल को चैन आया ll


नाचते गाते दिन हैं बीतते l

हररोज नया कुछ सीखते ll


खेलने जाना अच्छा लगता l

पढाई से छुटकारा मिलता ll


न कोई फिक्र न कोई परेशानी l

बस हल्ला गुल्ला और मस्ती ll


पूरा दिन सायकिल चलाना l

पूरे गाँव में घूमना फिरना ll


गली गली में शोर मचाना l

और तालाब में खूब नहाना ll


नाचना कूदना एक ही काम l

दिल मे रटते राम राम राम ll


कभी गिली डण्डा खेलते l

कभी छुपा छूपपी खेलते ll


मासूमियत भरी मस्ती थी l

खुशियाँ एकदम सस्ती थी ll


कहानियों से दिल बहकता l

परी कथा से दिल मचलता ll


अनोखा सा था वो संसार l

दिल से निकलती रसधार ll


मुशिकल कभी न आई l

ममता की छांव है पाई ll


सपनों की बहती है कश्ती l

जीवन मे हरपल थी मस्ती ll



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