औरत
औरत
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गीली मिट्टी से एक घरौंदा
बना लेती है
अपने प्यार से घर को
संवार देती है वो।
सबको खुश रखकर
अपने मन को मार लेती है वो
झूठी हँसी ओढ़े
अपने ग़म छुपा लेती है वो।
सबकी खुशी के लिए
बहुत व्यस्त हूं
नहीं आ सकूंगी
यह कहकर माँ -बाप को
बहला देती है वो।
आँखों से बहते आँसू को
तिनका चला गया
कहकर छुपा लेती है वो।
पति के चेहरे पर आई
चिंता की लकीरें
पहचान लेती है
सब अच्छे से हो जाएगा
यह कह पति की चिंता
हर लेती है वो।
मेरे पास बहुत साड़ियाँ पड़ी है
नई लेने की जरूरत नहीं
यह कह, तीज त्यौहार मना
लेती है वो।
ये औरत है जनाब
अपने अरमानों का गला घोंट
सारे रिश्ते संवार लेती है।
