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रुठों को गर...

रुठों को गर मना लिया मंज़िलो को फिर क्या पूछते हो ग़ेरो का दर्द अपना लिया तो ख़्वाब नए क्यूँ बुनते हो राह किसी की बन सके मंज़िलो पे पहुँचा सके तो अब इतने सवाल तुम यू क्यूँ पूछते हो

By Aditi Goel
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