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मगर मेरी अर्थी पर, सारे शर्मिंदा लोग थे, मगर मेरी अर्थी पर, सारे शर्मिंदा लोग थे,
झूठ कहूँ या सच कह दूँ मैं समझ नहीं आता है कुछ भी। झूठ कहूँ या सच कह दूँ मैं समझ नहीं आता है कुछ भी।