कमल पुरोहित "अपरिचित" अपरिचित यानी जिसका कोई परिचय नहीं और जिसका परिचय नही उसके बारे में कुछ लिखना बेईमानी होगी। पहचान बस इतनी सी है भारत देश में जन्म हुआ और लेखन के शौक की वजह से साहित्य की दुनिया में कदम रखा है।
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गङ्गा जमुना सरस्वती सी प्रायः बहेगी अब बेटी। लक्ष्मी, दुर्गा भगवती का रूप धरेगी अब बेटी। राम नहीं आते है अब तो कृष्ण नजर न आते है। वध रावण और दुःशासन का स्वयं करेगी अब बेटी।
फटी हो जेब तो कुछ भी नहीं पॉकिट में रख सकते। कहीं भी ज़िंदगी का स्वाद फिर हम तो न चख सकते छुपा कर के नजर लोगों की हम निकले बजारों में। मगर इस हाल में ही लोग को हम हैं परख सकते।
फटी हो जेब तो कुछ भी नहीं पॉकिट में रख सकते। कहीं भी ज़िंदगी का स्वाद फिर हम तो न चख सकते छुपा कर के नजर लोगों की हम निकले बजारों में। मगर इस हाल में ही लोग को हम हैं परख सकते।
परिंदों सा नहीं, ख़्वाहिश मगर उड़ने की है मुझमें। चला हूँ मीलों ताकत फिर भी तो चलने की है मुझमें। अभी बौनी उड़ाने भर के नापी है मेरी ताकत। ज़रा कमजोर हूँ हिम्मत मगर भिड़ने की है मुझमें।
ज़िंदगी जीना नहीं आसान है ये जान लो। मुश्किलें राहों में मिलती ही रहेगी मान लो। मुश्किलें आसान जी लगने लगेगी उम्र भर। जज़्ब जीने का अगर तुम मन ही मन में ठान लो।
जरा सी गलतियां कितना हमें मज़बूर करती हैं। कि मंजिल तक पहुँचने पर भी उससे दूर करती हैं। कभी अनजाने में हो जाती है गलती जरा हमसे। सुधारे हम अगर इनको तो जीवन पूर करती हैं।
बुढापे की सनक में लोग कुछ कर जाते है ऐसा। ये जीवन सोच कर जीना, जहां जैसा लगे वैसा। जवानी में नहीं कर पाए वो कर लो बुढापे में। कभी इज़्ज़त कमा जाओ कमा जाओ कभी पैसा।