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MANSUKHBHAI GORDHANBHAI BHADELIYA

Others

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MANSUKHBHAI GORDHANBHAI BHADELIYA

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समाज और प्रेमिका

समाज और प्रेमिका

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देख के मेरे रंग-रुप काे, कहते थे

लाेग समाज के।

मिलेगी नहीं इश्क करनेवाली,

तुझे इस जमाने में बरसों तक।।


साेचता था दिल और मन से,

मिली इस पहचान पर।

नहीं चल सकता प्यार भरी राह में,

साथ न दे नसीब जब तक।।


फिर जिंदगी ने भरी उड़ान दिल से,

जब देखा सपनों की शहज़ादी को।

तक न दी ताकने की तब तक मुझे,

आ न गई नैनाें से वाे दिल के द्वार तक।।


महक उठा प्यार भरा बाग हमारा,

छोड़ के समाज काे तनहाई में।

जाने संसार काे ही स्वर्ग बना लिया,

वचन लिये आपस मे साथ रहेंगे जन्मों तक।।


फिर डर उठा दिल मेरा ये साेच कर,

रास ना आएगा प्यार हमारा जमाने काे।

साेचा कुछ नहीं हाेगा इस मोड़ पे,

मुझे भराेसा है ईश्वर और धर्म

पर युगों तक।

हसरतें भी हमारी बदल गई,

जब साथ जीने -मरने का वादा

किया जिन्दगी में।

सात फेरों के बंधन में जुड़ के,

जी रहे है समाज में खुशी से अब तक।।


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