वृतांत - ये तुम्हारा बस स्टैंड
वृतांत - ये तुम्हारा बस स्टैंड
छुट्टी पे आया हुआ हूँ , आज एक लंबे अरसे के बाद बस यात्रा कर रहा हूँ। पैतृक गाँव जाने की इस यात्रा के दौरान तुम्हारे शहर के बस स्टैंड पर बस बदलने के लिए बैठा हूं । और ना चाह कर भी मेरा मन समय यात्रा करके पीछे की ओर चला जा रहा है।
एक जमाना था जब इस बस स्टैंड पर उतरते ही तुम तक पहुंचने की चुलबुलाहट रहती थी , तुम्हारे घर के लिए रिक्से पर बैठे गुजरने वाले वो पच्चीस मिनट सबसे ज्यादा उत्साहित करने वाले और उमंग से भरे होते थे । ऐसा मौका साल में सिर्फ एक या कभी कभी दो बार ही आता था जब कि मुझे अकेले गांव जाने कि जरूरत पड़ती थी और मै जबरदस्ती अपनी यात्रा योजना में एक दिन या बारह - तेरह घंटे तुम्हारे घर आने के लिए जुटा ही लेता था आखिर दूर की रिस्तेदारी जो थी ।
क्या अजब उम्र थी वो और क्या गजब संयोग था मेरा तुमसे उस रिश्ते का । तुम मेरी और मै तुम्हारा , पहला और आखिरी प्रेम तो नहीं था जिसके लिए ज्यादा लिखा जाए , पर तुम्हारे साथ बिताए गए उन पलो के वो एहसास जरूर पहले और आखिरी थे जो फिर शायद कभी किसी के भी साथ होने पर नहीं आए।
समय वास्तव में बलवान है ,आज जब मै तुम्हारे इस शहर के बस स्टैंड पे बैठ कर अपनी अगली बस का इंतजार कर रहा हूं , तब तुम 2 बच्चों की मां हो और तुम्हारे व्हाट्सऐप स्टेटस पर तुम्हारे सातवें करवाचौथ के कुछ पल लगे हुए है।
पता नहीं क्यों आज ये नई राज्य सरकार द्वारा बनाई गई इतनी भव्य नव निर्मित बस स्टैंड की इमारत भी मुझे उस समय की गन्दी और जगह जगह गुटका थूंकी हुई जर्जर इमारत से बेहतर नहीं लग पा रही । पता नहीं क्यों ये सवारियों को भरने वाले बस कंडक्टर्स की आवाजे भी इतनी जोशीली नहीं रही अब, ऐसा लग रहा है जैसे इस शहर का सारा कोलाहल ही ख़तम हो गया हो। एक तुम्हारा, इस शहर में होना भर क्या इतना मायने रखता था ?
अभी भी जिंदा आँखों में ख्वाब सा चल रहा है कि मै अगली बस की जगह अगर तुम्हारे घर के लिए तीन पहिये वाला रिक्सा ( जो कि अब बैटरी वाला है ) पकड़ लूं , तो तुम मुझे अपनी चमकीली आंखे लिए और मंद-मदहोश सी मुस्कान लिए लाल सूट पहन कर मेरा इंतजार करती मिल जाओगी और हम फिर से एक एक शिप लेकर अपने चाय के कप बदल लेंगे। अगले दिन किसी ऐसी ही पारिवारिक शादी में चलकर मस्ती करेंगे जहां "तुम मुझे चौदह साल पहले एक इत्तेफाक से मिली थी"...........।
