तांत्रिक अघोरानंद- 1
तांत्रिक अघोरानंद- 1
अंधेरी रात का वक़्त ! मसान घाट में दो चिताएं चल रही है ! लकड़ी के जलने की आवाज के बीच में मांस के चटचटाने की आवाज ! सांय सांय कर रहे मसान का पूरा इलाका जलते हुए मांस की बदबू से भरा हुआ था |
दारू की बोतल को हलक में गड़ा कर डोम नदी के किनारे सोया हुआ था | उसे मालूम था कि अब सारी रात उसका कोई काम नहीं है | फिर सुबह होगी ! फिर लाशें रह जाएंगी ! फिर वही काम ! सारी दुनिया से बेखबर अप्रिय से लगने वाले लेकिन हर एक की अंतिम यात्रा के लिए सहायक कार्य को करने की व्यवस्था का काम !
यहां उस कार्य को करते हुए पैदा हुई निर्लिप्तता कहें या वैराग्य ! उसे जैसे सारी दुनिया से कोई लेना-देना नहीं था | कोई नहीं जानता था कि वह कहां से आया है ? कोई नहीं जानता था कि वह किस गांव का रहने वाला है ? कोई भी नहीं जानता कि कब से वह श्मशान भूमि में डटा हुआ है | उम्र साठ के ऊपर और बलिष्ठ देह का स्वामी “बाबा”, हाँ सभी उसे बाबा ही कहते थे ! श्मशान में पिछले तीन चार दशकों से विराजमान था | वहां के चप्पे-चप्पे से वाकिफ था | हर लाश के साथ उसकी दारु की व्यवस्था भी रहती थी | नित्यप्रति उसका कोटा पूरा होता और वो तान कर जमीन पर कहीं भी सो जाता | पथरीली जमीन भी उसे बिस्तर जैसी ही लगती थी और इतने सालों की आदत और श्मशान भूमि की मूलभूत प्रवृत्ति ने उसे भी पत्थर बना दिया था | सुबह जब तक सूरज की रोशनी इतनी तेज नहीं हो जाती कि उठने की मजबूरी आ न पड़े वह आराम से पड़ा रहता, और क्योंकि सब उसकी आदत जानते थे कोई उसे परेशान भी नहीं करता था |
ऐसे ही दिन गुजर रहे थे, और बाबा की जिंदगी भी खामोशी से आगे बढ़ती जा रही थी | ! मैंने 16 वर्ष की उम्र में अपने गुरु अखिलेश्वरानन्द जी से दीक्षा प्राप्त की थी | नदी के किनारे एक पुराना काली मंदिर था, जिस में प्राचीन शिवलिंग स्थापित था | वह मेरा प्रिय स्थान था ! मेरी साधना का सबसे महत्वपूर्ण कालखंड ! जब मैं साधना का ककहरा पढ़ रहा था उस समय मेरा अधिकांश समय वहीँ गुजरता था | मैं अपने क्षमता के अनुसार धीरे धीरे साधना के पथ पर आगे बढ़ रहा था और कोशिश करता था कि जब भी संभव हो गुरु के पास कुछ समय बैठकर उनसे ज्ञान ले सकूँ | लेकिन ऐसा अवसर साल में एक दो बार ही मिल पाता था | ग्रहस्थ जीवन में रहते हुए थोड़ी बहुत साधना तो हो जाती थी लेकिन वह इतनी पर्याप्त नहीं थी जिसे साधनात्मक रूप से सफलता के लिए आवश्यक समझा जा सके | शायद गुरुवर भी मेरी दशा को समझ रहे थे और उन्होंने मुझे कभी भी किसी निर्धारित संख्या में मंत्र जाप के लिए नहीं कहा | वह बस इतना कहते थे कि जितनी तेरी शक्ति है उतनी ही कर ले | इतना सुनकर मैं जान बची तो लाखों पाए ऐसा सोचकर वहां से वापस आ जाता था |
मै अपनी इच्छा और क्षमता के अनुसार काम करता , मेरी जिंदगी ऐसे ही बेहद शांतिपूर्ण ढंग से चल रही थी | मेरी शादी इक्कीस साल में हो गयी थी |सरकारी नौकरी से इतनी आमदनी हो जाती थी कि आराम से मेरा और मेरी पत्नी का खर्चा चल जाता था | नई-नई शादी थी ! यौवन की मांग भी और साथ ही वासना की प्रचंडता भी ! पत्नी माला अद्भुत देहयष्टि की स्वामिनी थी | उसका हर अंग सांचे में ढला हुआ था था ! उसके उन्नत वक्ष आमंत्रण देते हुए प्रतीत होते थे और कब मैं उसमें समा जाता था और अपने आप को खो देता था , यह हमें कभी समझ नहीं आया | इसी प्रणय के बीच हमारा समय व्यतीत होता गया |
विवाह के लगभग 5 वर्ष के बाद भी माला गर्भवती नहीं हो पाई और लोगों ने ताना मारना शुरू कर दिया | इसके साथ हमारे यौन जीवन में भी धीरे-धीरे इस निराशा ने घर करना चालू कर दिया | लगातार इलाज के बाद भी कोई विशेष लाभ नहीं हुआ | सभी तरह की जांच में कोई कमी दिखाई नहीं देती थी | माला की माहवारी भी नियमित थी और मेरे शुक्राणुओं की संख्या भी पर्याप्त थी | लेकिन बात कुछ आगे नहीं बढ़ पा रही ऐसे ही धीरे-धीरे वक्त गुजरता जा रहा था |
हमारे जीवन में अब निराशा भी घर करने लगी थी ! माला मुझसे ज्यादा दुखी रहती, मैं उसे समझाने की कोशिश करता ! लेकिन कभी-कभी खुद भी उदास हो जाता | जब विषाद और निराशा धीरे धीरे मानव को अंदर से काटना चालू करें तो वह धीरे धीरे गलता जाता है | अंदर ही अंदर बढती पीड़ा से उसकी काली आँखों के नीचे कालिमा छाने लगी | कमजोरी उसपर हावी होने लगी और एक दिन उसने बिस्तर पकड़ लिया | बड़े बड़े डॉक्टरों से इलाज कराया मगर हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती चली गयी | देह का रोग कोई पकड़ नहीं पा रहा था और मन का रोग लाइलाज होता चला गया |
सावन का महीना चल रहा था और अमावस्या का दिन था | मैं सुबह हाथ मुह धोकर बरामदे तक आया और सामने जो दृश्य दिखा उसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी | मैंने देखा एक नागा साधु जो लगभग 6 फुट का था और हट्टे-कट्टे मजबूत बदन का मालिक है वह सामने खड़ा है | उसकी आंखों से तेज प्रवाहित हो रहा था | मैं आगे बढा और उस दिव्य साधू के सादर चरण स्पर्श किए |
साधु ने आशीर्वाद दिया और पूछा “ भोग पूरा हो क्या ? पूरा हो गया हो तो अब योग की ओर चलें ? | मेरी समझ में कोई बात नहीं आई लेकिन न जाने किस भावना के वशीभूत मेरा सिर हां की सहमति में हिलाया |
बाबा ने हल्की हंसी के साथ मेरे सर पर हाथ फिराया और कहा “ठीक है ! यहां से तेरी यात्रा शुरू होगी ! विचलित मत होना ! बहुत ज्यादा उम्र बहू की नहीं बची है ! नियति को स्वीकार कर और अपने निर्धारित मार्ग पर आगे चल !” इतना कह बाबा तेजी से एक और निकल गए .......
माला की लंबी बीमारी ने मुझे मानसिक रुप से शायद आघात के लिए तैयार कर दिया था | मैं भी यह स्वीकार करने की स्थिति में आ गया था कि अब माला और मेरा साथ बहुत लंबा नहीं | साधु बाबा की बात ने मेरे इस विचार पर मोहर लगा दी | मैंने जितना हो सका सेवा की लेकिन माला की हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती चली गई और जन्माष्टमी की रात को उसने अपनी देह छोड़ दी.......
मैं अकेला रह गया दुख के बादल मेरे ऊपर फट पड़े ! मैं अपनी प्यारी माला को खो चुका था ! उसके साथ बिताए खूबसूरत पल मेरे जहन में तैरते रहते !
मैं पागलों की तरह रात रात भर जागता...................
उस आनंद की तलाश करता जो मैंने उसके साथ महसूस किया था !
