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Adwitiya Abhishek Kumar

Children Stories


4.5  

Adwitiya Abhishek Kumar

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सच्चे साथी माता-पिता

सच्चे साथी माता-पिता

5 mins 332 5 mins 332

यह कहानी एक पच्चीस साल के युवक की है जो अपने माता-पिता के साथ रहता था। उसका नाम आरव था। आरव अपने माता–पिता के साथ रह कर भी उनके लिए समय कभी नहीं निकालता था। उसके माता-पिता तो अपने बेटे के घर में रह कर भी अकेला महसूस करते थे, किन्तु अब वे करते भी क्या जब उनका बेटा अपने माता-पिता से ज़्यादा मित्रों को महत्व देता था। वह पूरा दिन अपने कामों में और अपने मित्रों के साथ पार्टी करने में व्यस्त रहता। जो समय शेष रहता वह उस समय अपने माता-पिता से बात न करके, मोबाईल में व्यस्त रहता।

एक दिन आरव के माँ को पेट में बहुत दर्द होने लगा, उसके पिता ही माँ का ध्यान रखते थे लेकिन जब उनकी तबीयत बहुत बिगड़ने लगी तो उन्होंने आरव से कहा, “बेटा तुम्हारी माँ कि तबीयत ठीक नहीं है तो मैं सोच रहा था कि हमें एक बार डॉक्टर से भी बात कर लेनी चाहिए।” तो इस बात पर आरव ने मोबाईल में देखते हुए कहा, “तो जा के डॉकटर से पूछ लीजिए, इसमें मैं क्या करूँ?” आरव यह कहते हुए वहाँ से चला गया।

कुछ समय बाद आरव के माता- पिता अस्पताल गए। वहाँ डॉक्टर ने कहा की आरव कि माँ का ऑपेरेशन करना पड़ेगा। किन्तु जितने पैसे ऑपेरेशन करने के लिए चाहिए थे उतने पैसे नहीं थे उनके पास। तब उन्होंने आरव से पैसे की बात की, आरव ने उन्हें झटकते हुए कहा, “ आपके पेंशन है आपके पास... उससे अस्पताल के पैसे भर दीजिए। ” पिताजी ने आरव के पास जाते हुए कहा, “ पर पेंशन के पैसे तो घर खर्च में ही खत्म हो जाते हैं। ” आरव ने बात को वहीं समाप्त करते हुए कहा, “ मैं वो सब नहीं जनता। मेरे पास पैसे कहाँ हैं?” यह कहकर आरव वहाँ से मोबाईल में देखते-देखते चला गया और उसके पिता बहुत निराश हो कर चले गए। अब आरव के पिता पैसों कि व्यवस्था के लिए पैसे कमाने के लिए काम मांगते।

एक दिन आरव के पिता जी काम ढूंढते हुए दूर चले गए। उन्हें एक आदमी ने देखा और सोचा, “ इनकी की बोली किसी अच्छे और पढे-लिखे व्यक्ति की तरह है। कपड़े भी अच्छे हैं, तो वे लोगों से पैसे क्यूँ मांग रहे हैं? पूछता हूँ।” तो उसने उन्हें बुलाकर इसका कारण पूछा, तब आरव के पिताजी ने बताया कि, “ मेरी बीवी कि ताबीयत ठीक नहीं है और ऑपेरेशन कराने के लिए पैसे नहीं, तो लोगों के कुछ काम करता हूँ और पैसे लेता हूँ। अगर तुम्हें भी कुछ काम हो तो बताओ, मैं तुम्हारा वह काम कर देता हूँ।” उनकी यह बात सुनकर उस युवक का हृदय रो पड़ा। उस आदमी ने पिताजी से पूछा कि उन्हें कितने पैसे चाहिए, और जितने पैसों की ज़रूरत थी उतना आरव के पिता ने बताया। उस दयालु ने उन्हें पूरे पैसे दे दिए। आरव के पिता ने जब पैसे लौटने कि बात की तो उसने मना कर दिया और वहाँ से चला गया। कुछ दिनों के बाद आरव की माँ अस्पताल से स्वस्थ लौट आईं।

कुछ समय बाद आरव की बाईक एक बड़े गाड़ी से टकरा गई जिस कारण वह बहुत गंभीर हालत में अस्पताल लाया गया और अब उसके इलाज के लिए बहुत पैसों कि ज़रूरत थी। क्योंकि आरव जितने भी पैसे कमाता था, उन्हें अपने मित्रों के साथ पार्टी करके उड़ा देता था तो उसके पास कोई बचत नहीं थी।

फिर भी आरव ने चिंतमुक्त कहा कि उसके मित्र पैसे दे देंगे किन्तु सिर्फ दो-तीन मित्रों ने ही पैसे दिए। यह देखकर आरव को बहुत बुरा लगा कि उसके सभी मित्रों को वह पार्टी तथा उपहार देकर अपने सारे पैसे खर्च करता लेकिन आज जब उसे पैसों कि ज़रूरत पड़ी तो सिर्फ दो-तीन दोस्तों ने ही दोस्ती निभाई।

इस लाचार स्थिति में उसकी माँ ने अपने गहने बेचने की बात की किन्तु पिताजी ने मना करते हुए कहा, “ जब तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं थी तब मैंने भी यह सलाह दी थी, तो तुमने मना कर दिया और अब उन्हें बेचने तो तैयार हो गई?” उसकी माँ ने जवाब दिया कि उन्होंने वे गहने आरव कि शादी के बाद उसकी पत्नी के लिए रखे थे।

किन्तु जब गहनों से मिलने वाले पैसे भी कम पड़ तो आरव ने कहा, “मेरे बॉस बहुत अच्छे हैं, वे ज़रूर मेरी मदद करेंगे। ” उसके यह कहते ही उसके पिताजी ने उसके बॉस को फोन किया और पूरी बात बताई। यह सुनकर बॉस स्वयं अपने पैसे लेकर आए और आरव के पिता को देखकर चकित हुए, “अरे आप?” आरव के पिता भी चकित हो गए, “आप मेरे बेटे के बॉस हैं?” आरव को कुछ समझ में नहीं आया और पूछा कि वे दोनों एक-दूसरे को कैसे जानते हैं, बॉस ऊग्र स्वर में बोले, “तुमने अपनी माँ कि मदद नहीं की तब मैंने की थी इसलिए वे मुझे जानते हैं। लेकिन मुझे तुमसे ऐसी उम्मीद नहीं थी।”

आरव के लिए जितने पैसे चाहिए थे वो सारे पैसे आरव के बॉस, माता-पिता, और दो-तीन दोस्तों ने मिलकर दे दिए। इस पूरी घटना के बाद जब आरव ठीक हो गया तब उसे बहुत बुरा लगा कि उसके लगभग सारे मित्रों ने तो साथ छोड़ दिया लेकिन माता-पिता और कुछ सच्चे दोस्तों ने साथ नहीं छोड़ा। माँ तो अपने गहने तक बेचने को तैयार हो गईं वो भी इसलिए ताकि आरव ठीक हो जाए। उसे ज़्यादा बुरा तब लगा जब उसे याद आया कि उसने तो अपनी माँ के लिए पैसों नहीं दिए।

इन सब से हमें यह सीख मिलती है कि हम डिजिटल दुनिया और दिखावे के दोस्तों के चक्कर में फँसकर अपने सच्चे संबंधों से दूर हो जाते हैं।


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