राहें तेरी बहुत कठिन हैं
राहें तेरी बहुत कठिन हैं
कितने झंझावात सहूँ,प्रतिपल कितने आघात सहूँ?
एक खुशी पाने की खातिर जग में कितने मात सहूँ?
यद्यपि राम नहीं हूँ मैं पर पथ का उनके अनुगामी,
सहकर कष्ट अनेकों ही,कुल का अपने हितकामी,
फिर भी कुटुम्ब न समझ सका,प्रभु आकर तुम समझा जाओ,
राहें तेरी बहुत कठिन हैं,आकर सरल बना जाओ,
लक्ष्मण कोई साथ नहीं, कोदण्ड भी कोई हाथ नहीं,
सामर्थ्य नहीं हर पीड़ा सह लूँ, ज्ञान नहीं खुद को मैं कह लूँ,
घर पर रहना भी मुश्किल है, जंगल जाना भी मुश्किल है,
प्रतिदिन निर्बल मैं होता हूँ,आकर सबल बना जाओ,
राहें तेरी बहुत कठिन हैं,आकर सरल बना जाओ,
मति मरी मन्थरा की थी,पर वह एक अकेली थी,
एक कैकेयी ही थी,जिसकी वह परम सहेली थी,
पर आज मरी है मति सबकी,हर कोई उलझा स्वारथ में,
कौन चाहता है जीना,इस जग के पर स्वारथ में,
सही गलत के दोरस्ते पर उलझा खड़ा जमाने में,
राह चलूँ मैं कौन यहाँ, आकर प्रभु बता जाओ,
राहें तेरी बहुत कठिन हैं,आ करके सरल बना जाओ।
अमलेन्दु शुक्ल
सिद्धार्थनगर उ०प्र०
