निधि :द सीक्रेट आइडेंटिटी
निधि :द सीक्रेट आइडेंटिटी
SERIES-THE SECRET IDENTITY
CHAPTER-THUNDER LINES
WRITER-AMAN AJ
EDITING-OM GODARA
यह कई कहानियों की एक सीरीज है, जिसकी पहली कहानी THUNDER LINES है। इस भाग में आप THUNDER LINES के आसपास तक की कहानी देखेंगे।
कहानी की शुरुआत से पहले कुछ महानुभावों के शब्द
“यह जो दुनिया हमें दिखायी देती है यह हमारी ही सोच का प्रभाव है। हमारी सोच को बदले बिना हम इस दुनिया को नही बदल सकते।” – ALBERT EINSTEIN
“ऐसे लोग जो अपनी सोच को नहीं बदल सकते वे लोग कुछ नहीं बदल सकते।” – GEORGE BERNARD SHAW
“जो इस दुनिया को आगे ले जाना चाहता है, सबसे पहले उसे आगे बढ़ने दीजिये।” – SOCRATES
इंसान की गणना उस बात से की जाती है की वह ताकत मिलने के बाद क्या करता है।” – PLATO
जब आपकी इच्छा बलवान और उचित हो तब आप आसानी से उसे पाने के लिये अलौकिक ताकत पा सकते हो।” – NAPOLEON HILL
और अंत में….
“प्रकृति अति खूबसूरत चीज है। यह नियम और विज्ञान द्वारा परीबध्द है।” – लार्ड इरविन
कहानी के सभी दृश्य, पात्र, घटनाएं काल्पनिक है। इसका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई लेना-देना नहीं। अगर कहीं भी किसी तरह की समानता पाई जाती है तो यह सिर्फ और सिर्फ संयोग मात्र हैं। यह कहानी किसी की भी धार्मिक भावनाओं को आहत नहीं करती ना ही लेखक का औचित्य इस तरह का है।
CHAPTER-1
निधि और उसके मां-बाप की मृत्यु ।
“कहते हैं वक्त कभी किसी का साथ नहीं देता, ना ही सबका वक्त एक जैसा होता है। कुछ लोग वक्त आते ही ऊँचाइयां छू लेते हैं, तो कुछ लोग वक्त आते ही गर्त में चले जाते हैं। यह वक्त हमेशा अपने अनोखे खेल खेलता रहता है, कुछ लोग इस खेल के राजा बन जाते हैं तो कुछ लोग रंक…...”
गोवा,
एक खूबसूरत घर के बाहर का परिदृश्य।
पार्क की हरी घास पर लेटी एक मासूम 10 साल की लड़की अपने नाजुक हाथों से घास की बारीक हरी पत्तियों को उखाड़ रही थी। आस पास ठंडी हवा चल रही थी। सुबह का सूरज अभी अभी निकला था। 10 साल की लड़की ने एक सफेद रंग की बलयिन और छोटी निक्कर पहन रखी थी। उसके बाल भूरे रंग के थे और कटिंग डिजाइनदार, बालों का एक छोटा सा हिस्सा माथे पर भी था। आँखें नीले रंग की और गहराई से भरी हुई। चेहरे का तेज देखकर भविष्य में उसके प्रभावी व्यक्तित्व होने का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता था।
इतने में अंदर से एक साड़ी पहने औरत दूध का गिलास लेकर बाहर आई—“निधि अरे बेटा निधी…. लो दूध पी लो" वह बोली और उस लड़की के बगल में ही बैठ गई।
“नहीं मम्मा…. मुझे नहीं पीना” छोटी लड़की निधी ने कहा।
औरत ने अपने हाथों से उसे पास खींचा और अपनी गोद में ले लिया। वह उसके लंबे बालों को सहलाते हुए बोली—“ऐसे कैसे चलेगा बेटा, अगर दूध नहीं पिओगी तो बड़ी कैसे होगी…. और अगर बड़ी नहीं होगी तो पापा की तरह काम कैसे करोगी"
यह बात सुनते ही छोटी लड़की ने गुस्से वाला मुंह बना लिया। वह गुस्से से बोली "मुझे नहीं पापा की तरह काम करना, पापा बहुत गंदे हैं"
औरत मुस्कराई "नहीं बेटा नहीं, तुम्हारे पापा जो काम करते हैं वह इतिहास में सुनहरे अक्षरों से अंकित किया जाएगा। अहहहहह देखना जब तुम अपने पापा के नक्शे कदमों पर चलोगी तो तुम्हारा नाम भी….."
अचानक हॉर्न की एक आवाज़ ने औरत की बात को बीच में ही रोक दिया। निधि गोद से आकस्मिक खड़ी हुई और बाहर की तरफ भागने लगी। "पापा, पापा" वह रास्ते में ही चिल्ला रही थी।
गाड़ी की खिड़की बंद होने की आवाज़ के साथ काले कोट पेंट में एक आदमी नजर आया। आँखों पर काले चश्मे, भूरे बाल, उम्र तकरीबन 35 के आस-पास। उसने अपने दोनों हाथ फैलाए और निधि को गले से लगा लिया।
"अरे मेरी प्यारी बेटी, मेरी दुलारी बेटी, my one of the best think of world, ooh nidhiiiiiiii….." गले लगाने के बाद उसने अपना प्यार दिखाया। "wait just a minute, I have something for you" वह वापिस कार की तरफ मुड़ा और एक बड़ा सा टेडी बेयर बाहर निकालकर निधि को दें दिया।
टेडी बेयर देखते ही निधि उछल पड़ी। "वाव,दिस इस ग्रेट पापा"
उसने टेडी बेयर लिया और टेडी बेयर लेकर पूरे पार्क में गोल गोल घूमने लगी।
"निधि कितनी खुश है ना" औरत वीडियो कैमरा निकालकर निधि की वीडियो बनाने लगी।
आदमी ने अपने चश्मे उतारे और तंज कसा "हां, आखिरकर बेटी किसकी है। एक दिन अपने पापा का नाम रौशन करेगी ..."
"लेकिन!!" औरत के चेहरे पर असंतोषजनक लकीरें उभर आई।"वह आपको तो पसंद करती है, पर!!" वह बीच में ही रुक गई।
"पर क्या ??"
"पर!! वह आपको तो पसंद करती है पर आपके काम को बिल्कुल भी नहीं। आपका जासूसी वाला काम उसे पसंद नहीं। उसे लगता है यह जासूसी का काम आपको महीनों महीनों अपने परिवार से दूर रखता है। आप अपने इस काम में ना तो खुद को समय दे पाते है ना ही अपने परिवार को"
"बड़ी होने के साथ-साथ वह सब कुछ समझ जाएगी" आदमी हँसकर बोला "वक्त कभी किसी का साथ नहीं देता, हालात और किस्मत यह दोनों ऊपर वाले के हाथ हैं" इतना कहकर वह अंदर चला गया।
औरत ने वीडियो कैमरा चलते हुए नीचे रखा और वह भी पीछे-पीछे अंदर चली गई।
"मैं आपके लिए चाय बनाऊं..?" औरत ने अंदर जाकर पूछा।
"हां, लेकिन मीठा कम रखना" जवाब में आदमी बोला।
दोनों के अंदर जाने के बाद निधी भी बाहर नहीं रुकी और वह भी टेडी बेयर के साथ अंदर आ गई। अंदर आने के बाद अपने टेडी बेयर के साथ आदमी के बगल में ही बैठ गई।
आदमी ने बगल में बैठी निधी को गोद में लिया और गुदगुदी करने लगे। "अच्छा, तो मेरी बेटी को अपने पापा का काम पसंद नहीं, क्यों" गुदगुदी के कारण निधि खिलखिला कर हँस पड़ी। थोड़ी देर ऐसे ही रहने के बाद उसने खुद को अपने पापा के चंगुल से छुड़ाया और बाहर की तरफ भागने लगी।
आदमी भी उसके पीछे पीछे भाग पड़ा "मुझसे बचकर नहीं जा सकती छिपकली…"
दोनों दौड़ते दौड़ते पार्क में आ गए जहां कैमरे के आगे आदमी ने उछलकर निधी को दबोच लिया। "देखा!! मैंने कहा था ना मुझसे बचकर नहीं जा सकती"
"हां पापा, I LUV U" वह मासूमियत से बोली।
उनकी यह सारी बातें कैमरे में रिकॉर्ड हो रही थी, उनका भागना, खेलना और यह लव यू वाला सीन।
अपनी बेटी के मुँह से लव यू सुनने के बाद पिता ने उसके माथे को चूमा और बोले" लव यू टू बेटा... लव यू टू"
पीछे से निधि की माँ भी चाय के कप के साथ बाहर आ गई "कमाल है, बाप बेटी अपने प्यार में माँ को तो भूल ही गए"
निधि और पिता दोनों यह सुनकर हँसने लगे।
कहते हैं वक्त सभी का एक जैसा नहीं रहता….. और यही सच है।
अचानक "धाएं" स्नाइपर की एक गोली चली और सीधे निधि की माँ के सर के आर पार हो गई। उनके हाथ में पकड़ी चाय की ट्रे गोली लगते ही नीचे गिर पड़ी।
"धाएं" एक और स्नाइपर की गोली चली और उस आदमी के सर को अपना निशाना बनाया। गोली उनके भी सीधे सर के आर पार हो गई।
निधि जोर से चीख पड़ी। डर के मारे वह दुबक कर अपने पापा की लाश के अंदर ही सिमट गई और खुद को ज़मीन के बिल्कुल नज़दीक कर लिया। इसके बाद तीसरा फायर हुआ जो निधि के लिए था। लेकिन निधि इतनी छोटी सी जगह पर सिमटी हुई थी कि निशाना सही से लगा नहीं। उसने निधि की बजाय उसके टेडी बेयर को निशाना बनाया।
थोड़ी देर बाद सब कुछ थम चुका था। वक्त भी…. और दो लोगों की सांसे भी। एक लाश सीढ़ियों पर पड़ी थी... और एक लाश बिल्कुल निधि के बगल में….। आज एक बेटी के सर से उसके माँ -बाप का साया उठ गया।
रात के अंधेरे में तेज़ बारिश हो रही थी। समय तकरीबन 11:00 बजे का होगा। लोगों की लंबी कतार ताबूत के दोनों और थी। कब्रिस्तान में पादरी अपने शब्द पढ़ रहा था। "भगवान जो भी करता है अच्छा करता है। वह संदेश लोगों की भलाई के लिए, अपने सुनियोजित कदम उठाता है। भगवान की शक्ति अपरंपार है, भगवान सब का देन दाता हैं। "
इसके बाद पादरी ने कुछ सुनहरे शब्द कहे
"Father of all, we pray to you for N., and for all those whom we love but see no longer. Grant to them eternal rest. Let light perpetual shine upon them. May his soul and the souls of all the departed, through the mercy of God, rest in peace"
अपने शब्दों के आखिर में पादरी ने थोड़ी सी मिट्टी कब्र पर गिरा दी। इसके बाद बाकी के सदस्य भी एक-एक कर थोड़ी-थोड़ी मिट्टी कब्र पर गिराने लगे। आँखों को भिगोने वाला एक अंत्यंत ही संवेदनशील दृश्य था। सबके मिट्टी डालने के बाद अंत में निधि बची थी। उसके हाथ में अभी भी टेडी बेयर था। अपने लड़खड़ाते हुए कदमों से वह धीरे धीरे आगे बढ़ी और उसने भी मिट्टी कब्र पर गिरा दी। उसकी आँखों से आँसू झलक रहे थे।आसमान में हो रही बारिश उसके शरीर को भिगो रही थी।
इस पूरे परिदृश्य को दूर से कुछ आदमी देख रहे थे। सभी ने काले कोट पेंट वाले कपड़े पहन रखे थे और आँखों पर काले रंग के चश्मे भी लगे हुए थे। निधि के मिट्टी गिराने के बाद उन लोगों के समूह में से एक आदमी निकल कर आगे आया और आकर निधि के पास खड़ा हो गया। आदमी रोबदार था, चेहरे पर हल्की काले रंग की दाढ़ी, उम्र तकरीबन 40 साल के आसपास। हाथ में एक छाता था जो उसे बारिश के पानी से बचा रहा था। उसने निधि के कंधे पर हाथ रखा और कहां"डोंट वरी माय सन, भगवान जो भी करता है अच्छे के लिए करता है।" फिर उसने आसमान की तरफ देखा। "जिस तरह चाँद की रौशनी अंधेरे में एक उम्मीद की किरण का काम करती है, वैसे ही तुम इस दुनिया के लिए एक मिसाल बनोगी, तुम्हारे पापा, उन्होंने समाज भलाई के लिए बहुत कुछ किया है। अब तुम भी उनके लक्ष्य कदमों पर चलोगी। ब्रह्मांड में जब भी किसी बड़ी हस्ती का खात्मा होता है तो उसकी जगह लेने के लिए नई हस्तियां पहले से ही तैयार रहती है। यह प्रकृति का नियम है। ... आओ!! आज से तुम मेरी जिम्मेदारी हो"
उन्होंने निधि की पीठ को सहलाया और उसे पीछे खड़ी गाड़ियों की तरफ ले जाने लगा।
"कुदरत को समझना किसी के लिए भी संभव नहीं। यह अपने हर नए मोड़ पर इंसान को चौंका देती है।" वह लगातार बोलते जा रहा था लेकिन निधि, उस पर इसका कोई प्रभाव नहीं था। वह सिर्फ और सिर्फ सिसक रही थी। सिर्फ और सिर्फ सिसक…
बारिश के पानी में यह तक भी नजर नहीं आ रहा था कि उसकी आँखों से आँसू निकल रहे हैं या नहीं।
कहते हैं अल्फाज सब कुछ बयान कर देते हैं... लेकिन मेरे पास यहां शब्द नहीं है जो इस वक्त निधि के हालात बयां कर सके।
9 साल बाद।
CHAPTER-2
निधि और उसका पहला केस
कमरे के बाहर एक आवाज़ जोर जोर से गूंज रही थी।
"निधि"
"निधि"
"निधि"
"उठो निधि"
"उठो"
"सुबह के 10:00 बज गए"
"कब तक सोती रहोगी"
कमरे के अंदर मखमली बेड में लंबी अंगड़ाई लेकर निधि ने आह भरी "क्या अंकल, ठीक से सोने भी नहीं देते"
"पिछले 16 घंटों से सो रही हो, अब और कितना सोना है तुम को" बाहर से आवाज़ आई।
"यह 16 घंटे भी कम है" निधि बोली और उठ कर दरवाज़ा खोला।
वहां कोई आदमी नहीं था बल्कि उसकी जगह एक टेप रिकॉर्डर रखा हुआ था। निधि ने वह टेप रिकॉर्डर उठाया और बोली "यह अंकल भी ना, पागल हैं!!"
टेप रिकॉर्डर में आगे की आवाज़ गूंजी। "अगर मुझे पागल कह दिया हो तो किचन में खाना पड़ा है ठूस लेना" निधि यह सुनकर मुस्कुरा दी। आवाज़ ने आगे कहा "मैं आज स्पेस अकेडमी में जरूरी मीटिंग अटेंड करने जा रहा हूं, 3 दिन बाद आकर तुमसे मिलूंगा। तुम चाहो तो अपने गोवा वाले घर चले जाना। वैसे भी तुम्हारी छुट्टी खत्म हो चुकी है तो यहां रुकने का काम नहीं। "
निधि ने पूरी बात सुनी और अपने बालों को मुंह की हवा से ऊपर उठाते हुए टेप रिकॉर्डर नीचे रख दिया। "अंकल को तो जब देखो तब मुझे निकालने की पड़ी रहती। मैंने बोला था अपनी एजेंसी में थोड़ा बहुत काम दे दो, इसी बहाने मन लगा रहेगा। लेकिन नहीं!!"
निधि किचन में गई और गैस पर चाय चढ़ा दी। फिर देखा अंकल खाने में क्या छोड़कर गए हैं। उन्होंने एक बड़ा सा बर्गर निधि के लिए बना रखा था। निधि ने बर्गर उठाया और खाते खाते बनती हुई चाय के पास आकर खड़ी हो गई। "बोलते हैं मैं अभी 19 साल की हूँ, जब 21 की हो जाऊंगी तो मुझे मेरा पहला मिशन मिलेगा, पर काहे को...!! काम तो मैं अभी भी कर सकती हूं!! तो 21 का इंतजार क्यों, शादी थोड़ी ना करनी है!! ना तो अकंल समझ में आ रहे, ना ही उनकी बातें"
चाय बनने के बाद उसने उसे कप में डाला और बर्गर के साथ बाहर बालकनी में आ गई। यहां से प्रकृति का सुंदर नजारा देखने को मिल रहा था। बाहर ठंडी हवा चल रही थी। निधि बालकनी से अपने ट्रेनिंग के दिनों को याद करने लगी। जहां उसने कई तरह की परीक्षाएं दी थी। इन ट्रेनिंग के दिनों में उसने लड़ना और जासूसी कलाओं का कैसे प्रयोग किया जाता है, के बारे में सीखा था। उन दिनों को थोड़ा सा याद करने के बाद वह फिर खुद से बोली "पता नहीं कब वह दिन आएगा.... जब लोग निधी के नाम को जानेंगे"
3 दिन बाद।
गोवा किनारे बना एक घर।
यह निधि का खुद का अपना घर था। वह यहां अकेले रहती थी। घर के सामने समंदर का शानदार परिदृश्य था तो घर के पीछे की तरफ जंगली इलाका। घर के दोनों और पहाड़ों की ऊंची चोटिया थी। शाम का समय था और निधि इन्हीं पहाड़ियों में से एक पहाड़ी की चोटी पर खड़ी थी। हवा के झोंके बार-बार उसके सुनहरे बालों को लहरा रहे थे। उसके चेहरे पर अद्भुत तेज था, शरीर आकर्षण का केंद्र। नीले रंग की आंखों की गहराई नापना मुश्किल था।
उसने कोतुहल भरी नजरों से समंदर की आती लहरों को देखा और आँखें बंद कर उसे महसूस करने की कोशिश की। "आहहहह, यह अत्यंत ही आनंददायक हैं" वह बोली और अगले ही पल चोटी से समंदर में कूद गई। रोज शाम को समंदर के ठंडे पानी में नहाना उसका शौक़ था। समंदर में वह जितना गहरा हो सकती थी उतना गहरा जाने की कोशिश करती और वापस बाहर आ जाती। पानी की लहरों से जुझना, उनसे लड़ना उसे एक नई प्रेरणा देता था। इसके अतिरिक्त देर तक सोना निधि की आदतों में से एक आदत थी।
काफी देर ऐसे ही समंदर में नहाने के बाद वह घर में वापस आई। घर और समुद्र के तट के बीच तकरीबन आधा किलोमीटर की दूरी थी। रात के 9:00 बज चुके थे। निधी ने आकर कपड़े बदले और आराम से सोफे पर बैठ गई। इसके बाद एक लंबी सांस ली और टीवी ऑन किया।
टीवी पर कुछ खास नहीं चल रहा था, बस कुछ खबरें थी "दुनिया भर के देशों में आर्थिक मंदी के चलते संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व आपातकाल की घोषणा करने का निर्णय लिया है; विभिन्न देश आर्थिक परेशानियों के चलते जंग के हालातों से गुजर रहे है; जगह-जगह सत्ताधारी पार्टियों के खिलाफ आंदोलन हो रहे हैं; प्राकृतिक संसाधनों को लूटने की होड़ दुनिया भर के देशों में हैं"
"अच्छा हुआ यह हालात अपने भारत देश में नहीं" टीवी की खबरों को सुनने के बाद निधी ने कहा और सोने की तैयारी करने लगी।
तभी अचानक दरवाज़े की घंटी बजी।
"यह इतनी रात को कौन हो सकता है?" निधि ने उठ कर दरवाज़ा खोला।
बाहर उसके अंकल खड़े थे।
"अरे अंकल आप यहां, इस गरीब की कुटिया में कैसे दस्तक देनी हुई"
अंकल उसकी बात सुनकर मुस्कुरा दिए "तुम्हारी इस गरीब की कुटिया को बनाने में मेरे पैंतीस लाख लगे हैं"
जवाब सुनकर निधी ने हल्की सी हँसी दिखाई और उन्हें अंदर आने को बोला। दोनों अंदर आ गए। निधी ने एक कुर्सी उन्हें बैठने के लिए दी और खुद रसोई में जाकर चाय बनाने लगी। चाय बनाकर वह रसोई से बाहर आई और उसे अंकल को दी। चाय देने के बाद वह उनके सामने ही बेड पर बैठ गई।
"और कैसे आना हुआ??" निधी ने उन्हें यहां देखकर पूछा।
"क्या बताऊं!!" सामने से वह बोले। उनके चेहरे पर एक निराशा थी "हमारी एजेंसी मुश्किल हालातों से गुजर रही, जिन एजेंट को देश की सुरक्षा के लिए रखा गया था वही देश के लिए ही खतरा बन रहे हैं। अभी पिछले दिनों 6 एजेंट पकड़े गए हैं जो देश के साथ गद्दारी कर रहे थे"
"यह तो बहुत गलत बात है" निधि ने उनकी बात का साथ दिया।
"समझ में नहीं आ रहा किस पर भरोसा करें किस पर नहीं!!"
"यपपप!! किसी के चेहरे को देखकर अंदाजा नहीं लगाया जा सकता वह धोखा देगा या साथ"
उन्होंने शांति में अपना सर हिलाया। "लेकिन चिंता की बात सिर्फ इतनी सी नहीं है" वह आगे बोले।
निधि ने पूछा "इसके अलावा और कौन सी चिंता की बात है"
"सरकार!!!" उन्होंने आश्चर्य से अपनी आँखें बड़ी करते हुए कहा। "सरकार भी हमारी एजेंसी पर दबाव डाल रही है। सरकार को खुफ़िया एजेंसियों से अपने काम करवाने होते हैं, और जब काम नहीं होते तब वह एजेंसी पर दबाव डालती हैं, हमारे एजेंट हमारा साथ नहीं दे रहे, ऐसे में सरकार के सारे काम ठप पड़े है।"
"यह तो सच में चिंता की बात है।" निधी ने सांत्वना देते हुए कहा।
"अक्सर हालात इंसानों को झुकने पर मजबूर कर देते हैं, एजेंसी का सीओ होने के नाते तमाम मुद्दे मुझे इस्तीफा देने पर मजबूर कर रहे हैं। मेरे खुद के लोगों का कहना है की अगर मैं ऐजेंसी नहीं चला पा रहा तो इस्तीफ़ा दे दूँ "
"अरे" निधी चौंकी "यह कैसी बातें कर रहे हैं आप। आप पिछले 20 सालों से इस एजेंसी के लिए काम कर रहे है। आपने पूरी श्रद्धा के साथ सरकार की उनकी कामों में मदद की है। आप इस्तीफ़ा क्यों देंगे!! आप इस्तीफ़ा नहीं देंगे... हालातों को बदलने में वक्त नहीं लगता, बस थोड़ा सा इंतजार करें सब सही हो जाएगा"
"मुझे नहीं लगता बेटा, अब कुछ भी सही होगा। सरकार ने नया मिशन दिया है और मेरे पास उस मिशन के लिए एजेंट नहीं। अगर उस मिशन पर काम नहीं किया तो सरकार वैसे ही दबाव बनाकर मुझे इस्तीफा देने पर मजबूर कर देगी"
"ऐजेंसी में कोई तो होगा, जो इस मिशन पर काम करें"
"नहीं है बेटा नहीं है!! अगर होता तो चिंता की कोई बात नहीं होती। एजेंसी में कुल 70 से ज्यादा एजेंट है, उनमें से 60 एजेंट पहले ही अलग-अलग मिशन पर काम कर रहे हैं। बाकी के 10 एजेंट में से छह एजेंट देशद्रोही निकले, चार एजेंट कि जांच चल रही है। जब तक उनकी जांच पूरी नहीं होती तब तक उन्हें किसी भी मिशन पर जाने की इजाज़त नहीं दे सकते हैं"
निधि ने थोड़ा सा सोचा और फिर उठकर चाय का खाली कप किचन में रखा। किचन में आने के बाद में वह आहिस्ता से बोली "अगर आप बुरा ना माने तो मैं एक बात कहूं"
"कहो"
"आप क्यों नहीं मुझे इस मिशन पर भेज देते"
"क्या कह रही हो, तुम्हारा दिमाग तो सही है ना। तुम अभी 19 साल की हो.." उन्होंने गुस्से से कहा।
"हां तो क्या" निधी उनके सामने बैठी और मासूमियत से बोली "सिर्फ 19 साल की हूँ, इसका मतलब यह थोड़ी ना है कि मैं किसी मिशन पर नहीं जा सकती, आप एक बार मुझे मौका तो दे। मैं सब कुछ सही कर दूंगी"
"नहीं नहीं नहीं!!! ऐसा बिल्कुल नहीं होगा" अंकल ने सामने से साफ मना कर दिया "यह मिशन ख़तरों से भरा है और तुम अभी इसका सामना करने के लायक नहीं"
"वो सब बाद की चीजें हैं, कौन किस के लायक है कौन नहीं यह तो वक्त बताता है। क्या आपको मुझ पर भरोसा नहीं.... आप ही ने मुझे ट्रेनिंग दी है" निधि ने थोड़ा इमोशनल होते हुए कहा।
"पर यह मिशन सच में बहुत खतरनाक है, तुमसे नहीं होगा" उन्होंने फिर कहा।
"आप उसकी चिंता मत करें, मैं सावधानी से काम करूंगी और सब संभाल लूंगी"
"पर मैं..."
निधि ने बात को बीच में ही टोक दिया। "मैं वै कुछ नहीं, बस मैंने सोच लिया, इस मिशन पर में ही काम करूंगी, आपको मेरी कसम"
कसम का नाम सुनते ही वह खामोश हो गए "तुम मुझे मजबूर मत करो"
निधि ने फिर कहा "मैं आपको मजबूर नहीं कर रही, सिर्फ कह रही हूं कि एक बार मुझे मौका देकर देखें। आपको किसी भी तरह से निराश नहींं करुंगी"
उन्होंने थोड़ा सा सोचा और कहा "तुम्हारे पापा होते तो मुझे कभी इस बात की मंजूरी नहीं देते । वह चाहते कि मैं अभी तुम्हें थोड़ा सा और वक्त देता... लेकिन"
निधि ने अपने हाथ की उंगली उनके मुंह पर रख उन्हें चुप करवा दिया "पापा होते तो वह मुझ पर गर्व करते हैं, वह कहते हैं शाबाश बेटी, मुझे गर्व है तुम पर, तुम अपने पापा का नाम रोशन कर रही हो"
इसके बाद दोनों में कोई बात नहीं हुई। काफी देर तक दोनों खामोश रहे। फिर उसके अंकल बोले। "ठीक है, मैं तुम्हें इस मिशन पर जाने की इजाज़त देता हूं। लेकिन तुम्हारा नाम हमारे एजेंट लिस्ट में रजिस्टर्ड नहीं..... इसलिए तुम्हें बिल्कुल भी अग्रेसिव नहीं रहना, अपने सीनियर के अंडर ही काम करोगी, जो वह कहेंगे वही करना। तुम्हारा नाम एजेंट की लिस्ट में रजिस्टर्ड नहीं इसलिए तुम्हारी एक सीक्रेट आइडेंटिटी होगी...."
"ठीक है अंकल, ठीक है, मुझे सब मंजूर है" निधी बिना बात पूरी सुने खुशी से उछल पड़ी "थैंक गॉड, मुझे मेरा पहला मिशन मिल रहा है, मजा आएगा" एक लंबी उछाल भर कर उसने अपने बाल हवा में लहराए और वापस बेड पर बैठ गई।
"केस के बारे में सुन लो, क्या पता इसके बाद तुम्हारे इरादे फिर से बदल जाए" उसके अंकल ने दोहरी मुस्कान दिखाते हुए संदेहात्मक अंदाज़ में कहा "यह केस उतना आसान नहीं जितना तुम समझ रही हो"
निधि मुस्कुराकर बोली "अब इरादे नहीं बदलेंगे, चाहे केस आसान हो या मुश्किल" फिर वह खड़ी हुई और उनकी तरफ देखते हुए बोली। "आप यहीं रुकीए, मैं अपने लिए एक चाय का कप ले आती हूं...। पिछली बार लाना भूल गई थी। इसके बाद आप केस के बारे में आराम से बताना"
उसके अंकल पीछे से बोले "तुम थोड़ी सी नादान हो, और भोली भी" पर निधि उसे सुनने से पहले ही किचन में जा चुकी थी।
CHAPTER-3
केस
रात के तकरीबन 11:00 बजे चाय के कप के साथ निधि ने केस के बारे में सुनना शुरू किया।
"यह बात पिछले साल से शुरू होती है। इराक के प्रधानमंत्री युनिस खान इंडिया के दौरे पर आए थे। उन दिनों इराक सीरिया के साथ जंगीय हालातों से जूझ रहा था जो आज भी जारी है। इराक के प्रधानमंत्री और भारत के प्रधानमंत्री दोनों के बीच लंबी वार्ता चली। गृहमंत्री के साथ साथ मैं भी उस वार्ता में शामिल था। इराक के प्रधानमंत्री ने इंडिया से उनकी मदद करने को कहा लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानूनों के चलते इंडिया सीधे-सीधे उनकी मदद नहीं कर सकता था। अंत में भारत के प्रधानमंत्री ने फैसला किया कि वह खुफ़िया तरीके से इराक की मदद करेगा। देश के गृहमंत्री भी इस बात से सहमत थे। मैंने भी अपनी सहमति उन्हें दे दी। आखिर में योजना बनाई गई। भारत खुफ़िया तरीके से सीरिया के शासक को मार देगा। सीरिया का शासक तानाशाही था। उनके लोग भी उनसे परेशान थे। इराक ने इस मदद के बदले अपने तेल के भंडारों का 20% हिस्सा भारत को देने का वादा किया। तानाशाही शासन के चलते मुझे भी इस बात में कोई आपत्ति नहीं थी। इस काम का एग्रीमेंट बना लिया गया। एग्रीमेंट के बाद मुझे इस काम को पूरा करने की जिम्मेदारी सौपीं गई। तकरीबन तीन महीनों के अंदर अंदर हमने इस पर काम करना शुरू कर दिया। हम लोगों ने योजना बनाकर तीन मुख्य स्टेप डिसाइड किए। पहले स्टेप में हम लोग इराक में अपना बेस बनाएंगे। दूसरे स्टेप में सीरिया पहुंचेंगे। और तीसरे स्टेप में काम को अंजाम देंगे। काम शुरू करने के बाद सबसे पहले इराक में सरकार की मदद से बेस बनाई। इसके बाद एक-एक कर अपने एजेंट भेजने शुरू कर दिए। उन एजेंट का काम सिर्फ इस मिशन को अंजाम देने के लिए एक जरूरी प्लेटफॉर्म तैयार करना था। धीरे-धीरे हमने वहां की एजेंट का कार्यक्षेत्र बढ़ाया और दूसरे स्टेप की तैयारी करने लगे।अगले तीन महीनों के अंदर हमारे एजेंट सीरिया में खुद को स्टेबलिश करने में कामयाब रहे। हमने खुफिया तरीके से सीरिया में भी अपने पैर जमा लिए। सब कुछ सही था। अब योजना के आखिरी चरण पर काम करना बाकी था। सीरिया के शासक को मारने के लिए हमने अपने सबसे बेस्ट तीन एजेंट चुने और उन्हें इराक भेज दिया। उन तीन एजेंट में से एक एजेंट इराक में ही रुका और बाकी के दो एजेंट सीरिया में गए। लेकिन....
लेकिन प्रधानमंत्री को मारने से ठीक दो दिन पहले अचानक खबर आई कि हमारे तीनों एजेंट मारे गए। कैसे?? नहीं पता!! उनकी लाश वहां की सरकार ने जप्त कर ली। इससे पूरा डिपार्टमेंट सदमे में आ गया। यह काम बहुत ही खुफ़िया तरीके से किया गया था। एक भी ग़लती की गुंजाईश नहीं थी। इसके बावजूद यह हुआ। मैंने मिशन को कुछ समय के लिए रोक दिया और अंदरूनी तौर पर जांच करना शुरू कर दिया। जांच में सामने आया कि वहां के कुछ एजेंट और यहां के कुछ एजेंट, उन्होंने मिलकर हमें धोखा दिया है। हमारे हाथ पैर बंध चुके थे। इसके बाद हम चाह कर भी अगला कदम नहीं उठा सके। इसी समय सरकार ने हम पर इस काम को पूरा करने का दबाव बना दिया। अब यह 3 दिन पहले की बात जब मैं मीटिंग अटेंड करने गया था तो सरकार ने सीधे-सीधे शब्दों में कहा दिया कि जैसे तैसे कर इस काम को पूरा किया जाए। सीरिया के प्रधानमंत्री का तानाशाही शासन बढ़ता जा रहा है। उसने लोगों को जबरन सेना में भर्ती करना शुरू कर दिया है। अगर हालात ऐसे ही रहे तो एक दिन इराक जंग में हार जाएगा। अमेरिका जैसे देश भी इस मुद्दे में दखलअंदाजी नहीं दे रहे। ऐसे में एकमात्र उम्मीद सिर्फ और सिर्फ भारत देश से हैं। मेरे पास उनके इस दबाव के आगे किसी भी तरह के दूसरे कदम उठाने का सामर्थ्य नहीं था। एजेंसी के एजेंट धोखा दे रहे हैं .... ऐसे में "
निधि के हैरानी की कोई सीमा नहीं थी। यह एक ऐसा मिशन था जिसके बारे में उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। उसे तो लगा था की कोई कत्ल का केस होगा या फिर चोरी का। जासूस अक्सर यही काम करते हैं.... लेकिन यह स्पेस एकेडमी थी। यहां पर ऐसे ही केस आते हैं। और यह मामला और भी अलग था। इसमें दूसरे देश में जाकर उस देश के प्रधानमंत्री को खत्म करना था......।
निधि के अंकल ने निधि की खामोशी देखी और खड़े होते हुए कहा "तुम घबराओ मत, तुम्हारा काम प्रधानमंत्री को मारना बिल्कुल भी नहीं!!"
"क्या!!" निधि की हैरानी कम होने की बजाए और बढ़ गई। "अगर प्रधानमंत्री को मारना मेरा मिशन है तो फिर क्या है...??" उसने अगले ही पल पूछा।
"तुम इस खतरनाक काम को अंजाम नहीं दे सकती, इसके लिए मैंने दूसरा आदमी रख रखा है पर उसको भेजने से पहले उसके लिए ज़मीन तैयार करनी होगी। तुम्हारा काम सिर्फ वहां जाकर यह पता करना है कि उन तीनों एजेंटों की मौत के पीछे कौन हैं?? इसके अतिरिक्त तुम यह भी पता करोगी वहां हमारे कितने लोग हैं जो हमारे खिलाफ काम कर रहे हैं??
"मतलब आप इस मिशन का सिर्फ आधा काम करने के लिए मुझे कह रहे हैं" निधि बोली
"हां क्योंकि तुम अभी इन्हीं कामों के काबिल हो। इन तीन एजेंटों की मौत की छानबीन कोई ऐसा वैसा काम नहीं, अगर यह हमारे खुद के देश में हुई होती तो शायद मुश्किल नहीं आती पर यह दूसरे देश के अंदर हुई है। तुम्हें सावधानी बरतनी पड़ेगी"
पूरी बात सुनने के बाद निधि ने आश्वासन देने वाले अंदाज़ में कहा "आप फ़िक्र मत कीजिए, हो जाएगा.... "
अंकल उसके पास आए और थोड़ा सहजता से बोले "मैं तो अभी भी चाह रहा हूं कि तुम्हें इस काम पर ना भेजूं"
"अरे अंकल!! आपने कौन सा मुझे मुश्किल काम दिया है। यहां चने के झाड़ से आम थोड़ी ना तोड़ने हैं... अगर प्रधानमंत्री को मारने को कहा होता तब भी मानती.... यह तो छोटा सा काम है....जो भी हो ...अब यह एजेंट निधि का केस है............."
CHAPTER-4
विनम्र और लुईस इल्लल्लाह ( सिरिया का प्रधानमंत्री)
इराक में एक नेता का कमरा।
कमरे में टेबल पर कुछ फाइलें रखी हुई थी। उनमें से 2 फाइलें खुली थी और बाकी की फाइलें बंद । एक नौजवान युवक उस कमरे में कुर्सी पर बैठा था। उसके सामने ही एक आदमी था, लेकिन मरा हुआ। उसके सर के बीचो-बीच गोली मारी गई थी। नवयुवक के हाथ में पिस्तौल थी जिससे यह जाहिर होता है कि इसी ने उस आदमी को मारा है। वह कुर्सी पर बैठा एक के बाद एक फाइलों को देख रहा था। कुछ फाइलें देखने के बाद उसने अफसोस में गर्दन हिलाई और कहा "यहां ऐसा कुछ नहीं........बेचारा यह बिना मतलब के मारा गया" और फिर खड़ा होकर दरवाजे के पास आ गया। "सीरिया जाकर इस बात की सूचना देनी होगी...."
सिरिया और इराक के बॉर्डर पर बनी एक जगह—
चारों ओर सख़्त तारबंदी थी। दो देशों की सीमाएं यहां अलग होती हैं ऐसे में सुरक्षा व्यवस्था अपने सर्वोत्तम प्रकोष्ठ पर थी। सुरक्षा व्यवस्था में तार के एक और सीरिया की सेना अपना पहरा दे रही थी तो एक और इराक की सेना। बीच-बीच में टैंकों की मौजूदगी भी दिख रही थी। टैंकों के करीब ही मिसाइल लांचर लगे हुए थे। इन मिसाइल लांचरों से हटकर सैनिक बेस बने हुए थे। प्रत्येक सैनिक बेस में 10 से 15 सैनिकों के ठहरने की जगह थी। इन सैनिकों के बेस के ऊपर सैनिक टावर थे। यह सैनिक टावर दूसरे देश की सीमा में तांका झांकी करने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। ज़मीनी सतह पूरी तरह से रेतीली थी।
अचानक दूर से वही नवयुवक खुले मैदान में चलता हुआ दिखाई दिया, जिसने एक आदमी के सर पर गोली मारी थी। उसके हाथ ऊपर थे। उम्र तकरीबन 21 साल, शरीर पर फटे हुए भारी भरकम कपड़े। आँखें आकर्षित और पीले रंग की थी। वह इराक से सीरिया की तरफ जा रहा था।
टावर पर खड़े सैनिक की नजर उस पर पड़ी, उसने तुरंत अपना वायरलेस उठाया और नीचे बेस के लोगों को इस बात की सूचना दी।
देखते ही देखते 10 जवानों की एक टुकड़ी हथियारों के साथ वहां आ पहुंची।
"कौन हो तुम और यहां क्या कर रहे हो??" सैनिकों ने उससे पूछा।
"बताता हूं, लेकिन पहले मुझे कमांडर से मिलवाओ"
टुकड़ी ने उस आदमी को पकड़ा और बेस में ले गए। तकरीबन 5 मिनट बाद टुकड़ी का कमांडर वहां आया और पूछा "कौन हो तुम, और यहां किस मकसद से आए हो?? क्या तुम सीरिया के जासूसों या फिर इराक के कोई बागी हुए मुजरिम?? जो भी हो सच सच बताना, अगर झूठ बोलने की कोशिश की तो अल्लाह कसम पूरी की पूरी बंदूक तुम्हारे सीने में खाली कर दूंगा"
नवयुवक ने कुछ नहीं कहा। कमांडर दोबारा धमकी वाले अंदाज में बोला "बताओ! कौन हो तुम!"
"इराक का सीक्रेट एजेंट हूं" नवयुवक ने सामने से जवाब दिया।
"सीक्रेट एजेंट!!" कमांडर और वहां खड़े सब लोग हैरान हो गए।
"हां, सीक्रेट एजेंट। मेरा नाम विनम्र है और मैं यहां सीरिया के तानाशाही शासक लुईल इल्लल्लाह को मारने आया हूं।"
"तुम्हें क्या लगता है तुम कहोगे और हम मान लेंगे" कमांडर ने सख्त लहजे में कहा।
"मेरे पास सबूत है" विनम्र बोला और कुछ दस्तावेज निकालकर उनके सामने रख दिए। देखो!! इसमें मेरा तो कुछ नहीं जाता, अगर सीरिया का शासक मर गया तो तुम लोगों का ही भला होगा…. मुझे इस मिशन के लिए स्पेशल ट्रेन किया गया है"
कमांडर को कुछ समझ नहीं आ रहा था वह आगे क्या बोले। सीरिया और इराक के बीच वर्षों से चली आ रही जंग के कारण ऐसे एजेंट बॉर्डर पर इधर-उधर होते रहते हैं।
"तुम अकेले उसे कैसे मारोगे??" कमांडर ने थोड़ा नरम रुख अपनाया।
"बहुत आसान है, उसके देश में घुसूंगा, वहां जाकर बोलूंगा कि मैं सीरिया का जासूस हुं और इराक कि सेना से जुड़े कुछ जरूरी दस्तावेज लेकर आया हूं, वो लोग मुझे अपना जासुस समझेंगे और आसानी से लुईल इल्लल्लाह तक पहुंचा देंगे, जैसे ही मैं उसके सामने जाऊंगा गोली से उड़ा दूंगा"
"यह काम इतना आसान नहीं बरखुरदर" कमांडर हँसता हुआ बोला।
"उसकी चिंता आप मत कीजिए। मेरी वहां बड़े-बड़े लोगों से जान-पहचान हैं, कब कहां से कहां तक पहुंच जाऊंगा किसी को पता नहीं चलेगा"
कमांडर सोच विचार में पड़ गया। "लेकिन तुम्हारे पास तो किसी भी तरह के दस्तावेज नहीं"
"तो तुम लोग दे देना ना" विनम्र मुस्कुराकर बोला"वैसे भी अच्छे काम के लिए गलत काम किए जा सकते हैं"
"हम लोग तुम्हें क्यों दस्तावेज दे, यह तो देश से गद्दारी करना होगा"कमांडर की आंखों में शिकन आ गई।
"अरे मेरे मालिक" विनम्र खड़ा हुआ और कमांडर के करीब जाकर बोला "मैं कौन सा सही दस्तावेज देने को कह रहा हूं, झूठे दस्तावेज देने है आपको"
इस बात ने कमांडर को फिर से सोचने पर मजबूर कर दिया। उसने सैनिकों के साथ सलाह मशविरा किया। फिर कैबिन में गया और कुछ कागज के टुकड़े लेकर उसके पास आ गया "यह लो, मेरे सैनिक तुम्हें बॉर्डर पार करवा देंगे... उसके बाद तुम जानो तुम्हारा काम जाने"
विनम्र एक मुस्कुराहट दिखाई। "आप बहुत होशियार है मेरे मालिक" और दस्तावेज उठाकर वहां से चला गया।
उसके साथ एक सैनिक और था। वह सैनिक उसे बॉर्डर पार करवा रहा था। बॉर्डर के नजदीक पहुंचते ही विनम्र ने सैनिक को देखा और कहा "तुम लोगों को नहीं लगता तुम्हारा कमांडर बेवकूफ़ है"
"क्या मतलब!!"
"यही कि उसने एक अनजान शख्स पर इतनी आसानी से भरोसा कर लिया"
"इराक की सेना अमन चाहती है,ऐसे में वह हर एक शख्स पर विश्वास करेगी जो सीरिया को खत्म करने की चाह रखता हो"
विनम्र यह सुनकर हँसने लगा "शायद यही बात तुम लोगों की सबसे बड़ी कमजोरी है"
सैनिक ने विनम्र की शक्ल देखी "तुम कहना क्या चाहते हो... अपनी बात साफ-साफ कहो"
विनम्र रुका और सैनिक की तरफ पलटा। "मेरे भाई!! मेरा नाम विनम्र हैं और मुझे धोखा देना बहुत अच्छे से आता है"
तभी पीछे एक जोरदार धमाका हुआ और बेस कैंप पूरा का पूरा उड़ गया। सैनिकों ने पलट कर पीछे अपने बेस की तरफ देखा। वहां एक के बाद एक धमाके हो रहे थे।
"मतलब तुमने हमें धोखा दिया है" सैनिक गुस्से से बोला और पीछे मुड़ा, पर इससे पहले वह और कुछ करता विनम्र ने उसकी पीठ से उसका खंजर निकाला और उसी के सीने में घोप दिया। "मैंने कहा था ना…. विनम्र सिर्फ धोखा देता है"
सैनिक को मारने के बाद उसने उसकी गर्दन काटी और खंजर वहीं फेंक दिया। इसके बाद वह बॉर्डर पार कर दूसरी तरफ सीरिया चला गया। उसके पास दस्तावेज के साथ-साथ एक सैनिक का सर भी थे।
सीरिया के सैनिक विनम्र को देखते ही उसकी तरफ भागे और खुशी से उछलने लगे।"कमांडर आ गए.... कमांडर आ गए"
"सर हमें नहीं पता आप अपना मिशन इतनी आसानी से पूरा करेंगे"सीरिया के एक सैनिक ने कहा
"क्यों!!" विनम्र अजीब सी आँखें बनाकर उसे देखने लगा "क्या तुम्हें मुझ पर यकीन नहीं"
"कैसी बातें कर रहे हैं सर आप!! आप हमारे कमांडर हो और हमें आप पर यकीन नहीं होगा, ऐसे कैसे हो सकता है"
यह सुनकर विनम्र एक हल्की मुस्कान दिखाइए "यह हुई ना बात, वैसे जिस काम के लिए गया था वह पूरा नहीं हुआ। तुम ऊपर सूचना भिजवा दो कि हमें वह चीज नहीं मिली"
"कौन सी चीज सर??" सैनिक ने एक पल रुक कर पूछा।
"वह लोग अपने आप समझ जाएंगे.... तुम बस काम करो जिसके लिए कहा गया है। " विनम्र ने अपने चेहरे पर रौब दिखाते हुए उस आर्डर दिया। "अभी और भी बहुत सारे काम है जो मुझे निपटाने हैं"
इतना कहकर विनम्र ने वहां खड़ी एक जीप पकड़ी और उस जगह से चला गया।
CHAPTER-5
विनम्र का चार आदमियों को मारना और उसको ऑर्डर देने वाला अनजान आदमी
सीरिया
किसी अनजान जगह पर।
विनम्र कि जीप एक गली के बाहर आकर रुकी। अंधेरा हो चुका था और गली में भी सन्नाटा छाया हुआ था। विनम्र जीप से उतरा और पैदल ही गली में चलने लगा। आगे चलकर उसने एक घर का दरवाजा खटखटाया।
अंदर से एक औरत ने दरवाज़ा खोला "जी कहिए"
विनम्र ने उस औरत को देखा और हल्के अंदाज़ में मुस्कुरा कर कहा "क्या यह साइंटिस्ट आदित्य का घर है"
"जी हां"
"मैं उनसे मिलने आया हूं"
"पर वह तो यहां नहीं है" औरत ने जवाब दिया।
"मैं इंतजार कर सकता हूं" विनम्र ने एक पल अपनी घड़ी की तरफ देखा और फिर उस औरत को। उसकी उम्र तकरीबन 28 साल होगी। औरत ने भी अंदर दीवार पर टंगी घड़ी की तरफ देखा।
"उन्हें 2 घंटे लग जाएंगे आने में"
"इतने तो बहुत हैं"
विनम्र अंदर जाकर सोफे पर बैठ गया। औरत किचन में गई और उसके लिए चाय बनाने लगी। "वैसे क्या मैं जान सकती हूं आप कौन हैं, और आपको उनसे क्या काम है" औरत ने किचन से ही पूछा।
"जी नहीं!!"
औरत यह सुनकर अजीब नज़रों से उसकी तरफ देखने लगी। उसने कप में चाय डाली और उसके सामने जाकर रख दी। विनम्र भी उस औरत की तरफ देख रहा था। औरत को उसके इरादे ठीक नहीं लगे।
"क्या हुआ??" विनम्र ने पूछा।
औरत थोड़ा सा डर गई” कुछ नहीं..." वह हड़बड़ाते हुए बोली "मैं एक बार अपने पति को फोन कर लेती हूं"
"जी करिए"
यह सुनने के बाद औरत लैंडलाइन की तरफ गई और फोन उठाकर नंबर डायल करने लगी। लेकिन तभी..... पीछे से विनम्र मुस्कुराया और पिस्तौल निकालकर सीधे उसके सर पर गोली मार दी। गोली लगते ही उसका खून फोन पर गिरा और वह धड़ाम, नीचे फर्श पर।
"मेरा तो तुम पर दिल आया था.... लेकिन नहीं!! तुम्हें तो अपनी पति की पड़ी है। कोई बात नहीं... भेजता हूं उसे भी तुम्हारे पास" विनम्र वापिस इंतजार करने लगा।
रात के तकरीबन 11:00 बज विनम्र का इंतजार खत्म और एक अधेड़ 45 वर्ष की उम्र वाले व्यक्ति ने घर के अंदर दस्तक दी। सामने सोफे पर ही विनम्र पर बैठा था। उसे देखते ही वह चौंक गया।
"तुम!! तुम यहां क्या कर रहे हो...??" उसने विनम्र को देखते ही पूछा।
विनम्र मुस्कुराया और बोला "तुम्हारी मौत की तैयारी। सुना है तुमने सीरिया की मदद करने से इनकार कर दिया है। तुम अब उनके लिए एडवांस हथियार नहीं बनाओगे"
"हां" सामने से आदमी ने जोर से कहा "सीरिया के प्रधानमंत्री का मकसद इन हथियारों को लेकर बहुत गलत है, और मैं ऐसे काम में उनका साथ बिल्कुल नहीं दूंगा।"
"बेटा!!" विनम्र पिस्तौल निकालते हुए बोला "इसलिए तो तुम्हारी इस दुनिया से टिकट कट रही है" और धाएं इसके बाद उस पर भी गोली चला दी।
बिना आवाज़ किए गोली सीधे उसकी गर्दन के आर पार हो गई।
उन दोनों को मारने के बाद विनम्र ने जीप निकाली और वहां से चला गया।
ठीक अगले 2 घंटे बाद उसकी जीप एक बंगले के सामने जाकर रुकी। वह गाड़ी से उतरा और बंगले में चला गया।
बंगले में अगले पल वह टेबल पर डिनर कर रहा था। उसके साथ चार आदमी और थे। सब की दाढ़ी बड़ी बड़ी थी। दिखने में बगदादी आतंकवादी का समूह लग रहा था।
विनम्र ने उनसे बात करना शुरू किया "तुम लोग जिस साइंटिस्ट को किडनैप करके लाए थे उसने काम करने से मना कर दिया!!"
"हां हमने भी सुना है" सामने से एक आदमी ने जवाब दिया
"इसलिए आज उसे मार दिया"
"क्या" चारों एक साथ बोले।
"हां" विनम्र ने जवाब दिया। "ऊपर से ऑर्डर आए थे। उन्होंने कहा है कि हमें ऐसे लोगों की बिल्कुल जरूरत नहीं जो काम ना करें"
"तुमने बहुत अच्छा काम किया..." दूसरे आदमी ने कहा
"हां जानता हूं। लेकिन पूरी बात तो सुन लो, यह भी ऑर्डर आए हैं कि उन आदमियों का भी कोई काम नहीं जो खराब आदमियों को लेकर आए।"
"क्या मतलब" एक-एक कर चारों आदमियों ने विनम्र से कहा।
“धोखा इंसान के खून में होता है, यह उसका जन्मसिद्ध अधिकार है और तुम इसे छीन नहीं सकते” फिर वह अपनी जगह से खड़ा हुआ और अपनी पीठ में खंजर निकालते हुए सामने के एक आदमी की गर्दन के आर पार कर दिया।
सब सकते में आ गए और अपनी अपनी जगह पर खड़े होते हुए बंदूकें निकाल ली। विनम्र तुरंत सावधान हुआ और टेबल उठाकर उनके ऊपर फेंक दिया। सब टेबल के भार से नीचे गिर गए और अगले कदम के लिए असहाय हो गए।
पास ही खिड़की थी। विनम्र खिड़की की तरफ गया और पीछे उन्हें देख कर मुस्कुराया। फिर चार ग्रेनेड निकालें और वहां फेंककर नीचे कूद गया।
एक के बाद एक मकान में कई सारे धमाके हुए, धमाके इतने बड़े थे कि उसमें किसी के भी बचने की उम्मीद नहीं थी। अंदर मौजूद सभी लोग मारे गए।
इस घटना के बाद विनम्र दूर एक सड़क के एक किनारे बैठा था। उसने अपना फोन निकाला और मैसेज टाइप किया— "सारी मुसीबतें रास्ते से हट गई है, कोई और काम हो तो बता देना"
सामने से रिप्लाई आया "अमेरिका से किसी साइंटिस्ट को सीरिया लाने की तैयारी की जा रही हैं। साइंटिस्ट को एडवांस बेस में लेकर आना है पर वह अभी तैयार नहीं। उसकी सुरक्षा देश के लिए इंपोर्टेंट है। जब तक बेस तैयार नहीं हो जाती उसके साथ रहो।"
"ठीक है, हो जाएगा"
CHAPTER-6
अमेरिका से साइंटिस्ट जार्ज इरविन का किडनैप होना
U.S.A.
संयुक्त राष्ट्र संघ अमेरिका।
एक बड़े हॉल में अति प्रभावशाली लोगों का भारी जमावड़ा था। सभी जाने-माने देशों के प्रतिष्ठित नागरिक लग रहे थे। मौजूद लोगों की उम्र तकरीबन 25 से लेकर 70 साल के बीच बीच होगी। महिलाओं की संख्या पुरुषों के तुलना मैं आधी थी। हॉल के सामने एक लंबा केबिन बना हुआ था जिस पर 9 लोगों के बैठने की व्यवस्था थी। इस केबिन के सामने दूसरे छोटे-छोटे कैबिन बने हुए थे जहां एक एक व्यक्ति बैठ सकता था। ऐसे तकरीबन 216 छोटे केबिन थे। कुल मिलाकर हॉल में बैठने वाले लोगों की संख्या 225 थी। यह 225 सदस्य विभिन्न देशों के विशिष्ट नागरिक, वहां के जाने माने वैज्ञानिक, सलाहकार इत्यादि हैं। इन्हें महान राष्ट्र संघ में अपने विचारों को रखने के लिए प्रतिवर्ष अमेरिका भेजा जाता है। आज कुछ इसी तरह का समारोह है जहां यह लोग अलग-अलग अपने विचार रखेंगे।
हाॅल के ऊपर लगी घड़ी में 9:00 बजे का इशारा हुआ और सब लोग एक-एक कर अपनी-अपनी जगह पर बैठने लगे।काफी सारे प्रभावशाली लोगों में एक खास तरह का व्यक्ति भी नजर आ रहा था, जिसकी चश्मा सभी के लिए आकर्षण का केंद्र था। उस चश्मे का एक सीसा काफी छोटा और एक शीशा काफी ज्यादा बड़ा था। ऐसी चश्में दुनिया में किसी को लगे हुए शायद ही देखने को मिले। उस शख्सियत जिस के चश्मे का आकार छोटा बड़ा था, उसने नीले रंग का कोट पेंट और सफेद जूते पहन रखे थे। उम्र तकरीबन 50 साल के आसपास होगी। इस उम्र का अंदाजा उसके चेहरे से तो नहीं लगता, पर दाढ़ी देखकर लगाया जा सकता था। मुंह में एक पाइप थी जिसके दूसरे छोर पर पेन की निब लगी हुई थी। शायद यह एक खास तरह का पेन था जिसे उस शख्स को मुंह में लेने की आदत थी।
अचानक उसके बगल एक हसीन औरत उसके कान में फुसफुसाई "जार्ज इर्विन, मैं आपकी कला की बहुत बड़ी फैन हूं"
जॉर्ज इरविन, उस शख्स का नाम जार्ज इरविन था। वह उस हसीन औरत की तरफ मुड़ा और ऊपर से लेकर नीचे तक उसे पूरी तरह से देखा। उसकी उम्र तकरीबन 25 साल के आसपास होगी, शरीर आकर्षित था और मन लुभाने वाला भी, कपड़े भी अजीब तरह के पहन रखे थें। एक नजर जांच करने के बाद जार्ज इरविन उसके करीब आया और कानों में बोला “बड़ी फैन हो तो बताओ, तुम मेरे लिए क्या कुछ कर सकती हो??"
औरत खिलखिला कर हँस दी। थोड़ी अजीब हंसी थी पर इस पर कौन ध्यान दे रहा है। उसने बड़े ही नाजुक तरीके से कहा"कुछ भी" फिर रुकी और दोबारा बोली "कुछ भी मतलब कुछ भी!!"
जार्ज इरविन के चेहरे पर एक मुस्कुराहट आ गई "अच्छा तो आज रात को 9:00...सेकिना होटल, कमरा नंबर 302"
औरत फिर खिलखिलाकर हँसी । "मुझे खुशी होगी,जनाब"
"मुझे भी" जार्ज इरविन ने कहा और अपना पूरा ध्यान सामने की तरफ लगा लिया। सामने की सारी कुर्सियां भर चुकी थी।
बड़े केबिन में 9 लोगों के समूह में से एक व्यक्ति ने मैज खटखटाया और कहा "इस साल सभी देश आर्थिक तंगी से गुजर रहे हैं, ऐसे में संयुक्त राष्ट्र संघ के बैंक ने फैसला किया है कि वह किसी को भी अतिरिक्त ऋण नहीं देगा। तमाम खर्चे कम किए जाएंगे और देशों से उनका पैसा वसूला जाएगा।"
यह सुनते ही सब में कानाफूसी होने लगी।
"इतना ही नहीं, समंदर में अंतरराष्ट्रीय सीमा से बाहर तेल के समस्त भंडार अब संयुक्त राष्ट्र संघ के अंडर में रहेंगे। वहां से तेल का निर्यात और आयात रोका जाएगा। तेल की उन भंडारों का अब तभी इस्तेमाल किया जाएगा जब देश आर्थिक तंगी से बाहर आ जाएंगे। तमाम वैज्ञानिक प्रशिक्षण और प्रयोगों के लिए भी किसी तरह की राशि नहीं दी जाएगी"
अचानक प्रशिक्षण का नाम सुनते ही जार्ज इरविन कि हाथ पैर लड़खड़ा गए। वह तुरंत खडा हुआ और बीच में ही बोल पड़ा। 'माफ करनामाफ करना जनाब, मैं यहां अपने वैज्ञानिक प्रशिक्षण के मुद्दे को लेकर आया था। मुझे एक बहुत बड़ा एक्सपेरिमेंट करना है जिसके लिए काफी सारी रकम चाहिए"
9 लोगों के समूह वाले उस व्यक्ति ने उसकी तरफ उंगली की और कहा"आपने सुना नहीं, मैंने अभी-अभी क्या कहा…. संयुक्त राष्ट्रीय संघ अब किसी भी वैज्ञानिक प्रशिक्षण के लिए रकम नहीं देगा, वह अब कंगाल हो चुका है... उसके पास इतने पैसे नहीं कि वह आप लोगों की दिक्कतों को हल करें"
"पर जनाब, मेरा यह प्रयोग तमाम तरह की दिक्कतों को दूर कर सकता है"
सामने वाले व्यक्ति ने अपने हाथ जोड़ दिए "माफ करें,पिछले कई सालों से इन वैज्ञानिक प्रयोगों ने हमें बर्बाद करके रख दिया है। अब हम कोई खतरा नहीं उठाएंगे। उत्तरी देशों में अकाल और पश्चिम देशों की भुखमरी ने विश्व की हालात को बदतर कर दिया है। पूर्वी देश अंदरूनी जंग से गुजर रहे हैं और दक्षिण देश बाढ़ के चपेट में आ रखे है। इन बदलते हालातों में अब संयुक्त राष्ट्रीय संघ को भविष्य के लिए भी कुछ बचाना होगा। अन्यथा एक दिन पूरी आबादी खत्म होने की कगार पर पहुंच जाएगी और हम हाथ पर हाथ रख इसे देखते रहेंगे।"
जार्ज इरविन अपनी बात को लेकर पूरी तरह से संतुष्ट था। उसने दोबारा एक अंतिम कोशिश की "पर जनाब, अगर आप एक बार मेरी बात सुन ले और अगर इस पर कोई राय लें तो शायद हो सकता है हम इस खतरे को आसानी से दूसरी दिशा में मोड़ सके।"
"नहीं, हमें कोई बात नहीं सुननी" उस आदमी ने अपना ध्यान हटाकर दूसरी तरफ कर लिया जहां और लोग अपने इसी तरह के विचार भारी भरकम शोर के अंदर रख रहे थे।
जार्ज इरविन जवाब सुनने के बाद वहीं बैठ गया और लंबी लंबी सांसे लेने लगा। पास की औरत ने उसे झकझोरा "आप घबराएं नहीं,महान लार्ड, सब ठीक हो जाएगा"
जार्ज इरविन औरत की यह अटपटी सी बात सुन गुस्से से भड़क उठा "तुम चुप रहो पागल औरत, तुम इस बात को नहीं समझ सकती" इसके बाद वह अपनी जगह से खड़ा हुआ और बाहर की तरफ चला गया।
बाहर जाने के बाद जार्ज इरविन ने टैक्सी पकड़ी और उसे होटल जाने को कहा। औरत भी उसके पीछे पीछे हो गई। वह भी एक टैक्सी पकड़कर उसका पीछा करने लगी। जार्ज इरविन की टैक्सी एक होटल के सामने रुकी। वह टेक्सी से उतरा और किराया देने के बाद तेजी से कमरे की ओर चला गया।
इसके ठीक बाद उसका पीछा कर रही औरत भी वहां पहुंची। वह भी किराया देकर उसके पीछे-पीछे चली गई।
कमरे में पहुंचते ही जॉर्ज इरविन ने अपनी समान गुस्से में बेड पर पटक दिया "इन लोगों की तो मैं ऐसी तैसी कर दूंगा, उन्होंने मेरे प्रयोग को बिना सुने... इतनी बड़ी बेइज्जती.... मैं बर्बाद कर दूंगा सबको"
अचानक उसके कमरे का दरवाजा खुला और पीछा कर रही औरत ने अंदर दस्तक दी। अंदर आते वक्त वह रास्ते में ही एक-एक कर अपने कपड़े उतार रही थी। दरवाजे से लेकर साइंटिस्ट तक पहुंचते-पहुंचते वह पूरी तरह से निर्वस्त्र हो गई। "मैंने कहा ना आप चिंता मत करें, आपके पैसों का इंतजाम हो जाएगा। ….. चाहे कुछ भी हो जाए हम आपके एक्सपेरिमेंट को कामयाब करके ही रहेंगे"
"पर तुम हो कौन"जॉर्ज इरविन ने अपना अजीबोगरीब चश्मा उतारते हुए उससे पूछा।
औरत ने उसे कोई जवाब नहीं दिया, सिर्फ इतना कहा "यह जानना जरूरी नहीं" इसके बाद उसे धक्का मार कर बेड पर गिरा दिया।
इस कमरे के बगल में तीन कमरों की दूरी पर कुछ आदमी इस पूरे दृश्य को कैमरे से देख रहे थे। कमरे में तकरीबन 7 से 8 आदमी थे। तमाम आदमियों की दाढ़ी बड़ी-बड़ी और सफेद रंग की थी, देखने में किसी बगदादी आंतकवादी का समूह लग रहा था।
उन आदमियों में से एक आदमी कैमरे में इस दृश्य को देखते हुए बोला। "शिकार को हरी घास मिल चुकी है, अब उसे पिंजरे में डालने की तैयारी करो... यह पागल सा साइंटिस्ट अब हमारी तकदीर बदलेगा…विज्ञान की ताकत अपरंपार है, यह परम पिता परमात्मा को भी मात दे सकती है"
सब लोग उसकी यह बात सुनकर एक शैतानी हंसी हँसने लगे।
उस व्यक्ति ने एक सेटेलाइट फोन निकाला और किसी से बात करने लगा "काम तो बहुत अच्छे से हुआ है जनाब, हमारी जानेमन ने उसे अपने जाल में बुरी तरह से फंसा दिया है, ऊपर से उसे पैसों का लालच भी दे दिया।; नहीं नहीं, किसी बात की फ़िक्र ना करें, सब सही है; जरूर जरूर, हम देशों की आर्थिक मंदी का फायदा अपने लिए उठाएंगे; माशा अल्लाह; जल्द ही उसे सिरिया लाने की तैयारी करते हैं;आमीन"
CHAPTER-7
निधि का इराक जाना
2 दिन बाद। शाम को
गोवा के आर्मी एयरपोर्ट के बाहर निधि और उसके अंकल अकेले खड़े थे। निधि के अंकल ने कुछ जरूरी दस्तावेज निधि को पकड़ाए और कहा "वहां तुम्हें हमारा एक आदमी मिलेगा, 'वकार अहमद'। वह तुम्हारी मदद आगे के रास्ते के लिए करेगा। मैंने उसे तुम्हारे आने की इंफॉर्मेशन दे दी है। उसने कहा है की वह राजधानी की मस्जिद से तुम्हें पिकअप कर लेगा। मस्जिद मुख्य बाजार के बगल में ही हैं इसलिए ढूंढने में दिक्कत नहीं आएगी। किसी से रास्ता पूछ भी सकती हो।"
"आप फिक्र ना करें अंकल!!" निधि ने कहा और उन्हें गले लगा लिया। इसके बाद उसने अपना सामान उठाया और एरोप्लेन में बैठ गई।
तकरीबन 3 घंटे बाद रात के अंधेरे में आर्मी का एरोप्लेन बिना आवाज किए इराक की राजधानी में उड़ रहा था। वह राजधानी के किनारे पर था। ऊंचाई एक सुरक्षित सीमा पर, जहां से रडार उसे पकड़ ना पाए। थोड़ी देर बाद नीचे रेतीले टीलों को देखकर पायलट ने निधि को लैंडिंग करने के संकेत दिए। पायलट का इशारा मिलने के बाद निधि ने एक अच्छी सी जगह देखी और छलांग लगा दी।
बीच रास्ते में आने पर उसने अपना पैराशूट खोल दिया और धीरे-धीरे नीचे उतरने लगी। जमीन पर गिरते ही वह फिसलते हुए संभली और बालू पर अपने पैर जमा लिए। इसके बाद जल्दी-जल्दी उसने पैराशूट को समेट कर उसे मिट्टी में गाड़ दिया। फिर वह पैदल ही राजधानी की तरफ जाने लगी।
शहर में आने से पहले ही उसने अपने कपड़े बदल लिए थे और इराकी सरजमीं की वेशभूषा धारण कर ली थी। इस वेशभूषा में उसे पहचानना मुश्किल था। शहर के पास आते ही उसने भेड़े चरा रहे एक गडरिए को रोका और उससे वहां की भाषा में मुख्य बाजार जाने का रास्ता पूछा। अरबी ने उसे एक दिशा दिखा दी। जब उसके अंकल ने उसे मिशन के बारे में बताया था तब कहा था कि शहर के मुख्य बाजार में उसे एक आदमी मिलेगा जो आगे की मिशन में उसकी मदद करेगा। उस आदमी का नाम वकार अहमद होगा और उसे इस बात की जानकारी भी है कि निधि वहां आ रही है। इराक में एजेंसी से जुड़े तमाम कामकाज वकार अहमद ही संभालता है।
शहर के मुख्य बाजार में आने के बाद निधि ने वहां की रौनक देखी। पूरा बाजार लोगों से भरा पड़ा था, तरह-तरह की दुकानें थी लेकिन ज्यादातर लोग या तो बच्चे थे या फिर बूढ़े। निधि ने एक दुकान पर खड़े होकर कुछ सामान लिया और फिर उस दुकान वाले से मस्जिद जाने वाली गली का रास्ता पूछा। मिशन के हिसाब से दोनों की मुलाकात मस्जिद के पीछे वाली गली में होनी थी। आदमी ने निधि को मस्जिद की गली का रास्ता दिखा दिया।
मस्जिद ज्यादा दूर नहीं थी इसलिए पहुंचने में वक्त नहीं लगा। वहां पहुंचती ही वह सीधे मस्जिद के पीछे चली गई और वकार अहमद का इंतजार करने लगी। लोगों की आवाजाही सब तरफ तेज थी लेकिन पीछे वाली गली में अभी तक कोई नहीं आया।
तकरीबन 20 मिनट के इंतजार के बाद एक सफेद दाढ़ी वाला आदमी गली से गुजरा। निधि ने उसे देखा पर बुलाया नहीं। वो आदमी सीधे निकल गया। तकरीबन 2 मिनट बाद वह आदमी वापस उस गली में आया। इस बार भी वह जैसे आया था वैसे ही निकल गया। निधि को यह थोड़ा अजीब लगा, उसने अपने पैरों से खंजर निकाला और उसे पीठ के पीछे छुपा लिया। बुड्ढा आदमी फिर से गली में नजर आया पर इस बार सीधे निधि के पास आ गया। निधि ने कोई हरकत नहीं की।
"क्या तुम निधि हो??" सामने से उसने पूछा।
"हां, और आप??"
"वकार अहमद, वह आदमी जिसे तुम्हारी मदद करनी है"
"लेकिन आप गली के चक्कर क्यों लगा रहे थे??" निधि ने बिना किसी झिझक सीधे पूछ लिया। वकार अहमद तकरीबन 55 वर्ष की उम्र वाला व्यक्ति होगा। उसके चेहरे पर झुर्रियां थी और आंखों की पुतलियां लगभग बाहर आई हुई थी।
"यह देखने के लिए की यहां कोई हम पर निगरानी तो नहीं रख रहा" वह आगे बोला "आओ, मेरे पीछे पीछे आओ"
निधि बिना किसी सवाल उसके पीछे चलने लगी। दोनों मस्जिद के आगे से निकले और मुख्य शहर से होते हुए दूसरी गली में चले गए। इस गली में तकरीबन तीन मंज़िल के काफी सारे घर बने हुए थे। घर की दीवारों को मरम्मत की आवश्यकता थी।
काफी सारे घरों के गुजरने के बाद वह दोनों एक तीन मंजिला घर में घुस गए जो दूसरे घरों से थोड़ा सा अलग था। इसकी दीवारें कुछ ज्यादा ही कमजोर थी। दोनों इस घर की दूसरी मंज़िल में गए और एक कमरे के सामने जाकर रूक गए। वकार अहमद ने आगे बढ़कर दरवाजा खटखटाया।
दरवाजा खटखटाने के बाद अंदर से किसी की चलने की आवाज आई और एक बूढ़ी औरत ने दरवाजा खोला "ओह आप आ गए" उसने सलाम कहते हुए वकार अहमद को कहा। "हां, वो लड़की भी आ गई है" बूढ़ी औरत ने निधि को भी सलाम किया।
सब अंदर आ गए। वकार अहमद ने एक कुर्सी खिसकाई और उसे निधि को बैठने के लिए दिया। निधि ने अपना लंबा-चौड़ा बुर्का उतारा और उसे साइड में रख कुर्सी पर बैठ गई। बूढ़ी औरत उसे थोड़ी तिरछी नजरों से देखा। वकार अहमद भी उसके सामने रखी कुर्सी पर बैठा और बूढ़ी औरत को कुछ खाने पीने के लिए लेकर आने को कहा। वह अभी भी निधि को घूर रही थी। वकार अहमद ने उसे दोबारा बोला जिसके बाद वह अंदर किचन की तरफ चली गई।
"और.. तुम्हें यहां आने में किसी तरह की दिक्कत तो नहीं हुई??"
निधि मुस्कुराई और मुस्कुरा कर कहा "जी नहीं नहीं, किसी तरह की दिक्कत नहीं हुई"
"अल्लाह का शुक्र है" वकार अहमद बोले और साथ वाले कमरे के दरवाजे की तरफ देखने लगे। वहां से बूढ़ी औरत चाय और खाने के सामान के साथ लड़खड़ाते हुई आ रही थी। उसने चाय और खाने का सामान मेज पर रखा और वापस चली गई।
"लो, नाश्ता करो" वकार अहमद ने निधि को नाश्ता करने को कहा और खड़े होकर खुद बाहर वाले दरवाजे की कुंडी बंद करने चलें गए।
निधि ने पीछे से उन्हें शुक्रिया कहा और चाय का कप उठाकर कुर्सी पर आराम से बैठ गई।
वकार अहमद ने दरवाजे की कुंडी बंद की "मुझे कैप्टन रोड ने बताया था कि तुम यहां सिर्फ कुछ दिनों के लिए आई हो, जब तुम्हारी कार्रवाई पूरी हो जाएगी तुम चली जाओगी।"
"जी हां"
"वैसे तो तुम्हें यहां किसी तरह का खतरा नहीं है, लेकिन आर्मी और पुलिस से बचकर रहना पड़ेगा। जंग का माहौल है तो कभी भी कुछ भी हो सकता है"
"जी हां" निधि ने फिर से जवाब में सर हिलाया।
"तुम अपना काम कल सुबह से शुरू कर सकती हो…. मैं तुम्हें सबसे पहले वह जगह दिखा दूंगा जहां तीनों एजेंट रहते थे। तीन में से एक एजेंट यहीं मरा है जबकि बाकी के दो एजेंट सीरिया में मारे गए थे।"
"हममम"
"यहां रहने वाले एजेंट को हार्टअटैक आया था, ऐसे में संभावना है कि उसे जहर दिया गया हो अब जहर किसने दिया है नहीं पता"
निधि रुकी और बोली "अगर जहर दिया गया है तो क्या पता वह खाने वाली चीज में दिया होगा" उसने इस हिसाब से कहा जैसे उसे लगा कि शायद यह किस्सा आसानी से सुलझा लेगी।
"हां, लेकिन वह अपना खाना खुद बनाता था” इसके बाद निधि बिल्कुल खामोश हो गई।
चाय पीने के बाद वकार अहमद खड़ा हुआ और उसने एक दूसरे कमरे का दरवाजा खोला। "तुम आज रात को यहां सो सकती हो"
निधि ने उठ कर कमरे की हालत देखी। यह कबाड़ से कम नहीं था। "क्या यह हमारी बेस है" उसने बड़ी हैरानी से पूछा।
"हां!! हम लोग अमेरिका या ब्रिटेन में नहीं .....इराक में है.... और यहां हमें ऐसी बेस बनाने की ही इजाजत मिली है"
जवाब में निधि ने कहा "ठीक है, मुझे किसी तरह की दिक्कत नहीं होगी"
वकार अहमद ने एक हल्की सी मुस्कान दिखाई और फिर निधी को वहीं छोड़ चला गया। उसके जाने के बाद निधि ने कमरे का दरवाजा बंद किया और कमरे की दूसरी चीजों को देखने लगी।
वहां एक टूटा हुआ पलंग, एक पुराना सोफा, कुछ टूटी हुई कुर्सियों का ढेर और एक अलमारी थी। निधि टूटे हुए पलंग पर जाकर बैठ गई और सोचने लग गई।
"बंदा तो यह भी कम नहीं…. हो सकता है यह भी साजिश में शामिल हो…. किसी पर विश्वास नहीं किया जा सकता….. निधि तुम्हें सावधान रहना होगा"
CHAPTER-8
विनम्र का किडनैप हुए साइंटिस्ट को लेकर आना और उसे सीरिया घुमाना
सीरिया का एयरपोर्ट
तेज धूल भरी आंधियां चल रही थी। दूर दूर तक देखने पर सिवाय रेत के और कुछ नहीं दिख रहा था। यह शहर के बाहर बनी हुई एक जगह थी जहां एक सीधी सड़क जहाजों के उतरने के लिए बनाई गई थी। विनम्र वहां खड़ा अमेरिका से आने वाले जहाज का इंतजार कर रहा था। उसने एक चेक वाली शर्ट और जींस पैंट पहन रखी थी। आंखों पर काले रंग की चश्मा था जो उसे धूप और तेज धूल भरी आंधी, दोनों से बचा रहा था। विनम्र की जीप इस वक्त जहाज उतरने वाली पट्टी के बीचों-बीच खड़ी थी।
जल्द ही आसमान में जहाज के आने की आवाज गूंजने लगी, विनम्र ने गर्दन उठाकर आसमान की तरफ देखा। वहां उसे जहाज नीचे उतरते हुए दिखाई दे रहा था। वह जीप में बैठा और उसे साइड में कर लिया। जल्द ही जहाज रनवे पर उतरा और गति को कम करते करते बिल्कुल विनम्र के पास आ गया।
जहाज में गिनती के 7 से 8 लोग थे। जिनमें एक साइंटिस्ट, औरत और उन्हें पकड़ने वाले लोग शामिल थे। जहाज के रुकने के तुरंत बाद एक के बाद एक सभी आदमी नीचे उतरने लगें।
सबसे पहले साइंटिस्ट नीचे उतरा जिसने अपने साथ उस लड़की को भी पकड़ रखा था जो उसे संयुक्त राष्ट्र संघ की होने वाली सभा में मिली थी। इस ठरकी साइंटिस्ट ने अभी तक उसका हाथ नहीं छोड़ा। उसके बाद बाकी के आदमी एक-एक कर उतरे।
विनम्र ने आगे बढ़कर साइंटिस्ट से हाथ मिलाया और उसे गाड़ी में बैठने के लिए कहा। साइंटिस्ट के साथ-साथ औरत भी गाड़ी में बैठ गई, लेकिन वह आदमी जो उसके साथ आए थे, वह वही खड़े थे। उन्हें लेने के लिए कोई गाड़ी भी नहीं आई थी। यहां सिर्फ एक गाड़ी ही खड़ी थी जो विनम्र लेकर आया था। उन आदमियों का लीडर आगे आया और विनम्र से बोला
"क्या बात है... हमें लेने के लिए कोई गाड़ी नहीं आई"
विनम्र मुस्कुराया और गाड़ी का दरवाजा बंद कर उनकी तरफ मुड़ा "मरने वालों को ले जाने का काम यमराज करता है…. विनम्र नहीं"
"क्या!!" उसके साथ-साथ वहां खड़े बाकी सभी आदमी भी हैरान हो गए "यह तुम क्या कह रहे हो…."
विनम्र ने अपनी पिस्तौल निकाली और उसके सर रखते हुए कहा "कुछ भी नहीं" और फिर चला दी।
सिर्फ एक झटके में ही बंदूक की गोली उसके सर के आर पार हो गई। वहां खड़े बाकी आदमी यह देखकर डर गए और भागने लगे।
वह छह आदमी थे जो अपनी जान बचाकर भाग रहे थे।
विनम्र ने दूर से उन पर निशाना बनाया और एक-एक कर उनकी पीठ पर गोली मारने लगा। गोली लगते ही आदमी मर रहे थे। सभी आदमियों को मारने के बाद उसने अपनी बंदूक वहीं फेंक दी और जेब से एक रिमोट निकाला।
फिर गाड़ी में बैठा और गाड़ी चला कर थोड़ा सा दूर चला गया। पीछे साइंटिस्ट और उसके साथ की औरत दूसरे ही कामों में व्यस्त थे।
विनम्र ने मुड़ कर पीछे देखा और फिर वापस आगे देखने लग गया। रनवे से दूर जाने के बाद विनम्र ने रिमोट का बटन दबा दिया। जिसके बाद एक बड़ा धमाका हुआ और पीछे खड़ा जहाज और पूरा का पूरा रनवे उड़ गया।
"विनम्र कभी कोई सबूत नहीं छोड़ता, सबूत तो दूर की बात उसे कभी वह जगह भी नहीं मिलती जहां वो लोग सबूत ढूंढ़ते हैं" विनम्र ने मुस्कुराकर कहा और गाड़ी के गियर बदलकर उसकी स्पीड खींच ली
अगले 2 घंटे के सफर के बाद विनम्र उन्हें शहर की छोटी-मोटी चीजों की जानकारी दे रहा था। सबसे पहले वह दरगाह के पास गए।
विनम्र ने बताया की यह दरगाह 1100 साल पुरानी है, इसे किसी जमाने में खास चूने पत्थर की मिट्टी से बनाया गया था। कारीगरी इतनी उम्दा थी कि आज भी इसे नुकसान नहीं हुआ।
दरगाह दिखाने के बाद वह उन्हें मार्केट की तरफ ले गया। मार्केट वाली गली से निकलने के बाद उसने वहां की नदी दिखाई। सीरिया में जलवायु भिन्न होने के बावजूद भी यहां का सौंदर्य देखते ही बनता था।
मार्केट दिखाने के बाद वह उन्हें वहां की शॉपिंग मॉल में ले गया। शॉपिंग मॉल में दोनों ने जमकर शॉपिंग की। अब करनी भी थी, उनके कौन से पैसे लग रहे थे। उनका पूरा बिल विनम्र ने दिया।
शॉपिंग करने के बाद अब खाने की बारी थी। विनम्र उन्हें लेकर वहां की सबसे बेस्ट रेस्टोरेंट में गया। रेस्टोरेंट में तकरीबन 2 घंटे का वक्त बिताने के बाद वह बाहर आकर फिल्म देखने चले गए।
विनम्र को ऑर्डर था कि वह इनकी देखभाल और सेवा करें। साइंटिस्ट तो पागल था ही था अब उसके साथ एक और पागल औरत मिल चुकी थी। दोनों ऐसी पागलों वाली हरकतें कर रहे थे कि किसी को भी उनसे चिढ़ हो जाए। लेकिन विनम्र उन दोनों को ही झेल रहा था। उन दोनों को थिएटर में छोड़ कर विनम्र बाहर आ गया और अपने बॉस को फोन मिलाया।
"हेलो सर, यह मुझे कहां फंसा दिया आपने। इनके साथ रह रहकर मैं भी पागल हो जाऊंगा"
सामने से जवाब आया "तुम फिकर मत करो, कल सुबह तक इन लोगों के रहने का इंतजाम हो जाएगा। हम लोग एक एडवांस लैब को चालू कर रहे हैं जिसका काम आज रात को ही खत्म होगा। बस जैसे-तैसे करके इन्हें झेल लो"
"आपको लगता है यह दोनों पागल आपके काम आएंगे"
"हमें उनके पागल होनी से कोई मतलब नहीं, हमें बस उनके एक्सपेरिमेंट चाहिए"
"ठीक है, लेकिन जो भी हो जल्दी करें। कहीं ऐसा ना हो कल सुबह का सूरज निकलने से पहले ही में दोनों का कत्ल कर दूँ"
"हा हा हा" सामने वाले आदमी ने हँसकर उसकी बात पूरी तरह से टाल दी।
CHAPTER-9
निधि का पहले एजेंट की छानबीन करना
चिड़ियों की चहचहाहट के साथ अगले दिन की शुरुआत हुई। दिन खुशनुमा था। आसमान में हल्के बादल थे। रेगिस्तानी इलाके में इस तरह के बादल एक सुखद एहसास देने के लिए जाने जाते हैं। वैसे भी रेतीली जमीन पर बादल कम ही देखने को मिलते हैं। तकरीबन 6:30 बजे वकार अहमद बाजार से सब्जी लेकर आया और उसे अपनी पत्नी को बनाने के लिए दे दी। इसके बाद उसने निधि के कमरे की तरफ देखा जो अभी भी अंदर से बंद था। "लगता है वह अभी भी सो रही है" उसने मन ही मन सोचा और नहाने चला गया। वकार अहमद की पत्नी ने सब्जी काटी और झौंक लगा दी। एक तरफ उसने चाय भी रख दी। जैसे ही निधि बाहर आएगी वह उसे चाय दे देंगे। आधा घंटा और बीत गया। सुबह के 8:00 बज चुके थे। निधि के लिए जो चाय बनी थी वह उन लोगों ने खुद पी ली, पर निधि अभी तक बाहर नहीं आई। इसके बाद दोनों अपना-अपना काम करने लग गए। वकार अहमद की पत्नी घर की सफाई करने में व्यस्त हो गई तो खुद वकार अहमद अखबार पढ़ने में।
इंतजार करते करते सुबह के 10:00 बज चुके थे। वकार अहमद और उसकी पत्नी को बड़ी बेसब्री से निधि के बाहर आने का इंतजार था। उन्हें लगा था कि निधि जल्दी उठ जाएगी। लेकिन नहीं!! निधि को देर तक सोने की आदत थी।
10:00 बजे के बाद अचानक दरवाजे की कुंडी खुली और निधि अंगड़ाइयां लेते हुए बाहर आई। उसे इस बात का बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि बाहर वकार अहमद और उसकी पत्नी इंतजार में उसका रास्ता देख रहे थे।
सब एक-दूसरे के आमने-सामने थे, एक अजीब सी स्थिति बन गई। वह उन्हें देख रही थी और वो निधि को। निधि ने अचानक अपने हाथ नीचे किए और वकार अहमद की सामने वाली कुर्सी पर जाकर बैठ गई।
"गुड मॉर्निंग" इन हालातों में निधि के मुंह से बस यही निकला।
वकार अहमद ने तिरछी नजरों से पहले निधि को देखा और फिर अपनी पत्नी को और कहां " जाओ जाकर इसके लिए चाय और नाश्ता ले आओ, कुछ इस्लामी कपड़े भी ले आना। अगर यह इस तरह से बाहर गई तो हम लोगों पर आफत आ जाएगी"
निधि ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई। बस एक बार अपने कपड़ों को देखा, जो हद से भी ज्यादा छोटे थे। तकरीबन आधे घंटे बाद चाय पानी और नाश्ते का काम खत्म हो चुका था।
निधि ने इस्लामी कपड़े पहने और खुद को बुरके में बंद कर लिया। वकार अहमद ने अपने पत्नी को आल्हा हाफिज बोला और कल की योजना का अनुसरण करने लगे।
उन्हें सबसे पहले इस जगह पर मरने वाले एजेंट की छानबीन करनी थी। दोनों उस एजेंट के घर के तरफ वाले रास्ते पर चल दिए।
रास्ते में वकार अहमद ने निधि को बताया की उस एजेंट को मरे हुए काफी दिन हो गए, लाश तो सरकार ने अपने कब्जे में ले ली पर उसका कमरा अभी भी वैसे का वैसा ही पड़ा था। यहां के लोगों के आलसी पन के कारण किसी ने उस कमरे की जांच नहीं की। हो सकता है वहां तुम्हें कुछ काम की चीज मिल जाए। निधि वकार अहमद की हर बात का जी में जवाब दे रही थी।
तकरीबन 10 से 15 मिनट के सफर के बाद दोनों पास के ही मोहल्ले में बनी दूसरी गली में चलते हुए नजर आए। रास्ते में कुछ जान पहचान के लोग भी मिले जो सिर्फ वकार अहमद को जानते थे। वह उन सबको खुदा हाफिज, सलाम इत्यादि जैसे शब्द कहकर बुलाता गया। निधि को यह बात थोड़ी अजीब लगी। इस आदमी की अच्छी-खासी जान पहचान है पर इसके बावजूद कोई इस पर शक नहीं करता। वह उस एजेंट को भी जानता है तो ऐसे में उससे मिलने भी आता होगा। क्या किसी का इस बात पर शक नहीं गया की यहां एक एजेंट भी रहता है। छोड़ो, मैं भी फालतू में ऐसे ही सोच रही हूं। निधि ने कहा और अपने दिमाग को आराम दे दिया।
कुछ देर और रास्ते में चलने के बाद निधि ने कुछ सवाल वकार अहमद से पूछने शुरू कर दिए। उसने वकार अहमद से पहले उनके खुद के काम के बारे में पूछा। जिसके जवाब में वकार अहमद ने बताया कि उसका काम फील्ड प्लानिंग का था। वह यहां आए हुए एजेंट की मदद करने का काम करता है। उनके खाने-पीने से लेकर सोने तक, प्रत्येक चीज की जिम्मेदारी उसकी होती है। उसको पैसे, जरूरी हथियार, दस्तावेज यह सब लाने का काम वही करता है।
निधि ने दूसरा सवाल पूछा, जिस एजेंट की मौत हुई है क्या उसकी किसी से दुश्मनी थी। कोई ऐसा जो उस पर शक कर रहा हो??
"नहीं" वकार अहमद ने चलते हुए जवाब दिया। "वह एजेंट इतना सक्रिय नहीं था। ज्यादातर काम कमरे में ही करता था। उसके तो खाने-पीने का सामान भी मैं ही लेकर आता था। स्वभाव मैं फ्रेंडली था, इसलिए उसने किसी से लड़ाई भी मोल नहीं ली"
हाँ बात भी हैरानी वाली थी। किसी से दुश्मनी नहीं, पर इसके बावजूद किसी ने उसे मार दिया। निधि ने मन ही मन सोचा और उसके बाद आगे का सवाल पूछा "क्या दूसरी एजेंसियां उसके पीछे पड़ी थी??"
"यहां दूसरी एजेंसी के लोग सक्रिय ही नहीं" वकार अहमद ने जवाब दिया” दूसरी एजेंसियों के सारे प्रोजेक्ट बंद हो चुके हैं। खुफिया सूत्रों से पता चला है की अमेरिका भी पहले इस केस में इंवॉल्व था पर उसने भी अब अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं"
"सरकारी एजेंसी से कोई दुश्मनी??" निधि ने अंदेशा जताया।
"इराक की सरकारी एजेंसी बहुत ढीली चल रही है, अगर उनमें इतना दम होता तो वह हमें क्यों हायर करते"
"यह बात भी सही है" निधि ने कहा और फिर आगे बोली "इराक की सरकारी एजेंसी से कोई भी अगर दुश्मन नहीं तो सीरिया की एजेंसी के लोग? वह तो पक्का दुश्मन होंगे। क्या पता उन्हें पता चल गया हो कि हम उनके देश के प्रधानमंत्री को मारना चाहते है, और उन्होंने हम पर सर्जिकल स्ट्राइक कर दिया"
"अगर ऐसा होता तो हमारे बाकी के एजेंट भी मारे जाते। सीरिया में अभी काफी सारे एजेंट सुरक्षित है। उन पर किसी तरह का कोई खतरा नहीं आया। "
"मतलब आपका कहना है कि ना तो बाहरी एजेंसी का इसमें हाथ है और ना ही अंदरूनी एजेंसी का, कोई तीसरा ही है जो उसकी मौत का कारण बना" निधि ने सभी बातों का निष्कर्ष निकालते हुए कहा।
"आमीन, यहां के हालात वैसे नहीं जैसे आप सोच रही हैं। बिना जान पहचान के दूसरे देश के पक्षी भी यहां पर नहीं मार सकते, इन्सान तो बहुत दूर की बात है। हालात और चीजें यही बता रही की हमारे किसी अन्दर के आदमी का ही हाथ है। हो सकता है चंद रुपयों के लिए उसने अपना ईमान बेच दिया हो..... जिसके बाद यह काम किया "
"पर यहां अन्दर का आदमी है कौन..?? आप?? पर आप उसे क्यों मारेंगे"
वकार अहमद के कदम अचानक रूक गए। उसने निधि को देखा और काफी देर तक देखा। फिर वापिस चलने लगा। "सीरिया में हमने कुछ एजेंट भेजे थे। अभी नहीं बल्कि कुछ साल पहले.. तकरीबन छह एजेंट थे.... वह लोग वहां 7 साल से काम कर रहे हैं। जब उन्हें भेजा था तब उनकी उम्र 13 से 14 साल के आसपास थी.....हमारा मकसद था कि उन्हें वहां की नागरिकता मिल जाए और वह लोग वहां की सेना में भर्ती हो जाए। अक्सर एक एजेंसी अलग-अलग देशों में इस तरह के खुफिया एजेंट भेजती रहती है, जो उन्हें शेडी देने का काम करते हैं। उस समय हमें बिल्कुल नहीं पता था कि आगे चलकर हमें इस तरह के मिशन पर काम करना पड़ेगा। मुझे शक है कि उनमें से कुछ एजेंट सीरिया के साथ मिल चुके हैं।"
सीरिया में!! लेकिन उन्हें कंट्रोल कौन कर रहा है। जैसे यहां की कमान आपके हाथ में हैं, वैसे ही सीरिया में स्पेस एकेडमी की कमान किसके हाथों में हैं"
"है एक कमीना इन्सान, धोखा उसकी रग रग में भरा है। ' कमांडर विनम्र' वह एक नम्बर का कमीना इन्सान है"
" विनम्र!!" निधि ने आश्चर्य से कहा।
"तुम्हारे लिए तो यही अच्छा है कि तुम उसके बारे में ना जानो, वह किसी का भी सगा नहीं, उसने कई बार हमारे लोगों को धोखा दिया है"
"पर इसके बावजूद वह वहां का कमांडर है!! बात कुछ हजम नहीं हुई"
"उसकी नेतृत्व क्षमता जबरदस्त है, सीरिया में कोई उसका विद्रोह करने का दम नहीं रखता, बड़े-बड़े नेताओं के साथ उसका उठना बैठना है, सेना में भी पहुंचे हैं। अगर किसी ने विद्रोह किया तो वो एक पल नहीं लगाएगा उन्हें खत्म करने में"
"लेकिन वह काम किसके लिए करता है??"
"कोई नहीं जानता, एक पल लगता है वह हमारे साथ हैं पर अगले ही पल वह सीरिया का साथ दे रहा होता है। सीरिया में वह सेना की एक टुकड़ी का कमांडर है। यह कमांडर नाम भी इसीलिए पड़ा है।"
दोनों बातें करते-करते एजेंट के कमरे तक पहुंच चुके थे। कमरे के सामने पहुंचते ही उन दोनों की बातें रुक गई। वकार अहमद ने इशारा कर बताया की एजेंट का कमरा ऊपर की तरफ है। ऊपर जाने के लिए सीढ़ियां थी। वकार अहमद वही सीढ़ीयों पर रुका और निधि को अकेले आगे जाने के लिए कहा।
सीढ़ियों की मदद से निधि कमरे में पहुंची और दरवाजा खोला। कमरे में ज्यादा कुछ नहीं था। एक बेड था। एक अलमारी थी। एक एलसीडी स्क्रीन और एक कपड़े रखने वाली अलमारी। इसके अतिरिक्त एक जूते रखने वाला बेंच था।
निधि ने सबसे पहले कमरे को अपनी आंखों से देखा। फिर धीरे-धीरे वहां की चीजों को उठाकर देखने लगी। उसने एलसीडी स्क्रीन के पीछे का हिस्सा, जूतों वाले मेज के आसपास का हिस्सा, यहां तक कि जूतों के अंदर की चीजें भी देखी।
इसके बाद वह अलमारी की तरफ बढ़ी और अलमारी को खोला। उसमें कपड़े और कुछ खाली कागज थे। निधि ने वहां की हर एक चीज निकाल कर चेक की। कहीं भी कुछ संदिग्ध नहीं था। अलमारी देखने के बाद उसने अलमारी के कोने भी देखें, अलमारी के ऊपर की जगह की भी तलाशी ली। अंत में उसने बेड के बिस्तर को उठाकर बेड के नीचे देखा। "यहां तो कुछ भी ऐसा नहीं जो काम आए" पूरा कमरा देखने के बाद निधि कमरे से बाहर आ गई। बाहर कुछ गुलदस्ते पड़े थे। निधि ने एक नजर उन गुलदस्तों को भी उठाकर देखा। "इनमें भी कुछ नहीं" फिर वह सीढ़ियों से नीचे आई और आकर वकार अहमद के पास खड़ी हो गई। "यहां तो ऐसा कुछ नहीं मिला जिससे कोई सुराग मिलें"
"मैंने तो पहले ही कहा था" सामने से वकार अहमद बोला " यहां जो भी था उसे मारने वाला पहले ही ले गया होगा, चलो अब चलें"
दोनों वापिस जाने के लिए मुड़ गए।
लेकिन थोड़ी दूर जाने के बाद बीच रास्ते में निधि के मन में पता नहीं क्या विचार आया, वह तेजी से कूदी और बोली” अंकल, आप चलो.. मैं अपने आप आ जाऊंगी। कुछ रह गया है जिसकी मुझे जांच करनी है"
"लेकिन मैं तुम्हें ऐसे अकेले नहीं छोड़ सकता" सामने से वकार अहमद ने कहकर उसे रोकने की कोशिश की।
लेकिन निधि नहीं मानी "आप मेरी चिंता मत कीजिए.... बस में एक डेढ़ घंटे में ही आ जाऊंगी"
इसके बाद वह दौड़ कर वापस एजेंट के कमरे की तरफ चली गई। पीछे से वकार अहमद उसे देखता रह गया। "पता नहीं इस लड़की को यहां क्यों भेजा गया है, इसकी तो हरकतें भी बच्चों जैसी है....." फिर मुड़कर अपने रास्ते लग गया।
निधि तेजी से कमरे में गई और जाकर एक बार फिर से अलमारी खोली। फिर वहां के तमाम खाली कागज पत्र निकाले और उसे बेड पर गिरा लिया।
"स्पेस एकेडमी के एजेंट हमेशा अपने तेज दिमाग के लिए जाने जाते हैं। किसी भी मिशन को पूरा करने से पहले उनका एक बैकअप प्लान होता है.... और उसे वह लोग छुपा कर रखते हैं" निधि बोलने के साथ-साथ एक एक कागज को गौर से देख रही थी।
इसके बाद उसने ढेर सारे कागजों में से दो कागज छांटें और उन्हें धूप की तरफ करके देखा। वह खाली थे पर इसके बावजूद निधि पता नहीं क्यों खुश हो रही थी। "एकेडमी में हमें चीजों को छुपाना सिखाया जाता है...." उसने कहा और बाहर गमलों की तरफ आ गई। फिर गमलों की मिट्टी नीचे गिराई और कुछ हिस्सा अपने हाथ में लेकर वापस अंदर आ गई। मिट्टी का हिस्सा उसने दूसरे कागज पर रखा और कमरे में पानी ढूंढने लगी। "कागज पर चीजों को छुपाने के लिए हमें खास तकनीक का प्रयोग करते हैं..... और वह तकनीक है केमिकल वाली लिखाई..... इस लिखाई में पहले एक केमिकल से कागज पर चीजें लिख ली जाती है...और जब उस पर दूसरा केमिकल गिराया जाता है तो वह लिखी हुई चीजें दिखाई देने लगती है"
पानी मिलने के बाद निधि ने उसे गमले की मिट्टी में मिला दिया। मिट्टी और पानी दोनों ने मिलकर कागज को मटमैला कर दिया। निधि ने वह कागज़ उठाया और उसे बाकी के दो छांटें हुए कागजों से रगड़ने लगी। फिर उसे धूप की तरफ करके देखा.... उस पर कुछ शब्द उभर कर आ गए थें। वह कुछ आड़ी टेढ़ी लकीरें थी।
"शाबाश निधि" निधि के चेहरे पर एक अजीब ही खुशी थी। मानो उसके हाथ कोई खजाना लग गया हो। उसने अपनी जेब से मोबाइल निकाला और दोनों कागजों का स्क्रीनशॉट ले लिए। फिर कमरे की चीजों को वैसे ही करने लगी जैसे वह पहले थी। जो कागज वह खराब कर चुकी थी, उसने उन सभी कागजों को समेटा और अपने हाथ में ही पकड़ लिया। बेड की चादर, अलमारी के कपड़े... सब के सब जो के त्यों ही सजा दिए।
अंत में वह बाहर आ गई, उसके हाथ में जो कागज के टुकड़े थे उसने वह वहां की नाली में फेंक कर उन्हें आगे बहा दिया। यहां तक का काम तो हो गया... पर अभी आगे का काम बाकी था। इन लकीरों का मतलब क्या है.... यह चीज भी समझनी है।
CHAPTER-10
विनम्र का साइंटिस्ट को प्रधानमंत्री से मिलाना, उसका नया काम और साइंटिस्ट के एक्सपेरिमेंट
अगले दिन सुबह-सुबह विनम्र उन दोनों के लिए चाय बना कर उनके कमरे में लेकर गया। उसके हमेशा साफ सुथरे दिखने वाले कमरे की हालत आज कबाड़ से भी बदतर हुई पड़ी थी। उसने गुस्से से अपने कमरे को देखा और फिर उन दोनों को। उसके बाद अपनी कमर में लटक रही पिस्तौल को ।
"मन तो कर रहा है अभी इन दोनों को शूट कर दूँ, पर मजबूर हूं "
उसने चाय साइड में रख कर अपनी लात साइंटिस्ट के पिछवाड़े में मारी। साइंटिस्ट सीधे बेड से नीचे गिर गया। नीचे गिरते ही उसकी आंख खुली और वह हड़बड़ी से उठा "क्या हुआ क्या हुआ..... भूकंप आ गया क्या"
"नहीं नहीं सर" विनम्र बोला "आप बेड से नीचे गिर गए थे"
फिर आगे बढ़कर उसने साइंटिस्ट को खड़े होने में उसकी मदद की। "आपके लिए चाय लेकर आया पी लीजिए"
"सिर्फ चाय, खाने के लिए कुछ नहीं है क्या"
विनम्र ने उसे गुस्से से देखा और मन ही मन कहा "तुम्हें खाने के लिए कुछ चाहिए...... दिमाग है, दिमाग खा लो सालो" जबकि सामने बोला" आपको खाने के लिए कुछ चाहिए.... मेरे पास तो सिर्फ ब्रेड है।।।।"
"ठीक है.... वही ले आओ"
विनम्र ने उन दोनों को ब्रेड लाकर दे दिए। फिर बाहर जाकर सोफे पर बैठ गया। बैठते ही उसके फोन की घंटी बजी और उसने फोन उठाया।
"सुनो" सामने से आवाज़ आई "बेस का इंतज़ाम हो गया है। मैं तुम्हें एड्रेस भेज रहा हूं उन दोनों को लेकर वहां आ जाओ। तुम्हारे लिए एक सरप्राइज भी है"
"सरप्राइज..!! लेकिन क्या"
"वह तो तुम्हें यहां आकर ही पता चलेगा"
"ठीक है" विनम्र ने जवाब दिया और फोन काट दिया।
ठीक 2 घंटे बाद वह फोन पर बताएंगे एड्रेस पर था। यह शहर से बाहर बनी एक अलग ही तरह की जगह थी। एक 6 मंजिला बिल्डिंग जिसके चारों ओर सख्त तारबंदी और कड़ी सुरक्षा थी। जगह-जगह सोल्जर बंदूक लेकर खड़े थे। विनम्र ने गाड़ी दरवाजे के पास खड़ी की और वहां के एक आदमी को बुलाया "पासकोड 00345"
आदमी ने पीछे जाकर वायरलेस पर कुछ बात की और फिर दरवाजा खोल दिया। विनम्र उस दरवाजे से अंदर चला गया।
अंदर भी कुछ ऐसा ही परिदृश्य था। बिल्डिंग में तकरीबन 70 से 80 सोल्जर खड़े थे। विनम्र गाड़ी से उतरा और साइंटिस्ट और उसके साथ की औरत को लेकर बिल्डिंग के अंदर चला गया।
अंदर दरवाज़े पर उसे रोक लिया गया। वहां कुछ आदमी आए और उन सभी को चेक किया। इसके बाद एक आदमी उन्हें अंडरग्राउंड जगह की ओर ले गया। यह जमीन से तकरीबन 15 मीटर नीचे बनी जगह थी। चारों ओर कांच के कमरे थे.... उनकी आरपार भी देखा जा सकता था। जैसे ही विनम्र और उसके साथ के आदमी वहां पहुंचे विनम्र को एक अति प्रभावशाली छवि कांच की दूसरी और दिखी।
यह सीरिया के प्रधानमंत्री थे। "लुइस इल्लल्लाह" उसके साथ उसकी सुरक्षा करने वाले आदमी और विनम्र को ऑर्डर देने वाला भी था। विनम्र ने वहां जाकर सब से हाथ मिलाया और खासकर प्रधानमंत्री से।
"वेल डन माय बॉय" लुइस इल्लल्लाह ने विनम्र से कहा "तुम्हारे जैसे लोगों की हमारे देश को सख्त जरूरत है। तुम आगे चलकर हमारे देश का नाम रोशन करोगे"
"जी सर" जवाब देने के बाद विनम्र भी उन सभी लोगों के साथ साइड में खड़ा हो। प्रधानमंत्री ने आगे बढ़कर साइंटिस्ट से मुलाकात की। "और कैसे हो जार्ज इरविन, तुम्हारे किस्से दुनिया भर में मशहूर है।" और अपना हाथ साइंटिस्ट से मिलाया। "क्या तुम हमारे साथ काम करोगे" हाथ मिलाने के बाद उसने आगे पूछा।
"मैं तो मरा जा रहा हूं काम करने के लिए..." जार्ज इरविन ने एक पागल साइंटिस्ट की तरह जवाब दिया "मुझे इस दुनिया को दिखाना है कि उसने किस इंसान को इग्नोर किया है। मैं यह पूरी दुनिया तबाह कर दूंगा"
वहां मौजूद सब आदमी यह सुनकर मुस्कुराने लगे। "जरूर मेरे मालिक जरूर" लुइस इल्लल्लाह ने उसके कंधे पर हाथ रख कर कहा "यह पूरी दुनिया अब हमारे कदमों में झुकेगी, आओ तुम्हें हमारी लैब दिखा देता हूं"
सब एक साथ लैब देखने के लिए चलने लगे। लैब सच में शानदार थी। वहां हर तरह का सामान मौजूद था। एक सुई से लेकर परमाणु बम बनाने तक का सामान, किसी भी चीज की कमी नहीं थी। पूरी लैब देखने के बाद साइंटिस्ट बोला "यह बिल्कुल वैसी ही लैब है जैसी कभी मैंने सपने में देखी थी"
"हम अच्छे से जानते हैं" लुइस इल्लल्लाह ने उसकी बात का जवाब दिया "यहां तुम्हें किसी चीज की कमी नहीं होगी, बस अब तुम वह काम करो जिसके बाद यह दुनिया हमारी आंखों से आंखें ना मिला सके"
"मैं आज से ही अपना काम शुरू कर दूंगा" जार्ज इरविन उछल कर लैब में चला गया "बस अब मुझे शांति चाहिए"
"ठीक है" प्रधानमंत्री ने सभी लोगों को वहां से जाने के लिए कहा। उनके साथ विनम्र भी जाने लगा और औरत भी।
साइंटिस्ट ने पीछे से जोर से आवाज़ लगाई "तुम कहां जा रही हो" यह उसने औरत के लिए कहा था।
औरत पीछे मुड़ी और प्रधानमंत्री की तरफ देखने लगी। प्रधानमंत्री ने आंखों ही आंखों में उसे उसके पास जाने का इशारा किया "अरे मैं कहां जाऊंगी, तुम तो जान हो मेरी" औरत ने कहा और वापिस साइंटिस्ट के पास चली गई।
प्रधानमंत्री, विनम्र और बाकी सब लोग अब ऊपर छत पर आ चुके थे। "मैंने तुम्हारी बहादुरी के बहुत किस्से सुने हैं। तुम्हें इसका इनाम मिलेगा” प्रधानमंत्री ने विनम्र से कहा।
"जी नहीं नहीं सर, मुझे इनाम नहीं चाहिए। बस आपका साथ बना रहे यही काफी है"
प्रधानमंत्री यह सुनकर मुस्कुरा दिए। "आने वाले समय में मैं तुम्हें सेना का जनरल बनाऊंगा।" इसके बाद उसने अपने साथ वाले आदमी को देखा। वह विनम्र को ऑर्डर देने का काम करता था। "तुम्हें पता है ना कि अब आगे क्या करना है, युसूफ "
"हां" युसूफ ने जवाब दिया।
इसके बाद प्रधानमंत्री वापिस विनम्र को देख कर बोला "यह तुम्हारा आखिरी काम है... इसे करने के बाद तुम्हारी जनरल की गद्दी पक्की समझो"
"जी सर, चिंता मत कीजिए काम हो जाएगा" विनम्र ने प्रधानमंत्री को सैल्यूट किया।
ठीक 25 मिनट बाद विनम्र और युसूफ दोनों उस जगह से दूर जा रहे थे। कार की स्पीड सामान्य थी।
"प्रधानमंत्री चाहते हैं कि तुम एक खास चीज की तलाश करो..…...वह सिर्फ हमारे लिए नहीं बल्कि बाकी के देशों के लिए भी बहुत इंपोर्टेंट है"
"ऐसा क्या खास है उसमें....."
"ना ही पूछो तो बेहतर है...... आखिरी बार उसे इंडिया के एजेंट के पास देखा गया था। शायद अब भी वही मिलेगी"
"इंडिया के एजेंट हर जगह अपनी टांग क्यों अड़ा रहे हैं.... जब अमेरिका इस चीज में अपने हाथ नहीं डाल रहा तो उन्हें इतनी क्या पड़ी है" विनम्र ने गाड़ी को मोड़ कर दूसरी तरफ किया।
"शायद वह खुद को शक्तिशाली साबित करना चाहते हैं। यह मत भूलो कि वह अब वैश्विक शक्ति बनने की कगार पर खड़ा है। अगर वह इस मुद्दे को सुलझा देता है तो उसे वैश्विक शक्ति बनने से कोई नहीं रोक सकता।"
"लेकिन मुझे नहीं लगता वह अब अपनी इरादों में कामयाब होंगे।" विनम्र ने गाड़ी के गियर को हल्का किया। "उनके सभी होनहार एजेंट हम खत्म कर चुके.... बाकी बचे खुचे एजेंट में इतनी हिम्मत नहीं कि वह यह काम करें... इंडिया तो वैश्विक शक्ति बनने से गया"
"इसी में हमारी भलाई है।"
इसके बाद विनम्र की जीप लंबी सड़क पर हवा से बातें कर रही थी।
CHAPTER-11
निधि का सीरिया जाना और उसकी विनम्र से मुलाकात
ठीक डेढ़ घंटे बाद निधि अपने कह अनुसार घर आ गई। घर आकर उसने खाना खाया और वकार अहमद से दूसरी बातें करने लगी "आप मुझे विनम्र के बारे में कुछ बता रहे थे…कहीं उसका तो इसके पीछे हाथ नहीं" निधि ने एक सधे हुए अंदाज में अपनी बात शुरू की।
"कुछ कह नहीं सकते, उसके पिता इंडिया में प्रोजेक्ट डिपार्टमेंट में काम करते थे। प्रोजेक्ट डिपार्टमेंट एक ऐसा ग्रुप था जो दूसरे देशों पर हमले करने की रणनीति बनाता था। इसके बाद उसके पिता ने विनम्र का नाम एडवांस ट्रेनिंग में जोड़ दिया, जिसके तहत उसे दूसरे देशों में छोटी उम्र के अंदर ही रहने सहने के लिए भेज दिया गया। विनम्र अपनी छोटी सी उम्र में सीरिया आया। फिर सीरिया की सेना में भर्ती होकर ट्रेनिंग ली। कई सालों तक एजेंसी उससे संपर्क में थी लेकिन बाद में वह संपर्क क्षेत्र से बाहर हो गया। सीरिया की सेना में शानदार काम करने की वजह से वह वहां का कमांडर बन गया और बाद में उन्हीं के लिए काम करने लग गया। वह एक शानदार जासूस था जो अपनी हर कला में माहिर है। उसकी सबसे अच्छी विशेषता दूसरों के चेहरे को पढ़ना है, जो वो पलक झपकते ही कर लेता है।
"लेकिन फिर भी, उस एजेंट के मरने के बाद सबसे ज्यादा फायदा सीरिया का हुआ है। लेकिन जैसा कि आपने कहा है कि सीरिया को अभी तक पता नहीं चला कि हम उनके प्रधानमंत्री को मारने की योजना बना रहे हैं, तो फिर उसे मारने का कारण क्या है। आखिर ऐसी कौन सी वजह थी जिसे कातिल ने उसे मारने पर मजबूर किया....?" निधि गहरे सोच-विचार में डूब गई।
"इसको तो वही बेहतर समझा सकता है जिसने उसका कत्ल किया। मैं तो अब इसका क्या जवाब दूं। हो सकता है पैसों का लालच हो या........फिर कुछ और…. या फिर हो सकता है बिना वजह ही कुछ"
निधि ने मधुरता से कहा “ बिना वजह कुछ नहीं होता, कुछ तो खास होगा..... जो इसकी वजह बना। लेकिन वह वजह अभी नजर नहीं आ रही”
"मैं तुम्हारी तर्कों से सहमत हूं" वकार अहमद बोला "लेकिन यहां पर ऐसा कुछ भी नहीं जिसके जरिए हम इन सब बातों का पता लगाए, तुम वापस गई थी ना….. क्या तुम्हें कुछ मिला" वकार अहमद ने बातों को घुमा कर तुरंत उस बात पर जोर दिया जिसके कारण वह वापिस गई थी।
"नहीं" निधि ने सहजता से जवाब दिया। "मुझे वहां कुछ भी नहीं मिला, एक बार तो लगा था कि मैं कुछ भूल चुकी हूं पर जब वहां जाकर वापस चेक किया तो खाली हाथ आई"
"ओह" वकार अहमद ने अफसोस जताया। "खैर, जल्दी कुछ हाथ लग जाएगा"
"मुझे भी ऐसा ही लगता है" निधि ने वकार अहमद को देखा "वैसे अब हमें आगे क्या करना है?" निधि ने पूछा। "यहां के एजेंट के पास जो मिलना था वह मिल गया लेकिन अभी दो एजेंट बाकी है"
"कुछ खास नहीं" वकार अहमद ने जवाब दिया "तुम्हारे सीरिया भेजने की तैयारी करनी है..."
"सीरिया" निधि चौंकी" लेकिन इराक से सीरिया... यह थोड़ा मुश्किल नहीं लगता" उसने अचंभित होते हुए कहा
"ज्यादा मुश्किल नहीं है....." वकार अहमद मुस्कुराया "दरअसल यहां के चरवाहे दोनों देशों की साझा संपत्ति है। उन्हें बॉर्डर क्रॉस करने की इजाजत है। मैं कुछ चरवाहे वालों को जानता हूं और वह मेरे लिए काम भी करते हैं। उनके साथ तुम्हें बॉर्डर क्रॉस करवा दूंगा"
"मुझे!! क्या आप नहीं जाएंगे??"
"मैं नहीं जा सकता। यहां के आर्मी के लोग मुझे जानते हैं, जिस कारण वो मुझे चरवाहा बिल्कुल नहीं समझेंगे"
"लेकिन मैं अकेली.... वह भी सीरिया में"
"डरने की बात नहीं, तुम्हें ज्यादा दूर नहीं जाना…... बॉर्डर के साथ वाले शहर में ही हमारी छोटी सी बेस है। वहां उन दोनों एजेंट की मौत हुई थी। हालांकि हमारा वहां कोई आदमी नहीं जो तुम्हारे काम आ सके, लेकिन वो बेस पूरी तरह से खाली पड़ी है। पुलिस और आर्मी का भी वहां आना जाना नहीं...। बॉर्डर क्रॉस करने के बाद तुम्हें आधा घंटा लगेगा वहां तक पहुंचने में, वहां जाकर उस बेस की जांच करना और शाम को चरवाहे वापस आएंगे तो उनके साथ वापिस आ जाना।"
वकार अहमद ने अपनी पूरी योजना निधि को बताई। योजना सुनने के बाद निधि गहन सोच-विचार करने लगी। "मुझे नहीं लगता किसी दूसरे देश में इस तरह जाकर ऐसे काम कर सकते हैं, लेकिन आपकी बातों से लगता है कि यह ज्यादा मुश्किल नहीं...... मुझे कोई आपत्ति नहीं" और जवाब दिया।
"मैं एक नक्शे का इंतज़ाम कर दूंगा। शहर की गलियां काफी छोटी छोटी है। इससे तुम आसानी से बेस तक पहुंच जाओगी। यह चरवाहे वहां 6 घंटे तक रुकेंगे। ऐसे में तुम्हें अपना सारा काम 6 घंटे के अंदर निपटाना है"
"अगर मुझे 6 घंटे से ज्यादा वक्त लगा तो"
"तब तुम्हें अगले दिन तक का इंतजार करना होगा, जब यह चरवाहे वापस आएंगे तब उनके साथ आ जाना"
"6 घंटे" निधि ने लंबी सांस लेकर कहां।
इसके बाद दोनों तकरीबन आधा घंटा और बातें करते रहे और अंत में अपने अपने कमरे चले गए।
अगले दिन सुबह होते ही निधि और वकार अहमद इराक के बॉर्डर का सफर कर रहे थे। उन दोनों ने औरतों के कपड़े पहन रखे थे। समय 5:00 बजे का होगा। दोनों बॉर्डर के आखिरी छोर पर आकर रुक गए। उनके सामने चरवाहों के समूह थे जो भेड़ों के साथ खड़े थे। वकार अहमद अकेले आगे बढ़ा और एक चरवाहे वाले से बात की। कुछ देर तक बात करने के बाद वह वापस निधि के पास आया "वह लोग मान गए हैं, शाम को तुम्हें वापस भी ले आएंगे"
इसके बाद वकार अहमद ने कुछ कागज निकाले और उसे निधि को दे दिया। "यह वहां का नक्शा, और नागरिकता के कागज हैं। अगर किसी भी तरह का खतरा आए तो संभाल लेना"
"ठीक है" निधि ने जवाब दिया।
इसके बाद निधि उन चरवाहों के साथ बॉर्डर क्रॉस करने लगी। यहां बॉर्डर पर ज्यादा पाबंदी नहीं थी। मिलिट्री के कुछ आदमी जरूर थे पर वह किसी तरह की हरकत नहीं कर रहे थे। शायद वह चरवाहों को काफी समय से जानते हैं इसलिए बिना किसी कागज पत्र के उन्हें आने-जाने दिया जा रहा था। इराक का बॉर्डर पार करने के बाद वह सीरिया के सैनिक क्षेत्र में थे। यहां काफी सारे घास के मैदान थे जो उन भेड़ों को चरने के लिए दिए जाते हैं। वहां पहुंचने के बाद चरवाहे ने निधि के लिए सुरक्षित रास्ता बनाया और उसे रेतीले टीलों के पीछे से निकाल कर सड़क के रास्ते लगा दिया।
सड़क का रास्ता सीधे शहर जाता था। सड़क पर चलते वक्त कई सारे विचार उसके मन में थे। "यहां बॉर्डर क्रॉस करना इतना आसान है, इस तरह से तो कोई भी बॉर्डर क्रॉस कर सकता है। बस आपको चरवाहों का साथ चाहिए। "
लगभग आधे घंटे के सफर के बाद वह शहर में थी। सुबह होते ही शहर में लोगों की चहल कदमी बढ़ जाती हैं। यहां भी कुछ ऐसा ही हाल था। कुछ लोग काम से आ रहे थे तो कुछ लोग काम को जा रहे थे।
निधि ने वहां पहुंच कर एक अच्छा सा रेस्टोरेंट ढूंढा और जाकर बैठ गई।
आगे क्या करना है इसके बारे में सोचने के लिए उसे कुछ सुकून के पल चाहिए थे। रेस्टोरेंट में बैठने के बाद उसने दो कप चाय के ऑर्डर दिए। दूसरे लोगों की नजरों से छुपा कर खुफिया तरीके से मेनू कार्ड के नीचे नक्शा निकाला और लोकेशन देखने लगी।
जल्दी ही टेबल पर चाय के दो कप पड़े थे। "यह रास्ता मच्छी मार्केट का, और यह रास्ता रेस्टोरेंट का जहां पर मैं अभी बैठी हूं। और यहां पर है बेस। मतलब, “वह पीछे मुड़ी और वहां का बोर्ड देखा। "मुझे यहां से दाएं जाकर तीन गली सीधे जाना है और फिर बाय मुड़ जाना है" उसने खुद से कहा और अपनी चाय खत्म करने लगी।
चाय खत्म करने के बाद वह अपने तय किए गए रास्ते पर चलने लगी। पहले बोर्ड से गुजरी, फिर तीन गली तक का सीधा सफर... और उसके बाद बाएं मुड़ गई। गली में आगे जाने के बाद सामने ही बेस वाला घर था।
निधि ने आसपास देखा और चुपके से उस बेस वाले घर में चली गई। घर दो मंजिला था, दीवारें खुरदरी पीले रंग की, अगर सामान्य भाषा में कहूं तो दीवारों का रंग पीला था और पपड़ी उतरी हुई थी। उन्हें मरम्मत की काफी ज्यादा जरूरत थी। यहां के बाकी घरों का भी यही हाल था।
घर का दरवाज़ा खोलने के बाद उसके सामने लंबे चौड़े हॉल का परिदृश्य था। इस हॉल के अंदर तीन कमरे, एक किचन, एक लोबी और दो बाथरूम थे। निधि ने सबसे पहले घर का दरवाज़ा बंद किया इसके बाद चारों ओर घूमकर कमरे को पहली नजर ऊपर से देखा। दीवारों पर तस्वीर टंगी हुई थी, किचन में बर्तन पड़े थे जो धोने वाले थे। इन्हीं तस्वीरों के बीच अलग-अलग निशान थे। निधि ने उन निशानों को करीब से देखा। "यह तो गोली लगने के निशान, मतलब यहां गोलीबारी हुई है।" उसने सोचा और फिर निशानों की गहराई नापने के लिए माचिस की तीली निकाली। गहराई देखने के बाद उसने निशानों के विपरीत दिशा में गौर किया। वहां एक खिड़की थी जो इस दीवार के सामने आती थी। खिड़की और निशानों की गहराई बता रही है यह गोलियां बाहर से चली है। निधि चलकर खिड़की के पास आई और वहां से बाहर देखा। बाहर एक और घर था जो तीन मंजिला था। यह घर खिड़की के ठीक सामने था जिस कारण वह निधि के लिए जिज्ञासा का विषय बन गया।
निधि ने अपना ध्यान वापिस सामने वाले कमरे से हटाया और गोलियों की जांच करने के बाद उसने कमरों की जांच करनी शुरू कर दी।। सबसे पहले इस निशान के ठीक बगल में बने कमरे की जांच की। वहां का सामान बिखरा हुआ था। बेड की चादर, अलमारी, कपड़े सब इधर-उधर पड़े थे। किसी ने इस कमरे की पहले ही तलाशी ले रखी थी। लेकिन इसके बावजूद निधि वहां की चीजों को देखने लगी। सबसे पहले उसने कपड़ों को देखा, फिर अलमारी के हिस्से को और फिर बेड को। बेड के नीचे वाले साइड पर कुछ खरोंच के निशान थे। यह निशान उस जगह पर थे जहां आदमी सोते वक्त अपना सर रखता है।
निधि ने उन निशानों को बड़े आश्चर्य से देखा और तेजी से हरकत में आई। वह उछल कर बैड के दूसरी तरफ गई और बेड को खिसका कर साइड में किया। वहां उसकी आंखें फटी की फटी रह गई क्योंकि एक बहुत ही बेशकीमती चीज उसके हाथ लग गई थी।
बेड के ठीक नीचे एक बड़ा सा पोस्टर था जिस पर वैसी ही कुछ आड़ी टेढ़ी लकीरें थी जैसी उसे पहले मिली थी। निधि ने उस पोस्टर को उठाया और समेट कर अपनी पेंट के पीछे वाली साइड में डाल लिया। "हो ना हो जिन लोगों ने इन्हें मारा है उन्हें इसी की तलाश थी। एजेंट ने भी इसे काफी खुफिया तरीके से रखा है। जरूर इन लकीरों का कोई बड़ा मकसद है" निधि ने सोचा और दूसरे कमरे में चली गई।
वहां की हालत भी बिगड़ी हुई थी। इस कमरे की उसके आने से पहले किसी ने तलाशी ले ली थी। निधि ने इस कमरे को ज्यादा नहीं देखा बस सिंपल देखकर छोड़ दिया। एक बार बैड के नीचे जरूर देखा था, पर वहां कुछ नहीं मिला।
कमरे की जांच करने के बाद वह किचन में आई। किचन में धोने वाले बर्तन पड़े थे। निधि ने उन बर्तनों को छुआ और सूंघा "तकरीबन 10 दिन पुराने हैं" वह बोली और नल चला कर देखा। नल से पानी नहीं आ रहा था।
"यह कैसे हो सकता है, अगर बर्तन यहां रखे गए हैं तो मतलब यहां पानी आता था, लेकिन अब पानी नहीं आ रहा।" निधि अपने दिमाग के घोड़े बहुत तेजी से दौड़ा रही थी। वह कमरे से बाहर निकली और सीढ़ियों से छत पर पहुंची। सामने ही टंकी थी।
टंकी के करीब जाकर उसने उसे चारों तरफ से देखा। टंकी की पाइप किसी ने बंद कर रखी था, और वहां टंकी के अंदर गोलियां लगने के निशान भी थे।
निधि खुद से बोली " सब समझ में आ रहा है, इन लोगों को बहुत होशियारी से खत्म किया गया है। सबसे पहले किसी ने टंकी का पानी बंद किया, घर का एक आदमी ऊपर आया तो उस पर गोलियां चला दी गई। ठीक इसी वक्त नीचे वाले आदमी को भी शूट कर दिया गया।
पूरे घर की जांच करने के बाद निधि नीचे उतरी और बाहर गली में आ गई। फिर आसपास देखा, पूरी गली सुनसान थी। इसके बाद वह सामने वाले घर में घुस गई। सीढ़ियां चढ़कर ऊपर टेरिस पर पहुंची और वहां की दीवारों को देखा। इन पर बंदूक रखने के निशान थे। "यह मिलिट्री द्वारा की गई कार्रवाई है जिसमें मिलिट्री के काफी हाई एडवांस सोल्जर शामिल थे।"
थोड़ा सा और देखने के बाद वह सीढ़ियों से नीचे उतरने लगी "अगर इसमें मिलिट्री के लोग शामिल है तो उन्हें पता होगा कि यह लोग एजेंट थे और यह भी पता होगा कि इनका मिशन क्या था। लेकिन इसके बावजूद उन्होंने बाकी के एजेंट नहीं मारे। यह बात हजम नहीं हो रही। इसका तो मतलब यही हुआ कि उन्हें पता था यह लोग एजेंट हैं पर यह नहीं पता था वह लोग प्रधानमंत्री को मारना चाहते हैं। और अगर उन्होंने इस कारण से एजेंट को नहीं मारा तो उनका कारण क्या था, शायद तक यह लकीरें, उन्हें इन लकीरों की तलाश थी।" अहहह, निधि ने अपने सर के बाल नोच लिए "पूरा मामला उलझता जा रहा है....."
निधि घर के दरवाजे तक पहुंची की उसे बाहर से कुछ गाड़ियों के चलने की आवाज सुनाई देने लगी। उसने तुरंत अपने कदमों की चाल धीमी की और ऊपर उठते हुए बाहर देखा। बाहर मिलिट्री की गाड़ियां थी। वह तुरंत तेजी से पीछे हटी और वापिस टेरिस पर चली गई।
मिलिट्री की गाड़ियां उसी घर के सामने आकर रुक गई। आगे वाली गाड़ी में विनम्र बैठा था।
गाड़ियों के रुकते ही विनम्र उतरा और दूसरे सैनिकों को आर्डर दिया "जाओ और इस घर की तलाशी फिर से लो"
विनम्र के कहने के बाद सारे सैनिक एक-एक कर घर के अंदर चले गए। निधि दूसरे वाले घर की छत से यह सब देख रही थी।
निधि तेजी से पीछे हटी और अपनी नजरों को वहां से हटाया "मेरा यहां रुकना ठीक नहीं।" वह सीधे टेरिस की दूसरी और गई और नीचे देखा। नीचे उसे सामने वाले घर की छत दिखाई दे रही थी। छत तकरीबन 2 मीटर नीचे होगी। निधि ने मुड़ कर पीछे देखा, वहां से सामने वाले घर में मिलिट्री के जवान एजेंट के घर को चेक करते हुए दिखाई दे रहे थे। इसके बाद वह वापिस आगे देखने लगी।
आगे देखने के बाद उसने एक लंबी सांस ली और कुछ कदम भरकर सामने वाले घर पर छलांग लगा दी। नीचे कूदते ही धड़ाम की एक आवाज हुई और फिर चारों ओर सन्नाटा छा गया।
कुछ देर बाद निधि इस गली के ठीक बगल वाली गली में चलती हुई दिखाई दे रही थी। जैसे-तैसे कर उसे इस जगह से दूर जाना था। इन हालात में वह जितना दूर जाएगी उतना ही फायदा है। रास्ते में ही निधि ने अपनी शर्ट उतारी और उसे बदलकर उल्टा पहन लिया।
आखिर में वह उसी रेस्टोरेंट पर पहुंच गई जहां पर पहले आई थी। रेस्टोरेंट पर आकर उसने अपने कमर के पीछे का पोस्टर निकाला और उसे सीट के नीचे रख दिया।
फिर वेटर को आवाज लगाकर उसे कॉफी का ऑर्डर दिया।
जल्द ही वहां से वही मिलिट्री वाली गाड़ियां वापिस जाते हुए दिखाई दी। निधि ने उन गाड़ियों को देख कर कोई हरकत नहीं की। वह ऐसे रिएक्ट कर रही थी जैसे वो यहीं पर रहती है। थोड़ी देर बाद कॉफी वहां थी।
लेकिन, कॉफी को लाने वाला शख्स वेटर नहीं बल्कि कोई और था....वह विनम्र था।
विनम्र ने कॉफी टेबल पर रखी और उसके सामने बैठ गया। निधि पूरी तरह से समझ चुकी थी कि वह फंस चुकी है, लेकिन इसके बावजूद वह आराम से बैठी रही। "मुझे नहीं पता था, एक स्पेस एकेडमी के एजेंट होकर तुम्हें अकेले कॉफी पीनी पड़ेगी" विनम्र ने कहा।
शानदार!! विनम्र एक नजर में ही जान गया की निधि कौन है। निधि ने कोई जवाब नहीं दिया,बल्कि वे सोच विचार में पड़ गई कि यह शख्स कौन हो सकता है...हो ना हो यह विनम्र ही है।
"तुम शायद विनम्र होगे" निधि ने कॉफी का कप उठाया और सधे हुए लहजे में उससे कह दिया।
विनम्र सुनकर मुस्कुराया"शायद तक, यह बात तुम बेहतर जानती हो....."
"मैं निधि हूं... अभी-अभी एकेडमी ज्वाइन की है" निधि ने उससे ऐसा कहा जैसे वह यहां पर रिश्तेदारी निकालेगी।
"मुझे इस से कोई मतलब नहीं" विनम्र ने सामने से उसकी बात को इग्नोर कर दिया।
"लेकिन, मुझे है...." निधि बोली "तुम्हारे किस्से दुनिया भर में मशहूर है, तुम एजेंसी के एक शानदार एजेंट हुआ करते थे"
"उन बातों की अब कोई अहमियत नहीं। मैं पहले एजेंट था पर अब नहीं.... अब तो बस अफवाह बची है"
निधि मुस्कुरा कर बोली "अफवाहों अक्सर तभी फैलती है जब उनके सच होने की गुंजाइश हो"
"तुम काम की बात पर आओ....." विनम्र ने अपना हाथ टेबल पर रखा और जबरदस्त तरीके से धमकी वाले अंदाज में कहा।
"बोलो.... क्या काम की बात??"निधि ने उससे पूछा
"तुम्हारे पास हमारी कोई चीज है.." विनम्र ने कहा "मुझे बस वही चाहिए"
"मेरे पास ऐसा कुछ नहीं...."निधि ने अपने कंधे चटका कर जवाब दिया।
"माना कि तुम होशियार हो.... पर मेरे से ज्यादा नहीं। तुमने उस एजेंट के घर की तलाशी ली थी जिन्हें हम ने मारा था, जरूर तुम्हें वहां से कुछ मिला होगा"
"नहीं!! मुझे वहां कुछ नहीं मिला" निधि ने साफ मना कर दिया। "वैसे अगर बुरा ना मानो तो मैं एक बात पूछूं....उसमें आखिर ऐसा क्या था जो तुम लोग उसकी तलाश कर रहे हो"
"तुम्हें इससे क्या लेना देना" विनम्र अपनी जगह से खड़ा हुआ "यह मिलिट्री के अपने पर्सनल मामले हैं, तुम इसमें ना आए तो ही बेहतर हैं। इसकी वजह से तीन एजेंट पहले ही मारे जा चुके हैं और तुम भी खतरे से बाहर नहीं। भलाई इसी में है कि आज शाम को वापस लौट जाओ... और फिर यहां दोबारा नजर मत आना।" वह थोड़ा सा करीब आया और बिल्कुल निधि के पास आकर बोला “इस बार तो छोड़ रहा हूं... लेकिन अगली बार बिल्कुल नहीं छोडूंगा" और वहां से चला गया। निधि पीछे से उसे जाते हुए देखती रही "बेटा भले ही तुम यहां के खतरनाक इंसान हो, लेकिन मेरा नाम भी निधि है, किसी भी हाल में मुझे कम मत समझना" इसके बाद निधि भी वहां से चली गई।
CHAPTER-12
थंडर लाइंस, और मुश्किलों का आना।
रात को निधि अपने कमरे में चुपचाप बैठी थी। उसके पास एक बल्ब था जिसे वह बार-बार जगा और बुझा रही थी। साफ है इस वक्त वह किसी के बारे में सोच रही थी
वह उतना भी बुरा नहीं जितना वह दिखता है। अपने देश के लिए उसके दिल में अब भी जज्बात है, भले ही आज वह सीरिया का साथ दे रहा है लेकिन अगर उसको सही तरीके से ट्रीट किया जाए तो वह इंडिया का भी साथ दे सकता है। ... वह बुरा नहीं ....तेरह साल की उम्र से वहां रह रहा है....उसके बाद एकेडमी ने भी उसे कांटेक्ट नहीं किया.... इतने साल एक ही देश में रहने के बाद उससे देशभक्ति तो जुड़ ही जाती है। उसके दिमाग में अभी सीरिया को लेकर मोह माया है..... उसे तोड़ा जा सकता है। विनम्र जैसे लोगों को एजेंसी के लिए ही काम करना चाहिए............."
कुछ देर विनम्र के बारे में सोचने के बाद वह खड़ी हुई और उसने पोस्टर की आड़ी टेढ़ी लकीरे निकाल ली। "इनका भी रहस्य समझ में नहीं आ रहा...... उन्हें यह लकीरें चाहिए पर क्यों..... आखिर ऐसा क्या खास है इसमें। अगर इसके बारे में सही तरीके से जानना है तो मुझे अंकल से बात करनी चाहिए...."
निधि ने दरवाजा खोला और बाहर वकार अहमद के सामने कुर्सी पर जाकर बैठ गई।
"मुझे आपसे कुछ जरूरी बात करनी है.. अंकल" उसने तुरंत आंखों में आंखें डाल कर कहा
"जरूरी बात” वह थोड़े हैरान हुए "लेकिन क्या??"
"कुछ है जो मुझे आपको बताना है" निधि ने अपना मोबाइल निकाल कर उसके सामने रख दिया। मोबाइल में आड़ी टेढ़ी लकीरों की तस्वीरें थी "इस तस्वीर का रहस्य क्या है...??"
वकार अहमद उन तस्वीर को देखा "अरे बेटा, तुम्हें यह लकीरें कहां से..... किसी और को तो नहीं पता..... किसी को बताया तो नहीं"
"अभी तक तो नहीं...!!"
"बहुत अच्छे!!" उसने फोन उठाकर अपने पास रख लिया।
"लेकिन यह है क्या..??"निधि ने पूछा
"यह बहुत ही बेशकीमती चीज है" वकार अहमद ने बताया "एक नहीं बल्कि कई देश इसके पीछे पड़े हैं।"
"कई देश!!"
"हां!!"
"पर यह है क्या??"
वकार अहमद खड़ा हुआ और दरवाजा बंद करके उसके पास आया "इन आड़ी टेढ़ी लकीरों को थंडर लाइन्स कहा जाता है। जैसा कि तुम जानती हो एक देश दूसरे देश पर हमेशा हमला करता रहता है। सीरिया और इराक के मामले में यह सब पिछले कई सालों से हो रहा है। एक सेना दूसरे देश की सेना पर हमला तो करती है लेकिन कभी कामयाब नहीं हो पाती, इसका मुख्य कारण है दोनों देश की सेनाओं का आमने सामने आना। पड़ोसी देश भी इस जंग में शामिल है। जिस वजह से कई देश एक साथ इस जंग में अपनी भूमिका निभा रहे थे। अगर किसी एक देश को दूसरे देश पर जीत हासिल करनी हैं तो उन्हें तीन चीजों की आवश्यकता है.... पहले, उनकी खुद की सेना.... दूसरी, खुफिया रास्ते... और तीसरी सामने वाली सेना का सामने ना मिलना। अगर एक बार सेना राजधानी पहुंचकर वहां के प्रधानमंत्री को घेर ले तो उस देश को घुटने टेकने पड़ते हैं। यह थंडर लाइन्स देशों के वही खुफिया रास्ते हैं जिससे वह एक बड़ी सेना को एक देश से दूसरे देश आराम से ले जा सकते हैं। इनकी कीमत सिर्फ वही समझ सकता है जिसके पास यह रास्ते हो....अगर किसी भी देश में से एक के पास भी यह रास्ते चले जाते हैं तो वह अपने देश के अंदर आने वाले खुफिया रास्तों को बंद कर दूसरे देश में अपनी सेना सुरक्षित भेज सकता है। मतलब.... कामयाबी उसके हाथों में होगी... और उसे कामयाब होने से कोई नहीं रोक सकता "
थंडर लाइन्स!! यह तो एक नया ही कॉन्सेप्ट था। दूसरे देश में घुसने के नए रास्ते जो पूरी तरह से खुफिया थे। निधि ने इनके बारे में पहले कभी नहीं सुना था, जो भी था वह आज ही सुन रही थी। "अब बात कुछ कुछ समझ में आ रही हैं। सीरिया के लोगों को इन लाइन्स की जरूरत थी, जो कि हमारे एजेंट के पास थी। उन्हें इस बात की जानकारी मिली और उन्होंने हमारे एजेंट को खत्म कर दिया। लेकिन यह तो बात सीरिया की थी..... यहाँ के एजेंट को किसने मारा" निधि कहते हुए खड़ी हुई और बिल्कुल बेकार अहमद के सामने आ गई।
"मैं इसका पता लगा लूंगा बेटी... जरूर सीरिया का कोई एजेंट यहां होगा" उसने अपनी आंखें निधि से छुपाते हुए नीचे देख कर कहा।
"हां, मुझे भी यही लगता है" निधि अपनी आंखें वकार अहमद से मिला रही थी। "चलिए, रात बहुत हो गई है अब सो जाना चाहिए!! सुबह इस पर बात करते हैं"
निधि ने लंबी सांस लेकर कहा और फिर अपने कमरे में चली गई।
THE TRUBLE OF NIDHI BEGAN FROM HERE
रात को तकरीबन 2:00 बजे निधि अपने कमरे में आराम से सो रही थी। इसी वक्त बाहर की गली में कुछ हलचल हो रही थी, चार से पांच अनजान आदमी किसी तरह के ज्वलनशील पदार्थ की गैलन लेकर वकार अहमद के घर में आ रहे थे। वह सब वहां वकार अहमद के सामने आकर खड़े हुए और आंखों ही आंखों से आगे क्या करना है इस बात का इशारा करने लगे। वकार अहमद ने आंखों से इशारा कर सबसे पहले दरवाजा बंद करने को कहा, एक आदमी ने आगे निकलकर दरवाजा बंद किया। इसके बाद वकार अहमद ने आंखों से इशारा कर उनके हाथ में जो ज्वलनशील पदार्थ की गैलन थी उसे निधि के कमरे में डालने को कहा।
कमरे का दरवाजा बंद था। अंदर से भी और बाहर से भी। अंदर निधि को इस बात का बिल्कुल नहीं पता था कि वह एक नए खतरे में फंसने वाली है। नींद को प्यार करने वाली निधि जल्दी उठने के लिए बिल्कुल नहीं जानी जाती। कमरे में पंखे की आवाज सन्नाटे को दूर कर रही थी। चारों और सिर्फ और सिर्फ दीवारें थी, किसी तरह की खिड़की नहीं। लकड़ी का सामान भी काफी सारा भरा हुआ था, अगर एक चिंगारी भी इन्हें छूती है तो पूरा कमरा आग से भड़क उठेगा।
बाहर के आदमी ज्वलनशील पदार्थ को दरवाजे के नीचे से अंदर डालने लगे। धीरे धीरे ज्वलनशील पदार्थ लिक्विड की फॉर्म में दरवाजे के नीचे से निकलकर निधि के कमरे में फैलने लगा। यह पेट्रोल नहीं था, ना ही डीजल, बल्कि एक ऐसा ज्वलनशील पदार्थ था जो इराक में तेल के कुओं के अंदर पाया जाता है, इसे लिक्विड एलपीजी कहा जा सकता है जिसमें कोई गंध नहीं होती। अक्सर घरों में जो एलपीजी से गंध आती है वह उसके अंदर मिलाई गई दूसरी गैस की वजह से होती है न कि उस गैस की वजह से जो हम जलाने में काम लेते हैं।
निधि ने इधर बेड पर करवट बदली और उधर पूरा लिक्विड कमरे में फैल गया। बेड से लेकर कमरे की सभी लकड़ी की चीजों को वह लिक्विड भिगो चुका था।
बाहर खड़े दो अनजान व्यक्तियों ने माचिस की तीली जलाई और उसे लिक्विड पर फेंक दिया। माचिस की तीली के लिक्विड पर गिरते ही आग बाहर से अंदर की ओर जाने लगी।
आग सबसे पहले दरवाजे तक पहुंची, उसके बाद दरवाजे के नीचे से होते हुए अंदर, और फिर अंदर जाकर लकड़ी के सामान तक, ओर उसे जलाने लगी।
निधि अभी भी सोई हुई थी। लकड़ी का सामान धीरे-धीरे आग पकड़ने लगा और कमरे में गर्मी बढ़ने लगी।
निधि ने नींद में ही चद्दर को दूसरी तरफ कर दिया क्योंकि उसे गर्मी लग रही थी, लेकिन एक पल भी यह नहीं सोचा कि वह खतरे में है।
आग थोड़ी बढ़ी और बेड तक जा पहुंची। इस बार निधि को कुछ महसूस हुआ, एक गर्मी जो उसके शरीर को जला रही थी।
वह पलक झपकते ही उठी और सामने का खतरनाक नजारा देखा। उसका कमरा जल रहा था...
"ओह नो... यह क्या!! " वह तुरंत तेजी से बेड पर ही खड़ी हो गई।
पूरे कमरे में आग लग रही थी, कमरा में खिड़की नहीं थी ऐसे में निधि बचकर कहीं नहीं जा सकती थी।
बाहर के अनजान आदमियों ने एक भारी-भरकम अलमारी सरकाई और उसे दरवाजे के आगे लगा दिया, ताकी अंदर से निधि दरवाजा तोड़कर बाहर ना आ सके।
निधि को भी महसूस हो गया कि बाहर का दरवाजा बंद हो चुका है और वह किसी बड़े चक्रव्यूह में फंस चुकी है। पर अब बहुत देर हो चुकी थी.... उसके बचने का कोई रास्ता नहीं था।
उसने खुद का होश संभाला और तुरंत मुश्किल हालातों में बचने का रास्ता ढूंढने लगी...सबसे पहले बेड के भारी-भरकम गद्दों को समेटकर साइड में किया ताकि आग उसे ना लगे... अगर एक बार आग बेड के गद्दे को लग गई तो वह तेजी से कमरे में गर्मी बढ़ाएगी।
बाद में निधि बेड से उतरते हुए आसपास की लकड़ी के सामान को अलग करने लगी.... सिर्फ इस उद्देश्य से कि जितना हो सके उतना आग को फैलने से रोका जा सके।लेकिन इस तरह वह ज्यादा देर तक नहीं बच सकती थी... धीरे धीरे कमरे में लकड़ियों के जलने के कारण धुआँ बढ़ने लगा।
"मुझे जैसे तैसे कर यहां से बाहर निकलना होगा... वरना मेरी कब्र आज यही खुद जाएगी" उसने खुद से कहा और कमरे की चीजों को देखने लगी।
वह कुछ लोहे का सामान पड़ा था...." खुद जाएगी.... कब्र खुद जाएगी" पता नहीं उसके दिमाग में क्या आया वह खुद से यही बोली और फिर तेजी से कूदकर लोहे के सामान में से एक नुकीली पाइप उठा ली। पाइप मजबूत थी।
उसने पाइप उठाई और फर्श पर वार करने लगी। वह फर्श तोड़ने की कोशिश कर रही थी।
जैसा कि मैंने आपको पहले बताया था यहां की दीवारें और फर्श बहुत कमजोर है और उन्हें काफी समय से मरम्मत की आवश्यकता थी। इस वक्त निधि के मन में जो विचार आ रहा था वह इस फर्श को तोड़ने का था ताकि वह इस कमरे से बाहर निकल सके।
बाहर के अनजान लोग अब तक कमरे को छोड़ कर जा चुके थे.... वह पूरी तरह से आश्वस्त थे कि निधि अब नहीं बचेगी लेकिन निधि हिम्मत हारने वाली नहीं थी....
जल्द ही उसकी कोशिश रंग लाई और एक हल्के से झटके के साथ पूरा का पूरा फर्श नीचे गिर गया। फर्श नहीं बल्कि वहां का सामान भी, बचने के चक्कर में उसने एक और नई आफत मोल ले ली...नीचे वाली मंजिल में गिरते ही कई सारी ईंट और गर्म गर्म कोयले उसके ऊपर आ गिरे।
कुछ समय बीत जाने के बाद उस जगह पर कुछ ईंटें ऊपर उठती हुई दिखाई दी, निधि उन ईंटों को अपने ऊपर से हटा रही थी। पता नहीं आज सुबह उसने किस की शक्ल देखी थी जो उसे इन मुश्किल हालातों का सामना करना पड़ रहा है। उसने अपने जख्मी हाथ से बाकी की ईंटों को साइड में किया और खुद बाहर सुरक्षित निकली। उसके कपड़े कई जगहों से फट चुके थे... शरीर के कई हिस्सों से खून निकल रहा था.. मुंह पर खरोंच और दाग के निशान थे। शरीर की त्वचा हल्की सांवली पड़ चुकी थी।
जैसे ही वह निकल कर बाहर आई, उसने चलने की कोशिश की, सामने दूसरा कमरा था जहां से सीढियां निकलकर वापस ऊपर जा रही थी। निधि उन सीढ़ियों पर चढ़कर ऊपर जाने लगी... वहां पहुंचकर उसने कुछ कपड़े के टुकड़े उठाए और उसे अपने घावों पर बांधा..... सुबह के तकरीबन 3:00 बज रहे होंगे और बाहर काफी ज्यादा अंधेरा था।
घर खाली था... ना वहां वकार अहमद था ना ही उसकी पत्नी। जख्मों की मरहम पट्टी करने के बाद निधि ने फ्रिज खोली और वहां से वाईन की एक बोतल निकाल ली। फिर बोतल को टेबल पर रखा है और एक के बाद एक आधी बोतल पी गई। इससे वह दर्द को कम महसूस करेगी।
"वकार अहमद धोखा देगा.... यह नहीं सोचा था" उसने तुरंत अपनी पॉकेट में हाथ डाला और दूसरा फोन निकाला। जल्दी उस पर वकार अहमद की लोकेशन ट्रैक की। वकार के पास निधि का फोन था ऐसे में लोकेशन ट्रैक करना ज्यादा मुश्किल नहीं। निधि के पास दो फोन थे। एक फोन उसने वकार अहमद को दे दिया था और एक उसके खुद के पास था।
"सुबह होने से पहले मुझे वकार अहमद को ढूंढना होगा......क्योंकि यह तो सिर्फ पहला खतरा था.... अगर वकार अहमद मुझे ना मिला....तो पता नहीं आगे और कौन-कौन से खतरे आएंगे। थंडर लाइनस बहुत बेशकिम्मती है"
CHAPTER-13
निधि का वकार अहमद को पकड़ना
आगे क्या होगा, बिना इस बात की फिक्र किए निधि वकार अहमद की खोज पर निकल चुकी थी। रात के तकरीबन 5:30 वह घर के पीछे बनी गली में थी। उससे चला नहीं जा रहा था लेकिन इसके बावजूद उसे वकार अहमद को ढूंढना था। गली में उसने एक बाइक की तारों से छेड़खानी की और उसे स्टार्ट कर सड़क पर निकल गई। वकार अहमद की लोकेशन उसके फोन पर शो हो रही थी जो यहां से तकरीबन 11 किलोमीटर की दूरी पर थी।
निधि ने मोटरसाइकिल उस लोकेशन की तरफ कर लिया जो उसे उसका मोबाइल दिखा रहा था। ठीक 7 से 8 मिनट बाद वह सीमावर्ती क्षेत्र में एक सैनिक कैंप के पास थी। लोकेशन उसे उसी जगह के बारे में दिखा रहा था। निधि ने बाइक की लाइट बंद की और बाइक को दूर ही रोक दिया। अक्सर एजेंसी के जासूसों को इस बात की ट्रेनिंग दी जाती थी कि कौनसे हालातों में कैसे कदम उठाने हैं। फिर वह पैदल ही झुकते हुए क्षेत्र की तरफ जाने लगी। रास्ते में कुछ कटीली तारे आई जहां आकर वह रुक गई। फिर उसने अंदर झांक कर देखा।
सामने तीन से चार तंबू थे, जिन के बीचों बीच रखी एक मेज कुर्सी पर वकार अहमद किसी से बात कर रहा था।
"देखो, मैं तुम्हें पूरे तीस लाख दूंगा.... तुम्हें मेरे समेत पांच और लोगों को बॉर्डर क्रास करवाना होगा" वकार अहमद बोला
"नहीं नहीं, इतने में सिर्फ तीन लोगों को बॉर्डर कोर्स करवाया जा सकता है" उस आदमी ने वकार अहमद से कहा जिसे वह बात कर रहा था।
यह सुनकर वकार अहमद ने पीछे की तरफ देखा जहां पांच आदमी, और उसकी पत्नी खड़ी थी। फिर अपना रिवाल्वर निकाला और उनमें से तीन आदमियों को मार दिया। अब सिर्फ एक आदमी, और उसकी पत्नी बची थी। "ठीक है, जैसा तुम्हें सही लगे"
बातें सुन रही निधि ने नजर घुमाकर आसपास देखना शुरू किया। वहां गिनती के चार पांच सैनिक ही दिखाई दे रहे थे। जैसा कि वकार अहमद ने बताया था कि उसकी मिलिट्री से अच्छी जान पहचान है, ऐसे में हो ना हो यह बंदा उसके काम आने वाला शख्स था।
निधि कदमों के बल तार के नीचे से निकली और तंबू के पीछे जाकर छिप गई। वहां से वकार अहमद सिर्फ 2 मीटर की दूरी पर था।
फिर निधि ने वापिस झुक कर अपने बगल वाले तंबू का रुख किया, तंबू के दरवाजे के सामने एक सैनिक खड़ा था जो सामने की ओर देख रहा था। यह सैनिक इस तरह खड़ा था कि वकार अहमद का ध्यान उन पर नहीं था।
निधि चुपके से उसके पीछे गई और उसके मुंह को दबाकर अंधेरे की ओर ले आई। सैनिक ने अपना मुंह निधि से छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन निधि ने इतनी जोर से पकड़ रखा था कि वह अपनी कोशिश में कामयाब नहीं हो सका। 3 से 4 मिनट की देरी के बाद सैनिक तमाम कोशिशों के बाद दम तोड़ गया। सैनिक को खत्म करने के बाद निधि ने उसके हथियार उठाए और अपने पास रख लिए।
फिर वह वहां से दूसरे तंबू की ओर चली गई हो। इस तंबू के अंदर 2 सैनिक थे जो सोए हुए थे। निधि चुपके से उस में घुसी और चाकू की धार उनके गलों पर फेर दी।
3 सैनिकों को खत्म करने के बाद 2 सैनिक और बचे थे जो इस क्षेत्र का पहरा दे रहे थे।
यह 2 सैनिक अलग अलग खड़े थे। एक तंबू के आगे और एक तंबू के पीछे। निधि चुपके से सबसे पहले तंबू के पीछे वाले सैनिक के पास गई और पीछे से झपटते हुए उसका मुंह दबाकर चाकू उसकी पीठ में घोप दिया।
इसके बाद तंबू के अंदर से होते हुए उसके सामने खड़े बंदे को तंबू के अंदर पटक लिया और उसका भी काम तमाम कर दिया।
सभी सैनिकों को मारने के बाद अब कुल 4 और लोग थे जिनसे उसे लडना था। वकार अहमद, उसकी पत्नी, उसके साथ वाला आदमी.... और वह आदमी जिसे वकार अहमद बात कर रहा था।
इन लोगों से लड़ने के लिए निधि बेफिक्र थी, उसने सैनिक से चुराई हुई बंदूक साइड में रखी और दो पिस्तौल अपने हाथ में पकड़ लिए। फिर गोलियां चलाते हुए सीधे तंबू से बाहर निकली।
बाहर खड़े उन आदमियों का अफरा-तफरी मच गई, कुछ को बचने का समय मिला और कुछ को नहीं।
वकार अहमद बचकर टेबल के नीचे झुक गया, जबकि बाकी के लोग निधि द्वारा चलाई जा रही गोलियों की चपेट में आ गए।
एकदम से किए गए इस हमले के कारण निधि को ज्यादा लड़ाई करने की आवश्यकता नहीं पड़ी, वकार अहमद को छोड़कर बाकी सब मर चुके थे।
निधि ने पिस्तौल सीधे वकार अहमद के सर पर रखा और पूछा "बताओ, क्यों किया तुमने यह सब??"
वकार अहमद बुरी तरह से डर गया। " त त त त तुम बच कैसे गई"
"जो पूछा है वह बताओ... वरना यह गोली सीधे सर में ठोक दूंगी" निधि ने धमकाने वाले अंदाज में कहा।
"बताता हूं बताता हूं, दरअसल, में सीरिया का एक खुफिया एजेंट हूं"
"लेकिन तुम तो एकेडमी के लिए काम करते हो...."
"अभी भी करता हूं, लेकिन....."
"लेकिन क्या" निधि ने पिस्तौल का जोर उसके सर पर देते हुए कहा
"इसमें मेरा कोई कसूर नहीं। यह तुम्हारी एकेडमी के ही कारण हुआ है। वह लोग बहुत सुस्त हैं" वकार अहमद बिना जान की फिक्र किए सीधे निधि के सामने खड़ा हो गया। "वह लोग एजेंट को दूसरे देशों में छोड़ तो देते हैं लेकिन इसके बाद उनका अता-पता ही नहीं पूछते। पैसों के भी किल्लत आए दिन बनी रहती है.... इन सबके चलते हमें दूसरे देशों का साथ देना पड़ता है।"
"तुम सीरिया का साथ क्यों दे रहे मुझे बस वो बताओ"
"दरअसल कुछ साल पहले की बात है... मैं किसी मिशन पर सीरिया गया था..... और उस मिशन में पकड़ा गया। सीरिया के प्रधानमंत्री ने मेरे सामने दो रास्ते रखें..... पहला रास्ता.... उनका साथ दुं और खूब सारा पैसा खाऊं... और दूसरा रास्ता.... मर जाऊं। मेरे पकड़े जाने के तुरंत बाद एकेडमी ने अपने हाथ पीछे खींच लिए, बचने की कोई उम्मीद नहीं थी..... इसलिए वहां मैंने पहले वाला रास्ता चुना। किसी को शक ना हो इसलिए एकेडमी के लिए भी काम करता रहा........ सीरिया के प्रधानमंत्री ने मुझे मिशन दिया कि मैं उनके लिए थंडर लाइनस ढूंढु..... यह उनके लिए सबसे ज्यादा कीमती थी.... जिस कारण और भी एजेंट उन्हें ढूंढने में लगे हुए थे..... थंडर लाइन के बदले उसे ढूंढने वाले इंसान को सीरिया के जनरल की गद्दी मिलेगी..... जो सच में बहुत बड़ा इनाम था। फिर मुझे पता चला कि एकेडमी प्रधानमंत्री को मारने के लिए कुछ एजेंट भेज रही है...... लेकिन मैंने यह जानकारी अपने तक सीमित रखी। वह एजेंट यहां आए तो प्रधानमंत्री को मारने थे..... लेकिन उनके हाथ थंडर लाइन लग गई...... सीरिया में विनम्र उनके पीछे था.... और यहां मैं...... इस वजह से कोई भी नहीं बचा। सीरिया में विनम्र ने उन्हें मार डाला.... और यहां मैंने। हम दोनों के मन में लालच था.... और यही वजह है कि हम अपने देश से गद्दारी कर रहे हैं"
निधि उसकी बात सुनकर किसी भी तरह से हैरान नहीं हुई। एजेंसी में गद्दारी का सिलसिला बहुत पुराना है, और खुद उसके सीओ कैप्टन रोड भी इस बात से परेशान है।
"लेकिन तुम्हें पता है देश से गद्दारी करने की सजा क्या होती है....??" निधि ने पिस्तौल का ट्रिगर दबाते हुए कहा।
"अपने देश में हो तब तो इसकी सजा मौत होती है, लेकिन जब देश ही दूसरा हो तो उसकी कोई सजा नहीं ...." अचानक वकार अहमद ने अपने एक हाथ से निधि के पिस्तौल को साइड में किया और दूसरे हाथ से खंजर निकालकर उसे निधि के पेट में घोंप दिया।
लेकिन इस से पहले खंजर पूरा पेट के अंदर जाता निधि ने उसे बीच में ही पकड़ लिया। फिर वकार अहमद को धक्का मारते हुए पीछे किया।
जल्द ही वहां सेना के सात से आठ सैनिक और आ गए.....उन्होंने पूरे क्षेत्र पर गोलाबारी शुरू कर दी। निधि घायल थी इस वजह से वह वही तब्बू के पीछे छुप गई.... जबकि वकार अहमद बॉर्डर की तरफ भागने गया।
निधि ने मुड़कर वकार अहमद की तरफ देखा वह बॉर्डर पार कर रहा था। वहां के सैनिकों की नजर भी उस पर पड़ गई.... और सभी सात से आठ सैनिक उसका पीछा करने लगे।
मौके का फायदा उठाकर निधि दूर खड़ी अपनी बाइक की तरफ भागी और वहां से निकल गई।
सुबह होते ही निधि एक अस्पताल में अपने जख्म पर मरहम पट्टी करवा रही थी। डॉक्टर ने उसकी पट्टी करने के बाद कहा "आर यू वेल नो"
"हां" निधि ने जवाब दिया जिसके बाद डॉक्टर वहां से चला गया।
"वकार अहमद बॉर्डर क्रॉस कर चुका होगा, और वहां उसका मकसद प्रधानमंत्री से मिलना है....अगर एक बार वह प्रधानमंत्री से मिला तो उन्हें थंडर लाइन दे देगा" निधि खुद से ही बोली "कैसे ना कैसे कर...मुझे वकार अहमद को प्रधानमंत्री से मिलने से रोकना होगा"
निधि ने कहा और खड़ी होकर अस्पताल से बाहर जाने लगी। पीछे से उसे डॉक्टर कहते रहे...."मैम, यू आर नॉट फाइन..... स्टे हेयर" पर निधि ने उनकी एक बात नहीं सुनी।
ठीक 1 घंटे बाद निधि चरवाहों से बात कर रही थी। उसने चरवाहों को कुछ पैसे दिए और बॉर्डर क्रॉस करवाने का सौदा किया।
चरवाहे सोदें के लिए मान गए और तकरीबन 7:30 बजे तक चरवाहों ने निधि के साथ बॉर्डर क्रॉस किया और निधि को सीरिया पहुंचा दिया।
सीरिया पहुंचते ही निधि ने सबसे पहले वहां के मिलिट्री कैंप से कांटेक्ट किया। उसे कमांडर विनम्र की तलाश थी। उन्होंने निधि को उस बेंच का रास्ता बताया जहां कमांडर विनम्र काम करता था।
निधि वहां पहुंची और एक ऑफिसर से पूछा "क्या मैं.... विनम्र से मिल सकती हूं"
"कमांडर विनम्र" सामने के आदमी ने कहा जिससे निधि ने पूछा था।
"हां वही" निधि तेजी से बोली।
"सुबह-सुबह वह जिम में होता है...." आदमी ने कहा और उसे बाहर निकलकर जिम का रास्ता दिखाया।
जिम के बाहर बड़े-बड़े बोर्ड लगे हुए थे, कई तरह के अलग अलग पोस्टर थे। सभी पोस्टर में सोल्जर दिखाई दे रहे थे। यह सैनिकों के लिए बनाया गया खास तरह का जिम था, जहां अलग-अलग टुकड़ियों के कमांडर और खास लोग आकर एक्सरसाइज किया करते थे। निधि के अंदर जाने से पहले ही वहां बाहर खड़े लोग उसे अजीब नजरों से देख रहे थे। लेकिन इस वक्त निधि के लिए सबसे जरूरी विनम्र से मिलना था। उससे मिलकर अगर एक बार पूरी बात क्लियर हो जाती है तो हो सकता है उसको कुछ मदद मिल जाए। निधि ने दरवाजा खोला और खोलकर जिम के अंदर दाखिला लिया लेकिन वह अंदर जाते ही समझ गई कि वह गलत जगह आई है।
वहां तकरीबन छह से सात हटे कट्टे आदमी थे। सबकी नजरें स्लो मोशन से एक वहिशे दरिंदे की तरह निधि को निहार रही थी। निधि ने इधर-उधर घूम कर विनम्र को ढूंढने की कोशिश की लेकिन वह वहां दिखाई नहीं दिया। उसने मुड़कर वापिस जाने का सोचा..... लेकिन एक आदमी उसके सामने आ खड़ा हुआ।
"बरसों से सुखी बंजर जमीन पर.... आज एक कली ने दस्तक दी है...... बरखुरद्दार यहां सिर्फ आने का रास्ता है.... जाने का नहीं, तुम सीरिया की नहीं लगती" उस आदमी ने कहा।
निधि कुछ नहीं बोली। वह साइड से हटकर बाहर जाने लगी लेकिन उस आदमी ने अपना हाथ उसके आगे कर वह रास्ता भी रोक लिया।
"मैंने बोला ना.... यहां सिर्फ आने का रास्ता, बाहर जाने का नहीं, बताओ तुम कौन हो??" उस आदमी ने दोबारा कहा।
"देखो!! मैं लड़ाई नहीं चाहती" निधी बोली
"अच्छा जी!! फिर जो चाहती है वह ले ले, लेकिन बताना तो तुम्हें पड़ेगा ही"
"काश मैं बताती " निधि ने कहा और उसका हाथ पकड़ जोर से घुमा दिया... इतनी जोर से की उस आदमी के अंदर की हड्डी तक टूट गई। वह जोर से चिल्लाया।
उसके चिल्लाने के कारण जिम के बाकी लोग भी इकट्ठा हो गए और एक-एक कर निधि पर टूट पड़े।
एक आदमी ने आगे बढ़कर हमले के लिए अपना हाथ उठाया लेकिन निधि ने उससे बचते हुए पास पड़ा डबल के पास चली गई। उसने वहां से एक डबल उठाया और उसके गर्दन पर दे मारा। वह आदमी एक निर्जीव इंसान की तरह सीधे नीचे गिर पड़ा।
यह देखकर सब चौंकाने हो गए। दो आदमी एक साथ निधी की तरफ बढ़े। निधि ने कुछ कदम पीछे हटते सबसे पहले कुछ डंबल हवा में उछालते हुए दोनों में से एक आदमी के ऊपर गिराया और फिर वहां पड़ी रोड उठा ली। रोड उठाते ही उसने आगे आ रहे आदमी के जांघ पर वार किया जिससे वह नीचे गिर गया।
बाकी के आदमी भी उस पर हमला करने के लिए लपके लेकिन निधि के पास रोड़ थी, उसने एक-एक कर सभी आदमियों का सामना किया। एक आदमी के सर पर रोड मारी, एक आदमी के कंधे पर...
वह आदमी जो सबसे पहले निधि को मिला था वह जमीन पर पड़ा था। निधि उसके पास गई और रोड उसके गर्दन पर रखते हुए बोली "जो लोग रास्ता रोकते हैं मैं रास्ते के साथ-साथ उन्हें भी तोड़ देती हूं......" और रोड वही गिरा कर बाहर की तरफ जाने लगी।
निधि को लगा कि वह आदमी अब कुछ नहीं करेगा, लेकिन वह होशियार था। पीछे से उसने एक पतली रस्सी उठाई और निधि के गले में डालते हुए उसे नीचे गिरा लिया। निधि ने पास पड़ी रोड उठाने की कोशिश की लेकिन वह उसकी पहुंच से दूर थी।
गला दबाने के कारण धीरे-धीरे उसकी आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा, उसके बचने की उम्मीद शुन्य थी.... लेकिन तभी विनम्र वहां आ गया।
आते ही उसने अपना रिवाल्वर निकाला उस आदमी के सर के बीचो-बीच रखते हुए उसे निधि को छोड़ने को कहा" छोड़ो इसे"
आदमी ने गुस्सा दिखाते हुए निधि को छोड़ दिया। निधि बहोश हो चुकी थी। विनम्र ने निधि को उठाया और उसे वहां बेंच पर लिटा दिया। "तुम ठीक तो हो ना" वहां लिटाते ही उसने पूछा
लेकिन निधि ने कोई जवाब नहीं दिया। विनम्र ने तुरंत उसकी नब्ज चेक की। उसकी सांसे बंद हो रही थी।"शीट!! यह मर रही है" इन हालातों में किसी को बचाने के दो ही तरीके होता है, करंट देना या फिर सांस देना। विनम्र ने अपने आसपास देखा। उसे कोई भी ऐसी चीज नहीं दिखी जिससे वह उसे शोक दे सके। बिगड़ते हालात देखकर विनम्र ने तुरंत एक लंबी सांस ली और सांस लेकर उसके होठों को चूम लिया। इसके अलावा उसके पास निधि को बचाने का और कोई रास्ता नहीं था।
CHAPTER-14
विनम्र निधि को किस कर रहा था, लेकिन किसी गलत इरादे से नहीं बल्कि उसकी जान बचाने के लिए।
अचानक निधि की सांस में सांस आई, उठते ही उसने खुद को संभाला और विनम्र को धक्का मारते हुए साइड में किया। "यह तुम क्या कर रहे हो ??"
"पागल!!" विनम्र सामने से एक अलग ही अंदाज में कहा। इससे पहले जहां उसका चेहरा एटीट्यूड से भरा लगता था वहीं अब उसके चेहरे पर चिर परिचित होने की छवि झलक रही थी " तुम मर रही थी....... बचा रहा हूं "
15 मिनट बाद वह दोनों सीरिया के मिलिट्री बेस कैंप में एक तंबू के सामने बैठे थे। निधि की हाथ में चाय थी जबकि विनम्र खाली हाथ बेठा था। वह निधि को कुछ बता रहा था।
"तुम्हारे मॉम-डेड की डेथ के बाद सब कुछ बदल गया था। भले ही मेरे पापा तुम्हारे पापा को बचपन से जानते थे लेकिन उनकी मौत के बाद उन्हें भी एक धक्का सा लगा। उन्हें खुद की और मेरी फिक्र होने लगी। एजेंसी अपने बहुत नाजुक मोड़ पर थी, तुम्हारे पापा के कत्ल के बाद और भी कई सारे कत्ल हुए। एजेंसी के पुराने एजेंट एक-एक कर मरने लगे, इन हालातों में मेरे पापा ने इस देश को छोड़ना बेहतर समझा। उन्होंने मेरा नाम एडवांस ट्रेनिंग में जोड़ा और मुझे लेकर सीरिया आ गए। यहां उनकी काफी अच्छी जान पहचान थी, इस वजह से कुछ दिनों में हमें सीरिया की नागरिकता मिल गई। एडवांस ट्रेनिंग में होने की वजह से एजेंसी को लगा कि मैं उनके लिए काम कर रहा हूं लेकिन ऐसा नहीं था। मुझे पापा पहले ही बोल चुके थे कि अब वह लोग एजेंसी के लिए काम नहीं करेंगे, ऐजसीं बंद होने की कगार पर खड़ी थी, और खुदा ना खासता एजेंसी बंद हो जाती है तो हम लोगों के जिने की संभावनाएं खत्म हो जाएगी। जान पहचान के चलते उन्होंने मुझे सीरिया की सेना में ट्रेनिंग के लिए भेज दिया, मैंने वहां ट्रेनिंग ली और धीरे-धीरे उनका कमांडर बन गया। ऐजंसी ने भी दोबारा कांटेक्ट नहीं किया इसलिए कभी वापस जाने का मूड ही नहीं बना।"
निधि ने चाय का एक सीप पिया "तुम्हारे पापा सिर्फ हमारे पड़ोसी नहीं थे, बल्कि वह पड़ोसी से भी बढ़कर थे। लेकिन मैं नहीं जानती थी परिस्थितियां कुछ इस तरह बदलेगी। मॉम डैड की डेथ के बाद मुझे अंकल रोड अपने साथ ले गए, उस वक्त मेरे मन में तुम्हारा ख्याल नहीं आया था। वहां उन्होंने मेरी ट्रेनिंग शुरू कर दी, तब मेरी उम्र साढे दस साल होगी जब मैंने ट्रेनिंग लेना शुरू किया था। ढाई साल की ट्रेनिंग के बाद मुझे तुम्हारा ख्याल आया, लेकिन तुम फाइलों से गायब थे। तुम्हारे पापा का भी कोई अता-पता नहीं था। अंकल से पूछा तो उन्होंने बताया कि एडवांस ट्रेनिंग के चलते तुम लोगों को फाइलों से हटा दिया गया, लेकिन उन्हें यह नहीं बताया था कि तुम सीरीया आकर रह रहे हो। नियम और कायदे सब पर लागू होते हैं, जब यहां आई तो वकार अहमद ने तुम्हारे बारे में बताया, मैं उसी वक्त समझ गई थी कि यह तुम ही हो।"
"वकार अहमद एक नंबर का कमीना बदां है, ऐजंसी को बर्बाद करने में उसका हाथ है"
"जानती हूं!!" निधि बोली "लेकिन तुम भी यही काम कर रहे हो, ऐजंसी खराब करने का....."
"मैं कुछ नहीं कर सकता, मेरे हाथ पैर बधं चुके हैं, यहां मेरी अच्छी खासी लाइफ है..... मैं अब यहां सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री के लिए काम करता हूं।"
निधि बोली, "पर यह तुम्हारा देश नहीं, यहां तुम जो भी करोगे वह देशद्रोह कहलाएगा।"
"मैं कुछ नहीं कर सकता....." विनम्र खड़ा हुआ और वहां से चला गया। निधि उसे पीछे से जाते हुए देखती रही। आगे जाकर वह रेतीले टिब्बों पर बैठ गया। निधि भी उसके पीछे-पीछे गई और उसके बगल में ही बैठ गई। उसने बड़े ही नाजुक स्वर से कहा "मांनती हुं!! हालात इंसान को झुकने पर मजबूर कर देते हैं, उन्हें ऐसे फैसले लेने पड़ते हैं जो वह कभी नहीं लेना चाहता। तुम्हारे पापा अपनी जगह बिल्कुल सही थे, पर जरा एक नजर सोच कर देखो..... मुश्किल हालात किसके सामने नहीं आते। मैंने भी अपने मॉम डैड को खोया है पर इसके बावजूद एजेंसी के लिए काम कर रही हूं। हां!! इस वक्त एजेंसी बुरी परिस्थितियों से गुजर रही है, पर हालात जल्दी बदल जाएंगे। तुम्हारे पास एक मौका है, तुम यहां बिन मकसद की जिंदगी जी रहे हो, पर वहां तुम्हें जीने का एक मकसद मिलेगा। वहां, जहां तुमने अपना बचपन बिताया, हम एक साथ खेले। आज भी वो जिंदगी तुम्हारा इंतजार कर रही है.... सिर्फ एक कदम, अगर तुम एक कदम उसकी तरफ बढ़ाओगे तो वह जिंदगी तुम्हारी तरफ 10 कदम आगे आएगी। ऐसा मौका कभी नहीं मिलेगा"
"तुम क्या चाहती हो!!" विनम्र बोला "मैं सीरिया से गद्दारी करूं"
"मैं तुम्हें ऐसा करने के लिए नहीं बोल रही। बस जो सही है उसका साथ दो, सीरिया के प्रधानमंत्री के इरादे क्या है यह बात तुम भी अच्छे से जानते हो। वह कहीं ना कहीं इस विश्व को जीतना चाहते हैं, यह किसी भी तरह से एक नेक काम नहीं। अगर वे ऐसा करेंगे तो चारों और शिवाए मौत की और कुछ नहीं मिलेगा"
विनम्र खामोश रहा है। उसने कोई जवाब नहीं दिया। निधि बोलती रही "वकार अहमद के हाथ थंडर लाइन लग चुकी है, वह उन्हें लेकर प्रधानमंत्री के पास जाएगा। इसके बाद उसे प्रधानमंत्री को देगा.... जिसके बाद सिर्फ और सिर्फ तबाही मचेगीं। वह अपने पड़ोसी देशों पर हमला करेंगे, उन्हें जीतेंगे.... और कई निर्दोष लोगों को मारेंगे।"
"मैं इसमें कुछ नहीं कर सकता!!"
निधि की कोशिश काम नहीं आ रही थी। विनम्र मानने को तैयार नहीं था। "तुम भले ही ना करो, मैं तो करूंगी....मैं उस वकार अहमद को अपने मकसद में कामयाब नहीं होने दूंगी"
"तुम मर जाओगी" विनम्र उसकी तरफ देखते हूए बोला।
"मेरे लिए मायने नहीं रखता, देश के लिए जान गवाना मरना नहीं कहलाता। और मैं तो यहां लाखों करोड़ों लोगों की जिंदगी बचाने वाली हुं"
निधि ने कहा और खड़ी होकर वहां से जाने लगी। विनम्र को आगे क्या करना है यह उस पर ही छोड़ दिया। अगर साथ दें तो ठीक है, नहीं दे तो भी ठीक है। उसे तो जो करना है वह करेगी। निधि के कुछ दूर जाने के बाद विनम्र उसके पीछे आया"रुको" उसने पीछे से निधि को रोक लिया। "मैं तुम्हारा साथ नहीं दूंगा, लेकिन तुम्हारी थोड़ी बहुत मदद कर दूंगा.... तुम्हारा मिशन सिर्फ वकार अहमद को रोकना और उन लाइंस को लेना है.... तुम सिर्फ इतना ही करोगी और यहां से चली जाओगी"
"मुझे मंजूर है" निधि मुस्कुराए और खुशी से बोली
"मेरी योजना ध्यान से सुनो" विनम्र और निधि एक तंबू के अंदर बैठकर आगे क्या करना है, इस चीज की योजना बना रहे थें। "आज प्रधानमंत्री की सालगिरह है, इसलिए वह पूरा दिन बाहर रहेंगे। इन हालातों में वकार अहमद का प्रधानमंत्री से मिलना संभव नहीं। शाम को ठीक 5:00 बजे प्रधानमंत्री अपने ऑफिस में जाएंगे, वही वकार अहमद अहमद उनसे मुलाकात करेगा। यही वह समय होगा जब तुम वकार अहमद को ठीक प्रधानमंत्री से मिलने से पहले पकड़ लोगी। इसके बाद तुम्हें जो करना है तुम करना, 6:00 बजे के बाद में तुम्हे वापिस इराक पहुंचा दूंगा। वहां से तुम फ्लाइट पकड़ना और इंडिया चले जाना।"
"अगर इस योजना में कोई गड़बड़ हुई तो" निधि ने पूछा
"बिल्कुल भी नहीं होगी, अगर बाई चांस गड़बड़ हो भी जाती है तो मैं आज पूरा दिन प्रधानमंत्री के साथ रहूंगा, उनका अंगरक्षक बंन कर। मैं किसी तरह बहाना करके वकार अहमद को फिर से अलग कर दूंगा। लेकिन तुम्हें भी वहां रहना होगा"
"मैं वहां कैसे रहूंगी....."
"कुछ न्यूज़ रिपोर्टर प्रधानमंत्री को कवर करेंगे। मैं नकली डॉक्यूमेंट बनाकर तुम्हें एक न्यूज़ रिपोर्टर बना दूंगा, बस इसके बाद अगले छह-सात घंटे तुम प्रधानमंत्री के आसपास रहोगी, उन्हें कवर करने के बहाने।"
निधि को विनम्र की योजना अच्छी लगी। यह एक सुरक्षित और कामयाब होने वाली योजना थी। लेकिन तब तक जब तक निधि चाहे, वह 6 से 7 घंटे प्रधानमंत्री के आसपास रहेगी, एजेंसी का मीशन है कि प्रधानमंत्री को खत्म करना है, ऐसे में अगर निधि का मन बदल जाता है तो हालात बेकाबू हो सकते हैं।
CHAPTER-15
सिरिया के प्रधानमंत्री की सालगिरह,
निधी का उसे हाईजेक करना,
वकार अहमद की मुलाकात, उसका बचकर निकल जाना
राजधानी।
3 दिन पहले ही राजधानी में मिलिट्री की भारी भरकम टुकड़ियों का आना शुरू हो गया था। चप्पे-चप्पे पर कड़ी सुरक्षा थी। समारोह स्थल के आसपास की बिल्डिंग सैनिकों ने पहले ही अपने कब्जे में ले ली थी। अंदर आने वाले लोगों के दस्तावेज खास तरीके से चेक किए जा रहे थे। आज के समारोह में प्रधानमंत्री अपने सालगिरह को खास बनाना चाहते थे। तानाशाही शासक होने के कारण उनका जनता से जुड़ाव भी आवश्यक था, इसलिए उन्हें इससे अच्छा मौका नहीं मिला। आज सालगिरह के बहाने वह जनता को संबोधित करेंगे, और इस चीज की उम्मीद भी है कि वह इराक से अपने संबंधों को लेकर अपनी बात जनता के सामने रखें। राजनीति में अक्सर नेता के साथ जनता का होना आवश्यक है अन्यथा कभी भी कुछ भी हो सकता है।
सुबह 6:00 बजे से ही लोगों का आना-जाना शुरू हो गया था। 11:00 बजे प्रोग्राम की शुरुआत होनी थी। निधि और विनम्र भी अपनी तैयारिया करने में लगे हुए थे। उन्हें अपनी योजना के अनुसार काम करना था।
तकरीबन 9:30 बजे निधि आईने के सामने अपनी आंख के नीचे बने घाव को देख रही थी। वह अब थोड़ा हल्का हो चुका था।
"क्या हुआ...??" विनम्र ने निधि से पूछा।
"कुछ नहीं... बस घाव के निशान देख रही थी।"
"डोंट वेरी, वक्त हर घाव के निशान को भर देता है..." विनम्र ने कहा। निधि उसकी तरफ मुड़ी "कुछ घाव वक्त भी नहीं भर सकता, योजना पर काम कैसा चल रहा है...." निधि ने विनम्र से आगे पूछा
"सब तैयार है, प्रधानमंत्री तक पहुंचने में तुम्हें कोई दिक्कत नहीं आएगी। इसके बाद आगे का काम तुम्हारा है। सुरक्षा सख्त है.... इसलिए तुम किसी तरह का हत्यार नहीं लेकर जा सकती.... ना ही कोई नुकीली चीज.... तुम्हें उसे दूसरे तरीके से खत्म करना होगा"
"हमममम" निधि ने गहरी सांस ली और जवाब दिया।
"चलो, बाहर जीप तुम्हारा इंतजार कर रही है" विनम्र कहकर बाहर जीप की तरफ निकल गया। निधि भी आ गई।
ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी, रेगिस्तानी इलाके में सड़क पूरी तरह से साफ थी। ना तो सामने से कोई साधन आ रहा था ना ही पीछे से। निधि ने एक भूरे रंग का बुर्का पहन रखा था जो यहां की पहचान है। विनम्र ने अपनी मिलिट्री वाली ड्रेस पहनी थी। हवा के थपेड़े उन दोनों के चेहरों पर आकर टकरा रहे थे। इन्हीं के साथ निधि अपनी कुछ पुरानी यादों में खोई हुई थी।
विनम्र ने उसका कंधा झकझोरा तो निधि ख्यालों से बाहर आई। "क्या हुआ।।। क्या सोच रही थी"
निधि मुस्कुराई "कुछ नहीं, ऐसे ही कुछ पुरानी यादें"
"इंसान को अक्सर वक्त के हिसाब से खुद को बदलना पड़ता है, वक्त इंसान को हमेशा आगे निकलने के लिए कहता है ऐसे में पुरानी यादों में उलझ कर रहना अच्छी बात नहीं"
निधि ने गर्दन हिलाकर संतुष्टि जताई। दोनों लंबे रेगिस्तानी सफर से निकलकर राजधानी में प्रवेश कर रहे थे। राजधानी की सड़क शुरू होते ही भारी भरकम भीड़ सड़क के दोनों तरफ नजर आ रही। उन्हें रोकने के लिए सैनिक भी खड़े थे।
समारोह स्थल के ठीक आगे जाकर विनम्र ने गाड़ी पार्किंग में पार्क की और निधि के साथ उनके ऑफिस की तरफ निकल गया। रास्ते में आने वाले सैनिकों विनम्र को सलूट कर रहे थे। इन सबके बीच निधि चुपचाप उसके साथ चल रही थी। ऑफिस में जाने के बाद विनम्र ने दरवाजा खोला और निधि को अंदर जाने के लिए कहा। यहां प्रधानमंत्री की प्रेस कॉन्फ्रेंस होनी थी, और यहीं रिपोर्टर आगे के प्रोग्राम तक प्रधानमंत्री को कवर करेंगे। निधि ने एक माइक पकड़ा और उन रिपोर्टर के बीच जाकर बैठ गई। विनम्र वही एक सीट के बगल में जाकर खड़ा हो गया, जहां प्रधानमंत्री को आकर बैठना था।
दोनों एक दूसरे को देख रहे थे लेकिन सिर्फ आंखों से। चारों और रिपोर्टरों की तू तू मैं मैं का शोर हो रहा था। जल्द ही सारा शोर प्रधानमंत्री के आने के साथ ही खत्म हो गया। सभी रिपोर्टर खड़े हुए और प्रधानमंत्री का अभिवादन किया। प्रधानमंत्री अपनी कुर्सी पर बैठा और रिपोर्टर को एक-एक कर सवाल पूछने के लिए कहा।
अलग-अलग रिपोर्टरस ने अलग-अलग सवाल पूछे। ज्यादातर सवाल पहले से ही डिसाइड कर लिए गए थे, क्योंकि उनके तानाशाही राज में मीडिया पर पूरा नियंत्रण सिर्फ उन्हीं का था। सवालों में किसी ने पूछा " आप जनता से कितना प्यार करते हैं??" तो किसी ने पूछा "जनता आपको क्यों नकारती है" और कुछ लोग पूछ रहे थे "क्या आप आने वाले समय में इलेक्शन करवाएंगे" इन सबके बीच निधि ने किसी तरह का सवाल नहीं पूछा। वह खामोश थी क्योंकि अगर वह सवाल पूछती तो सबके पैरों तले जमीन खिसक जाती। उसके मन में यही था की "आने वाले समय में उनकी राजनीति को लेकर क्या समझ है?? वह अपना देश पर राज करना चाहते हैं या इस विश्व पर ??" वैसे भी विश्व को जीतने की होड़ दुनियाभर के तमाम नेताओं में मची रहती है, सिकंदर ने भी इसी पीछे अपनी जान गवाई और हिटलर ने भी। लेकिन यह भुख है कि कभी मिटती ही नहीं।
सवाल-जवाब का सिलसिला खत्म हुआ, प्रधानमंत्री खड़े हुए और जनता का अभिवादन करने के लिए मंच की तरफ चले दिए। विनम्र भी उनके पीछे-पीछे मंच की तरफ चला गया। वहां खड़े रिपोर्टरों को मिलिट्री ने कवर किया और एक-एक कर प्रधानमंत्री से कुछ दूर रखी कुर्सियों पर जाकर बिठा दिया। यहां से उन्हें प्रधानमंत्री के अभिवादन को सुनना और रिकॉर्ड करना था। टीवी पर प्रसारण भी यहीं से होगा। निधि के पास मौका तो था कि वह प्रधानमंत्री पर हमला कर उसे खत्म कर दे, लेकिन इन हालातों में ऐसा बेवकूफी से भरा कदम उठाना ठिक नहीं था।
प्रधानमंत्री ने जनता को संबोधित किया।
"मेरे प्यारे देशवासियों, मुझे खुशी है... इस शानदार समारोह पर आप सब यहां एकत्रित हुए। आप लोगों का यह प्यार और देशभक्ति मुझे जीने का सबक देती है। पूर्वोत्तर देशों के हिंसक अत्याचारों के बावजूद हम लोग अपने पैरों पर खड़े हैं। पता नहीं कितने देश आए जिन्होंने अपनी मनमर्जी हम पर चलाई लेकिन हम हरगिज़ नहीं झुके। अपने हक की लड़ाई करना हमारे रगो में हैं, हमारे पूर्वजों ने हमें सिखाया था कि चाहे कुछ भी हो जाए लेकिन अपना हक किसी को मत देना। वैसे तो यह मेरी सालगिरह का समारोह, ऐसे में यह बात करना उचित नहीं, लेकिन जिस तरह का माहौल बना हुआ है मुझे यह बात करनी ही पड़ेगी। आज बॉर्डर पर जंग का माहौल है। इराक की सेना मुंह फाड़ हमारे देश की तरफ देख रही हैं। इस बात का भी फैसला करना मुश्किल हो रहा है कि पता नहीं कब वह दिन आएगा जब जंग शुरू हो जाए। एक बार अगर जंग शुरू हो गई तो दूसरे देश भी इस में कूद जाएंगे। हम सब तीसरे विश्वयुद्ध की ओर बढ़ रहे हैं, यह तीसरा विश्व युद्ध शक्ति को दिखाने का नहीं बल्कि शक्ति को आजमाने का विश्व युद्ध होगा। सभी देश अपनी अपनी शक्तियां छोटे और कमजोर देशों पर आजमायेंगे। कोई परमाणु बम से हमला करेगा, तो कोई हाइड्रोजन बम से। किसी के पास न्यूक्लियर वेपन होंगे तो किसी के पास न्यूक्लियर टैंक। हम सब एक कभी न खत्म होने वाली जंग की तरफ बढ़ रहे हैं, ऐसे में आप लोग क्या चाहते हैं कि मैं सत्ता से हट जाऊं। बताइए, आप क्या चाहते हैं कि मैं इस देश की भागदौड़ एक ऐसे इंसान के हाथ दे दूं जिसे देश संभालना ही नहीं आता। ( अपने विपक्ष के बारे में बात कर रहे हैं) हमारे दुश्मन हमारे सर पर खड़े हैं और आप लोग चुनावों के बारे में सोच रहे हैं। अगर चुनाव हो जाता है तो दूसरे देश इसका फायदा उठाएंगे, हो सकता है वह हमला भी कर दे। बिना आर्डर के हमारी सेना भी आगे नहीं बढ़ेगी, यह पूरा देश खत्म हो जाएगा। मैं ऐसा हरगिज़ नहीं होने दूंगा, मैं लुइस इल्लल्लाह जब तक जिंदा हूं तब तक सीरिया की आन और शान बनाए रखूंगा। अल्लाह हू अकबर, अल्लाह हू अकबर"
इसके बाद यह नारे चारों तरफ गूंजने लगे। प्रधानमंत्री ने अपना संबोधन खत्म किया और कई सारे सुरक्षा कर्मचारियों के साथ वहां से निकल गए। निधि और रिपोर्टर भी उनके पीछे-पीछे थे। दूसरे लोगों से नजर बचाकर निधि उन रिपोर्टरों से अलग हुई और एक कोने में जाकर अपना बुर्का उतार दिया। बुर्के के नीचे उसने मिलिट्री वाली वर्दी पहन रखी थी, और यह बात विनम्र को भी नहीं मालूम थी। मिलिट्री की वर्दी में आने के बाद उसने अपने बालों को समेटा और उसे बाधं कर उस पर कैप लगा ली। उसने अपनी वेशभूषा इस तरह कर ली थी कि जैसे वह उन्हीं की मिल्ट्री का हिस्सा है। इस बात से स्पष्ट होता है कि उसके इरादे कुछ और ही है।
अपनी वेशभूषा बदलने के बाद वह फिर से प्रधानमंत्री के काफिले के पीछे हो गई। उसने रिपोर्टरों वाली लाइन छोड़ी और सीधे जाकर प्रधानमंत्री के सुरक्षा कर्मचारियों में शामिल हो गई। वह अब उनके साथ साथ चल रही थी। प्रधानमंत्री के सुरक्षा की जिम्मेदारी विनम्र और युसुफ (उसको ऑर्डर देने वाली इंसानों) के हाथ थी। मतलब अगर कुछ भी ऊपर नीचे होता है तो उन्हीं लोगों को देखना था। विनम्र चारों तरफ नजर रखे हुए था। निधि उससे ठीक 3 सैनिकों की दूरी पर उसके साथ साथ चल रही थी। विनम्र ने निधि को देख लिया। वह देखते ही समझ गया निधि क्या करना चाहती हैं, लेकिन वह कुछ कर नहीं सकता था। निधि को रोका तो वह पकड़ी जाएगी, और अगर नहीं रोका तो शायद प्रधानमंत्री की जान पर खतरा आ जाएगा। वह चुपचाप काफिले के साथ साथ चलता रहा, आसपास नजर रखने की बजाय उसने निधि पर निगाहें पेनी कर दी। निधि प्रधानमंत्री के सेफ्टी सिस्टम को हाईजैक कर चुकी थी, वो भी सिर्फ और सिर्फ विनम्र के कारण।
सब आगे चलकर अलग अलग गाड़ियों में बैठने लगे। प्रधानमंत्री के साथ रहने वाले दूसरे ऑफिसर पीछे की गाड़ी में बैठे। निधि, विनम्र और युसुफ तीनों एक साथ प्रधानमंत्री के साथ उनकी गाड़ी में। उनके साथ दो लोग और थे। दूसरे लोगों को लग रहा था कि निधि विनम्र के साथ हैं, और वह उसकी खासम खास है इस वजह से वह साथ में चल रही है, अन्यथा किसी भी अनजान आदमी की इतनी हिम्मत नहीं होती कि वह प्रधानमंत्री के इतने करीब पहुंच पाए। वहीं विनम्र निधि को रोकने की कोशिश इसलिए नहीं कर रहा था क्योंकि अगर उसने रोका तो वह लोग उसे पकड़ लेंगे।
गाड़ियों का काफिला सड़क पर बढ चला। यह काफिला अब आगे चलकर प्रधानमंत्री के ऑफिस पर ही जाकर रुकेगा। गाड़ी के अंदर निधि युसूफ और विनम्र सीट के एक तरफ थे जबकि प्रधानमंत्री ठीक उनके सामने वाली सीट पर। उनके साथ के बाकी दो आदमी प्रधानमंत्री के अगल-बगल बैठे थे। गाड़ी काफी लंबी थी पर इसके बावजूद उसके अंदर सिर्फ 6 लोगों के बैठने की व्यवस्था थी। एक सीट ड्राइवर के पास खाली थी, जहां बैठने वाले व्यक्ति ड्राइवर और उसकी गतिविधियों पर नजर रखता था। ड्राइवर को आदेश होते हैं कि चाहे कुछ भी हो जाए, प्रधानमंत्री की गाड़ी कभी भी रास्ते में नहीं रुकनी चाहिए।
गाड़ी रास्ते पर आगे चलीं जा रहीं थी। रास्ते में ही प्रधानमंत्री ने युसुफ से आगे की बातें शुरू कर दी।
"और बताओ यूसुफ.... काम कैसा चल रहा है। साइंटिस्ट के एक्सपेरिमेंट काम आएंगे भी या नहीं" लुईस इल्लल्लाह ने साइंटिस्ट के कामकाज को लेकर अपनी बात शुरू की।
"जी सर!! सब कुछ सही चल रहा है, उसने एडवांस हथियार बनाना शुरू कर दिया है वह भी उच्च स्तर के....अगर वह अपनी कला का इसी ढंग से प्रयोग करता रहा तो हमें विश्व विजेता बनने से कोई नहीं रोक सकता"
"बहुत खूब" प्रधानमंत्री ने मुस्कुराकर एक खुशी वाली मुस्कान दिखाई। "और विनम्र.. तुम बताओ .. तुम्हारा काम कैसा चल रहा है... मैंने तुम्हें जो थंडर लाइन ढूंढने का काम दिया था वह हुआ या नहीं" प्रधानमंत्री ने विनम्र से पूछा।
विनम्र दुविधा में पड़ गया, आखिर वह इस सवाल का क्या जवाब दें, अब तो वह चाह कर भी थंडर लाइन उन्हें नहीं दे सकता था। उसने जवाब दिया "बस सर, कुछ दिन और...."
प्रधानमंत्री ने उसे भी एक भीनी सी मुस्कान दिखाई और फिर वह निधि की तरफ देखने लगे। इससे पहले उन्होंने निधि को नहीं देखा था इसलिए निधि को देखकर उन्होंने पूछा "और आप मोहतरमा!! आपका क्या परिचय हैं"
विनम्र यह सुनते ही बीच में बोल पड़ा। "यह मेरे साथ आई है, स्पेशल बॉडीगार्ड है...."
"ओह" प्रधानमंत्री विनम्र की तरफ देख कर बोले। "इंशा अल्लाह.... आजकल औरतें भी देश की सेवा में अपना अच्छा खासा योगदान दे रही है" और फिर उन्होंने निधि की तरफ देखकर उसे भी एक हल्की मुस्कान दी। "तुम्हारे पापा क्या करते थे" उन्होंने निधि से पूछा।
"जी वो भी आर्मी में थे" निधि ने तुरंत बिना किसी हिचकिचाहट के जवाब दे दिया।
"कौन सी पोस्ट...." लेकिन बीच में ही युसुफ बोल पड़ा। हालांकि किसी को शक नहीं हुआ था, और यह जो सवाल पूछे जा रहे थे वह सामान्य थे। पर अगर यहां निधि किसी भी तरह की गलती करती हैं तो संभव था, वह आसानी से पकड़ी जाएगी। निधि यूसुफ के सवाल पर उसकी तरफ मुड़ी और जवाब दिया "उनकी कोई पोस्ट नहीं थी..... वह सिर्फ एक सोल्जर थे"
"क्या बात है!!" प्रधानमंत्री यह सुनकर और खुश हो गए "एक सोल्जर की बेटी होकर तुमने अपनी लगन और मेहनत से कितनी तरक्की की... माशा अल्लाह.... भगवान तुम्हें लंबी उम्र दे"
इसके बाद आगे कोई सवाल जवाब नहीं हुआ। कुछ देर तक गाड़ी में सन्नाटा छाया रहा। प्रधानमंत्री अपने साथ के लोगों से हल्की फुल्की बातें करने लगें, देश की अर्थव्यवस्था और बदलते हालातों को लेकर। लेकिन अचानक उनके फोन पर एक मैसेज आया।
प्रधानमंत्री ने तुरंत उस मैसेज की तरफ देखा और फिर गाड़ी के साथ वाले ड्राइवर को वायरलेस पर मैसेज दिया "अरे सुनो, यह तिरिसका जेल का टावर किस तरफ है..."
"जी सर यही पास में है" ड्राइवर के साथ वाले आदमी ने जवाब दिया।
"अच्छा ऐसे करो.... गाड़ी उस तरफ घुमा लो" प्रधानमंत्री ने उसे आदेश दिया। निधि और विनम्र यह सुनकर सख्ते में आ गए। जरूर फोन पर आने वाला मैसेज वकार अहमद का होगा, और उसी ने प्रधानमंत्री से संपर्क कर उन्हें वहां आने के लिए कहा होगा। विनम्र ने निधि पर रखने वाली नजर और तीखी कर दी। अब यहां से उसे हर पल सावधानी रखना जरूरी था.....। प्रधानमंत्री की गाड़ी घूमने के साथ-साथ उनके गाड़ी को दूसरा काफिला भी घूम गया। सब अब तिरिसका जेल नाम की जगह की ओर जा रहे थे। प्रधानमंत्री के काफिले में चलने वाली कुल गाड़ियों की संख्या छह थी। एक हेलीकॉप्टर भी था जो उन गाड़ियों के ऊपर उड़ रहा था।
निधि गहरी सांस लेकर खुद को नए हालातों के लिए तैयार करने लगी, आसपास धूल मिट्टी तो उड़ ही रही थी। निधि ने हल्के से खांसने का बहाना किया और मुंह पर रुमाल बांध लिया। वैसे धूल मिट्टी कांच के बाहर उड़ रही थी पर वह काफी ज्यादा थी, जिस वजह से ऐसे प्रतीत हो रहा था जैसे वह अंदर आ रही है। निधि ने इस स्थिति का फायदा उठाया। जल्द ही गाड़ी प्रधानमंत्री के बताए पते पर थी। गाड़ी के बाहर रुकते ही एक आदमी कंबल ओढ़े तेजी से उनकी तरफ आने लगा। उसे आता देख पीछे की गाड़ियों से लोग उतरे और तुरंत प्रधानमंत्री की गाड़ी को घेर लिया। लेकिन अंदर से प्रधानमंत्री बोल पड़े "आने दो आने दो.... उसे आने दो। वह अपना ही आदमी है" प्रधानमंत्री के इस आदेश के बाद कुछ लोगों ने उसकी तलाशी ली और उसका कंबल लेकर रख लिया। फिर उन्हें प्रधानमंत्री की गाड़ी के अंदर जाने दिया। वह वकार अहमद ही था। गाड़ी के अंदर जाते ही उसने प्रधानमंत्री को असलाम वालेकुम कहा और ठीक विनम्र के बगल में बैठ गया। गाड़ी फिर से चल पड़ी। अंदर एक-एक कर उसने बाकी के लोगों को भी असलाम किया..... निधि को भी। पर निधि का चेहरा ढका हुआ था जिस वजह से वह उसे पहचान नहीं पाया। वैसे भी उसके दिमाग में निधि के गाड़ी में होने का विचार बिल्कुल नहीं था। वकार अहमद ने गाड़ी में कुछ देर सांस ली और फिर वह प्रधानमंत्री की तरफ देखकर बोले।
"मुबारक हो मेरे आका, आपको जिस चीज की तलाश थी वह मिल चुकी है"
"क्या" यह सुनकर प्रधानमंत्री की आंखों में एक अलग ही चमक आ गई। वहीं निधि और विनम्र इसके उल्ट, उनकी आंखों की चमक क्षीण पड़ गई।
"हां मेरे आका.... मुझे थंडर लाइसं मिल चुकी है" वकार अहमद ने अपनी जेब में हाथ डाला और मोबाइल निकाल लिया।
"यह तो बहुत खुशी की बात है.... तुमने आज मेरा दिल खुश कर दिया वकार " प्रधानमंत्री ने अपने दोनों हाथ हवा में फैलाकर एक अलग ही अंदाज दिखाया। विनम्र ने अपने हाथ की मूठियां भींच ली, लेकिन वकार अहमद के लिए नहीं बल्कि निधि के लिए। निधि जरूर यहां पर कोई कदम उठाएगी। वकार अहमद ने फोन निकाला और उसे प्रधानमंत्री की तरफ बढ़ा दिया.....प्रधानमंत्री ने अपना हाथ फोन लेने के लिए आगे बढ़ाया ...लेकिन बीच में गाड़ी को एक झटका लगा और फोन नीचे गिर गया।
निधि और विनम्र दोनों एक साथ फोन को उठाने के लिए नीचे झुके, लेकिन उनके साथ साथ वकार अहमद भी नीचे झुक चुका था। तीनों नीचे झुके हुए थे... और तीनों के हाथ एक साथ फोन की तरफ थे। निधि ने तेजी दिखाई और फोन उठा लिया। पर इसी दौरान उसके चेहरे का रुमाल उतर गया। वकार अहमद ने निधि की शक्ल देखी और वह देखते ही पहचान गया कि वह निधि है, उसके मुंह से यकायक निकला .... "तुम और यहां....!!!"
उसके आश्चर्य की सीमा नहीं थी। हालात हद से बाहर हो चुके थे......। निधी ने फोन तुरंत अपने कब्जे में लिया और रिवॉल्वर निकालकर उस पर तान दी। विनम्र ने भी तुरंत अपनी रिवाल्वर निकाली और उसे निधि की तरफ कर दिया। युसूफ और प्रधानमंत्री यह सब देख रहे थे, उनके पल्ले कुछ नहीं पड़ रहा था कि आखिर हो क्या रहा है। प्रधानमंत्री ने पूछा "यह सब क्या है?? और तुम लोग यह क्या कर रहे हो"
निधि का पिस्तौल वकार अहमद की तरफ था। विनम्र का निधि की तरफ.... वकार अहमद बोला "यह इंडिया की खुफिया एजेंट है.... और यहां आप को मारने के लिए आई है" यह सुनते ही युसूफ और प्रधानमंत्री के बगल के लोग तुरंत सख्ते में आए और प्रधानमंत्री के इर्द-गिर्द हाथों का घेरा बना लिया।
"यह तुम क्या कह रहे हो" युसुफ अपने हाथ प्रधानमंत्री की करीब रखते हुए बोला। "यह तो विनम्र के साथ काम करती है"
"झूठ बोल रही है ये" वकार अहमद ने तुरंत जवाब दिया "और विनम्र भी झूठा है, वह तो खुद इंडिया का एजेंट है"
यह सुनकर यूसुफ की आँखें और चुधिंया गई। उसे इस बात का नहीं पता था कि विनम्र भी इंडिया का एजेंट है। वह बड़ी-बड़ी आंखों से विनम्र की तरफ देखने लगा।
"यह सच नहीं है..." विनम्र ने वकार अहमद की बात का जवाब दिया। "मेरे लिए सीरिया से बढ़कर कोई देश नहीं...मेरा दिल जब भी धड़का है, सिर्फ और सिर्फ सीरिया के लिए धड़का है.....ना ही सीरिया से कोई बढ़कर है और ना ही उसे कोई लजीज..."
"हम अच्छे से जानते थे" युसुफ ने एक संतुष्टि वाली सांस ली और फिर निधि की तरफ देखने लगा। "लेकिन मेरे लिए ऐसा नहीं है...." निधि बोली " हां... में इंडिया की एजेंट हूं...." उसने जवाब दिया और रिवाल्वर पर अपनी पकड़ और तेज कर ली। जवाब में विनम्र ने भी रिवाल्वर की पकड़ तेज करते हुए निधि को बता दिया, उसे यहां वह किसी भी तरह का कदम उठाने नहीं देगा।
वकार अहमद फिर बोला " यह सब इनकी चाल है.... सब मिले हुए हैं" और फिर विनम्र की तरफ देखने लगा "अगर यह इससे ना मिला होता तो अब तक इस पर गोली चला देता" और सीधे अपनी बातों से विनम्र को निधि पर गोली चलाने के लिए मजबूर करने लगा।
युसूफ और प्रधानमंत्री तथा बाकी के 2 आदमी, वह हाल फिलहाल में तो इस पूरे परिदृश्य को अपनी आंखों से देख रहे थे। वकार अहमद ने फिर अपनी बात पर जोर दिया "देखा!! इसने अभी तक गोली नहीं चलाई.... मतलब साफ है... यह उससे मिला हुआ है"
युसुफ को भी यह बात हैरान कर रही थी। उसने विनम्र को कहा "तुम आखिर गोली क्यों नहीं चलाते इस पर... गोली चलाओ और इसका काम तमाम कर दो"
सब लोग विनम्र को निधि पर गोली चलाने के लिए मजबूर करने लगे, निधि भी खामोशी से देख रही थी की विनम्र क्या करता है क्या नहीं.... उसका भी पिस्तौल वकार अहमद की तरफ था पर वह भी अपना कदम नहीं उठा रही थी। आसपास बढ़ते दबाव के कारण विनम्र ने पिस्तौल का ट्रिगर दबाया और निधि पर गोली चलाने की स्थिति में आ गया...अंदर से उसका दिल तेजी से धड़क रहा था पर बाहर के दवाब के आगे.... शायद दिल का धड़कना काम नहीं आ रहा था। निधि ने विनम्र की तरफ देखा और फिर एक गहरी सांस लेकर प्रधानमंत्री के अगल-बगल बैठे दोनों आदमियों पर गोली चला दी। निशाना सीधे उनके सर के बीचो-बीच लगा। युसूफ तुरंत सकते में आया और अपना रिवाल्वर निकालकर निधि की तरफ करने लगा.... पर बीच में ही विनम्र ने आते हुए...अपने पिस्तौल के पीछे वाले हिस्से से यूसुफ के सर पर वार कर दिया। चोट लगते ही युसुफ बेहोश हो गया। वकार अहमद भी लड़ने वाली स्थिति में आया और उसने वहां के एक आदमी की पिस्तौल निकालकर निधि पर तान दी पर जवाबी कार्यवाही में विनम्र और निधि दोनों का पिस्तौल उसकी तरफ था।
प्रधानमंत्री के तो होश ही ठिकाने नहीं थे। उसे तो पता भी नहीं लग रहा था वह आज बचेगा या नहीं..... उसके साथ वाले 2 आदमी मारे गए.... युसुफ भी बहोश हो गया। गाड़ियों का काफिला आगे बढ़ता जा रहा था पर प्रधानमंत्री की गाड़ी के अंदर क्या हो रहा है किसी को भी इस बात की भनक नहीं थी। प्रधानमंत्री ने उन सबके सामने अपना वायरलेस निकाला, पर उनकी हरकत करते ही निधि ने उस पर रिवाल्वर तान दी.... विनम्र ने तुरंत अपने हाथ से उसका रिवाल्वर हटाते हुए कहा "तुम इन्हें कुछ नहीं करोगी" यह सुनकर निधि ने अपनी रिवॉल्वर नीचे की और फिर विनम्र को बोला "ठीक है... लेकिन तुम इन्हें बोल दो कि इनकी वजह से हमें किसी तरह का खतरा नहीं होना चाहिए.." उसका ईशारा प्रधानमंत्री की तरफ था। विनम्र प्रधानमंत्री की तरफ देखने लगा। प्रधानमंत्री ने गर्दन हिलाकर हामी भरी और वायरलेस पर ड्राइवर के बगल बैठे आदमी से कहा "गाड़ियों का काफिला हमारी सीक्रेट लेब की तरफ ले लो..." और फिर वायरलेस नीचे रख दिया।
निधि ने एक गहरी सांस ली और सीट पर बैठ गई। विनम्र भी बैठ गया। प्रधानमंत्री और वकार अहमद दोनों खामोश थे। निधि विनम्र को देख कर बोली "अब आगे क्या...!!"
विनम्र ने पहले वकार अहमद की तरफ देखा और फिर प्रधानमंत्री की तरफ " मैं समझाने की कोशिश करता हूं" वह प्रधानमंत्री से बोले "सर मुझे माफ करना... लेकिन मैं देश से किसी तरह की गद्दारी नहीं कर रहा...." और फिर एक गहरी सांस लेकर कहा "आप जो भी कर रहे हैं वह सही नहीं है.....अगर हम दूसरे देशों पर हमला करेंगे तो चारों और अशांति फैल जाएगी। हजारों निर्दोष लोग मारे जाएंगे। जंग से आज तक ना किसी का फायदा हुआ है और ना ही आगे भविष्य में होगा। आप जगं के इस विचार को छोड़ दे....यह जो थंडर लाइस आप लेना चाहते हैं वह किसी भी तरह के हथियार से ज्यादा खतरनाक है .... ऐसे में इन्हें नष्ट करें और आगे शांति से देश के विकास के लिए काम करें"
"तुम चाहते हो प्रधानमंत्री तुम्हारे आगे झुक जाए" वकार अहमद बोला "क्या तुम प्रधानमंत्री को कंट्रोल करना चाहते हो....वह भी उन्हें ब्लैकमेल करके" निधि ने तुरंत अपना पिस्तौल उसकी तरफ किया और कहा "तुम चुप ही रहो तो अच्छा है.... वरना मैं तुम्हें बोलने लायक नहीं छोडूंगी"
फिर दोनों प्रधानमंत्री के बोलने का इंतजार करने लगे। लुइस इल्लल्लाह कुछ देर सोचने के बाद बोला "देखो तुम्हारा कहना सही है.... पर वर्तमान में जिस तरह के हालात हैं वह जंग की ओर ही इशारा कर रहे हैं.... इराक बॉर्डर पर अपनी सेना लेकर तैयार खड़ा है, वो भी हम पर हमला करने के लिए। अगर मैं जंग नहीं करूंगा तो वह कर देंगे। जंग तो होकर ही रहेगी.... मेरे चाहने या ना चाहने से कुछ नहीं होगा"
"आप उसकी फिक्र ना करें" निधि प्रधानमंत्री का जवाब सुनकर बोली। "हमारी इराक से अच्छी जान पहचान है, हम लोग इराक की सेना को पीछे हटने के लिए कह देंगे। और वह मना भी नहीं करेंगे...."
"इराक ऐसा कभी नहीं करेगा...." प्रधानमंत्री लुइस इल्लल्लाह बोले। "वहां का शासन निरंकुश और दूसरे देशों पर अधिपत्य करने वाला है"
"लेकिन यह विचारधारा तो आप लोगों की है, इराक ने तो खुद हम लोगों से मदद मांगी है। वह चाहते हैं कि हम इराक के लोगों को आपकी तानाशाही रवैए से मुक्त करवाएं। आपकी वजह से वह एक कभी न खत्म होने वाली जंग की तरफ जा रहे हैं..."
"क्या!! " यह सुनते ही प्रधानमंत्री ने ऐसे रिएक्ट किया जैसे मानो उनकी सबसे कीमती चीज चोरी हो गई हो। "और यह बात तुम लोगों से किसने कही..." उसने तुरंत निधि से पूछा।
"खुद इराक के प्रधानमंत्री ने। वह हमारे देश दौरे पर आए थे तब उन्होंने कहा था कि हमें सीरिया से खतरा है" निधि ने लुईस को इराक के प्रधानमंत्री के दौरे वाली बात बताई।
"झूठ बोल रहे हैं वह लोग" प्रधानमंत्री बोले "ऐसा कुछ नहीं है...... वह लोग हमारे आतंक से पीड़ित नहीं.... बल्कि हम लोग उनके आतंक से पीड़ित हैं.... जंग हम नहीं बल्कि वह लोग चाहते हैं। उन्होंने तुम लोगों के साथ भी धोखा किया है.... मुझे तुम्हारे हाथों मरवाकर वह इस जंग को बिना लड़े ही जीतना चाहते हैं"
"क्या यह सच है...." निधि के हैरानी की कोई सीमा नहीं थी। यह तो कहानी में एक नया ही ट्विस्ट था जिसके बारे में किसी को नहीं पता था। " हमें तो लग रहा था सीरिया के प्रधानमंत्री के इरादे ठीक नहीं, पर यहां तो अलग ही खिचड़ी पक रही है" निधि ने विनम्र को कहा।
"हमारे प्रधानमंत्री गलत नहीं हो सकते..." विनम्र बोला "लगता है इराक वाले तुम लोगों के साथ डबल गेम खेल रहे हैं"
निधि ने विनम्र की पूरी बात सुनी और फिर थोड़ी देर सोचते हुए बोली "लेकिन अगर ऐसा है तो आपको इन थंडर लाइन्स की इतनी क्यों पड़ी है" उसने यह सवाल प्रधानमंत्री से पूछा।
"अरे मामूली सी बात है!! यह थंडर लाइंस कोई ऐसी वैसी चीज नहीं, सब देश इसके पीछे पड़े हैं...... अगर यह मेरे हाथ पहले आती है तो जाहिर है!! मैं इसका सबसे पहले उपयोग अपने देश पर आने वाले खतरों को कम करने के लिए करता। मेरे लिए इस वक्त इराक से बड़ा कोई खतरा नहीं, ऐसे में मैं इसका इस्तेमाल करके कोई गलती नहीं कर रहा"
विनम्र के साथ-साथ निधि भी दुविधा में फंस गई। सीरिया के प्रधानमंत्री अच्छे हैं या बुरे इस बात का फैसला ले पाना उसके लिए मुश्किल हो रहा था। लेकिन उसका काम प्रधानमंत्री ने आसान कर दिया। प्रधानमंत्री बोले " लेकिन मैं अब समझ चुका हूं, इस गलती को करके सिवाय नुकसान के और कुछ नहीं होगा। मैं जंग की राह त्याग कर अमन और शांति के रास्ते पर बढुगां..... अब जंग नहीं होगी। हम लोग इराक से बात करके आपसी मसला भी सुलझा लेंगे। भले ही जंग के इरादे उनके हो पर अगर शांति से बात करेंगे तो इन्हें भी टाला जा सकता है"
यह सुनकर निधि और विनम्र दोनों के चेहरे पर मुस्कान आ गई। दोनों खुश थे, पर वकार अहमद के चेहरे पर खुशी नहीं थी। "यह आप क्या कह रहे हैं...!!" वह बोला "आपने तो कहा था आप इराक को खत्म कर देंगे"
"हां... लेकिन इन दोनों बच्चों ने मुझे समझा दिया है कि इस बात में कुछ नहीं पड़ा.... इसलिए अब ऐसा नहीं होगा"
यह बात उसे हजम नहीं हो रही थी, पर सिर्फ वही नहीं था जिसे यह बात हजम नहीं हो रही थी। उसके साथ साथ युसुफ को भी यह बात अच्छी नहीं लगी। युसुफ को बहुत पहले होश आ चुका था पर वह अभी भी बेहोश होने का नाटक कर रहा था। अचानक वह होश में आया और उसने तुरंत विनम्र के रिवाल्वर पर झपटा मारा.... मौके का फायदा उठाकर वकार अहमद की निधि पर टूट पड़ा। पूरा खेल बदल चुका था.... जो रिवाल्वर अब से कुछ देर पहले निधि और विनम्र के हाथ में था... वह अब वकार अहमद और युसुफ के हाथ में था। युसुफ बोला "तुम लोग क्या चाहते हो जो सपना में बचपन से देखता आ रहा हूं.... उसे छोड़ दूं। जिस मकसद के लिए मैं जीता आ रहा हूं उसे छोड़ दूं.... मैं इराक को बर्बाद होते देखना चाहता है.... और मैं किसी को भी इस रास्ते में नहीं आने दूंगा" फिर वह प्रधानमंत्री की तरफ मुड़ा "और आप!! आपको क्या हो गया है.... आप के इस मकसद की वजह से तो मैं आपका साथ दे रहा था....लेकिन अब जब इसे पूरा करने का वक्त आया तो आप बदल गए।"
लुइस बोला "देखो यूसुफ.... शांति और धैर्य से काम लो.... जंग से कभी किसी को फायदा नहीं होता"
"चुप रहो बेवड़े" उसकी यह बात युसुफ ने टोक दी "तुम तो क्या... तुम्हारा बाप भी इस जंग को होने से नहीं रोक सकता। यह उपदेश किसी और को देना...."
"यह कैसी भाषा का परिचय दे रही हो तुम" युसुफ की यह बात सुन कर लुइस को भी गुस्सा आ गया।
"चुप रहो!! तुम अब हमारे प्रधानमंत्री नहीं।" फिर उसने वायरलेस उठाया और ड्राइवर की सीट के बगल में बैठे आदमी को आदेश दिया "प्रधानमंत्री ने अपने इरादे बदल दिए हैं, वह अब लेब तो जाएंगे पर अकेले.... काफिले की बाकी की गाड़ियों को वापस लौट जाने का आदेश दे दो... खुफिया लैब में दूसरे आदमी भी अलाउड नहीं। सब खाली करवा दो"
उस आदमी ने यूसुफ की बात सुनी और दूसरी गाड़ियों को वापस लौट जाने का संकेत दे दिए। वैसे भी खुफिया लैब थी और यहां प्रधानमंत्री हमेशा अकेले आते थे,ऐसे में उसका इस बात पर भी शक नहीं गया कि प्रधानमंत्री खतरे में है।
जल्द ही पूरा काफिला वहां से निकल चुका था और अब सिर्फ प्रधानमंत्री की गाड़ी लैब की तरफ जा रही थी।
गाड़ी के अंदर निधि और विनम्र अगले कदम की तैयारी करने लगे पर अब उनके लिए सावधानी रखना ज्यादा जरूरी था। उनके साथ साथ सिरिया के प्रधानमंत्री की जान भी ख़तरे में थी। ऐसे में एक गलत कदम उनकी जान ले सकता था।
वकार अहमद और युसूफ दोनों की पिस्तौल निधि विनम्र और प्रधानमंत्री की तरफ थे। वह दोनों उन तीनों को लेकर लेब में जा रहे थे। अचानक रास्ते में एक मोड़ आया और गाड़ी तेजी से उस मोड़ पर मुडी... जिस वजह से उन दोनों की स्थिति डामाडोल हो गई। निधि और विनम्र दोनों ने इस बात का फायदा उठाया और उनका पिस्तौल पकड़ लिया। पर वह दोनों भी आगे से सावधान थे। उनकी पकड़ पिस्तौल से छुट्टी नहीं। अब एक एक पिस्तौल पर दो-दो लोगों के हाथ थें। एक तरफ विनम्र और वकार अहमद तो एक तरफ निधि और यूसुफ।
चारों में पिस्तौल को लेकर द्वंद चल रहा था, कब कौन से पिस्तौल की गोली किस पर चलेगी कुछ कहा नहीं जा सकता था। खतरा सभी को था, जान सबकी हवा में लटकी हुई थी। कोई भी निकलने वाली गोली का शिकार हो सकता था। निधि द्वारा पकड़े गए युसुफ के पिस्तौल की नली विनम्र की तरफ थी पर ट्रिगर पर निधि का कंट्रोल था। वही वकार अहमद के पिस्तौल की नली प्रधानमंत्री की तरफ थी पर वहां ट्रिगर पर कंट्रोल विनम्र के पास था। अचानक वकार अहमद ने गाड़ी का दरवाजा खोल दिया जिससे विनम्र एक झटके के साथ बाहर दरवाजे से जा लटका, विनम्र को नीचे गिरता देख निधि का ध्यान भी वकार अहमद से भटका जिसका फायदा उठाकर वकार अहमद ने निधि को धक्का दे दिया। निधि पूरी तरह से नीचे गिर गई। निधि नीचे गिर चुकी थी जबकि विनम्र पीछे लटका हुआ था। विनम्र के एक हाथ में यूसुफ की पिस्तौल थी और एक हाथ में गाड़ी का एक हिस्सा। जबकि वकार अहमद पूरी तरह से खाली था। वकार अहमद ने रिवाल्वर चलाने के लिए विनम्र पर तानी पर इससे पहले वह चलाता विनम्र ने गाड़ी छोड़ दी।
विनम्र और निधी दोनों गाड़ी से नीचे गिर गए। गाड़ी के अंदर वकार अहमद और युसूफ दोनों ने गाड़ी का दरवाजा बंद किया "अब किसी तरह का कोई खतरा नहीं था"यूसुफ ने प्रधानमंत्री की तरफ देखा "तुम्हारे साथ क्या करना है, यह तो हम लेब में ही जाकर सोचेंगे" और प्रधानमंत्री को लेकर अकेले ही लेब की तरफ चले गए। निधि और विनम्र दोनों धूल में गिरते हुए काफी पीछे रह चुके थे।
CHAPTER-16
सिक्रेट लेब, खुफिया एक्सपेरिमेंट, निधि और विनम्र का हमला
वकार अहमद और यूसुफ सीक्रेट लैब में आ चुके थे। प्रधानमंत्री भी उनके साथ था। यूसुफ ने वहां की सिक्योरिटी पहले ही आदेश देकर कम करवा ली थी गिनती के 6 या 7 ही सिक्योरिटी गार्ड वहां मौजूद थे। लैंब में आते ही वकार अहमद ने सभी दरवाजे बंद करवा दिए। प्रधानमंत्री को लेकर एक कमरे में गया और उन्हें वहां जाकर कुर्सी से बांध दिया। फिर उसने वायरलेस निकाला और साइंटिस्ट से कांटेक्ट किया। वह लोग जिस कमरे में थे उस कमरे में उनके सामने सीसीटीवी कैमरे की फोटोस थी जो लैब के आसपास के परिदृश्य दिखा रहे थे।
"मैं बोल रहा हूं, युसुफ!!" यूसुफ वायरलेंस पर बोला "तुमने हाल फिलहाल में कुछ नए एक्सपेरिमेंट किए हैं। यही वक्त है उनका परीक्षण करने का....इस एक्सपेरिमेंट को लेब के बाहर आजमाओ" दरअसल उसे इस बात की आशंका थी कि निधि और विनम्र अभी जिंदा है, वह लेब से भी ज्यादा दूर नहीं गिरे थे। ऐसे में वह लोग यहां जरूर आएंगे। इसलिए वह उनके आने से पहले ही पुख्ता प्रबंध कर रहा था।
"क्यों नहीं सर!!" साइंटिस्ट तालियां बजाने लगा "मुझे तो मजा आएगा...." और फिर भाग कर एक कंप्यूटर स्क्रीन की तरफ गया। वहां उसने कुछ बटन दबाएं और फिर स्क्रीन की तरफ देखने लगा।
कैमरे से लेंब के बाहर का एक दृश्य दिख रहा था जो दरवाजे के ठीक सामने का था। उस दृश्य में नीचे की जमीन उखड़ रही थी.... और उससे जमीन खोदने वाली ड्रिल मशीन जैसी कुछ आकृतियां निकल रही थी। यह एडवांस तकनीक के रोबोट थे जो जमीन के अंदर घुस कर कहीं भी आ जा सकते थे। इन्हें जंगी तौर पर बनाया गया था जिनका मकसद सामने से आ रहे टेंको को निष्प्रभावी करना था। यह खास टेक्निक के रोबोट जमीन के अंदर से सीधे टैंक के नीचे पहुंचकर उनके नीचे की सतह पर वार करते थे। टेकं की नीचे की सतह सबसे कमजोर होती है जिस कारण उसे आसानी से खत्म किया जा सकता है। टैंक को डैमेज करने वाली यह तकनीक जंग में कितनी खतरनाक हो सकती है इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। वैसे भी आजकल की हालातों में बिना टैक के जंग जीतना किसी भी तरह से आसान नहीं। ज्यादातर हालातों में यह मशीनें जमीन के अंदर ही रहती है इसलिए इन्हें खत्म भी नहीं किया जा सकता।
बाहर इस तरह के 6 रोबोट का पहरा था। वह कभी जमीन में अंदर घुसते.... तो कभी बाहर आते। उनके नुकीले सिरे खतरनाक थे और किसी की भी जान ले सकते थे।
अपने ऑफिस के अंदर युसुफ ने वकार अहमद को सामने कुर्सी पर बिठाया।
"तुमने थंडर लायंस ढूंढ कर बहुत अच्छा काम किया है.... अब हम लोग अपने आसपास के देशों को झुका सकते हैं।" युसुफ ने कहा। "भले ही हमारे महामहिम बदल गए हो.... पर हम लोग नहीं बदलेंगे"
"आमीन, ऐसा ही होगा। आसपास के देश ही नहीं बल्कि दूसरे देश भी हमारे आगे झुकेंगे" वकार अहमद ने उसके सुर में सुर मिलाया।
"एक बार यह निधि और विनम्र का किस्सा खत्म हो जाए, फिर हम नए सिरे से जगं की तैयारी करेंगे। जग में सबसे पहले इराक को मजा चखाएंगे, और उसके बाद बाकी के देशों को" युसुफ बोलता जा रहा था। "सिरिया की राजनीति तो अब बदलेगी, आज से प्रधानमंत्री की गद्दी में संभाल लूंगा... और तुम्हें तोहफे में सीरिया के जनरल की गद्दी दूंगा"
वकार अहमद यह सुनकर खुश हो गया। "आप हमारा बहुत भला कर रहे हैैं...." उसने कहा।
"जिन लोगों को उनका देश भला नहीं करता, हम लोग उनकी अच्छी देखभाल करते हैं" युसूफ बोला " विनम्र को भी किसी बात की कमी नहीं आने दी थी... पता नहीं उसने हमसे दगाबाजी क्यों की"
"उस पर देशभक्ति का बुखार चढ़ गया, वह तो साला वैसे भी क**** है, मुझे तो शुरु से ही उस पर भरोसा नहीं था। वह एक ऐसे बिछु की तरह है जो अपने ही मालिक को डस लेता है।"
"सही कहा...!! लेकिन पता नहीं मैंने उसे परखने में देरी क्यों लगा दी" युसूफ अफसोस जताता हुआ केबिन में एक कुर्सी पर जाकर बैठ गया। दोनों को अभी भी निधि और विनम्र के आने का इंतजार था। "मैंने विनम्र की तरक्की में कोई कमी नहीं छोड़ी थी, हर काम उसे पहले देता था लेकिन इसके बावजूद....वो धोखेबाज निकला"
अचानक अपनी बात छोड़कर यूसुफ की नजरें स्क्रीन पर गढ़ गई। वकार अहमद भी उस तरफ देखने लगा। स्क्रीन में निधि और विनम्र दूर से उनकी ओर आते हुए दिखाई दे रहे थे।
"यह पूरी गड़बड़ तुम्हारी वजह से हुई है" विनम्र रास्ते में निधि को कह रहा था।
"अच्छा मेरी वजह से!!" निधि बोली "धोखा तो तुम्हारे लोगों ने दिया है"
"अरे तुम उनके मकसद के आड़े आ रही हो, वो लोग धोखा तो देंगे ही" विनम्र ने अपना तर्क रखा।
"इसे मकसद नहीं पागलपन कहते हैं, दुनिया का नियम है कि है जैसे चल रही है इसे चलने दो.... अगर तुम लोग इस पर कब्जा करने जाओगे तो यह कहां की समझदारी हैं"
"हां"निधि की बात के जवाब में विनम्र को बोलने के लिए कुछ नहीं सुझा "सही है लेकिन!! यह दो देशों के अपने अंदरूनी मसले हैं।"
"माना की ये दो देशों के अपने अंदरूनी मसले हैं, पर इनका प्रभाव आसपास के देशों पर भी पड़ेगा। यहां तीसरा विश्वयुद्ध छिड़ जाएगा तीसरा विश्वयुद्ध" निधि ने आखिर में अपनी बात पर जोर दिया।
विनम्र फिर खामोश था "तीसरे विश्वयुद्ध का तो पता नहीं, लेकिन अब प्रधानमंत्री की जान खतरे में है। उन्हें बचाना जरूरी है"
दोनों लैब के बाहर पहुंच चुके थे। लेकिन वहां पहुंचते ही उनके चलते हुए कदम रुक गए..... दोनों ने अपनी आंखों से वह दृश्य देखा जिसकी उन्होंने कभी कल्पना ही नहीं की थी।
"आखिर यह क्या चीज है....??" विनम्र ने उस दृश्य को देखकर कहा।
"मुझे भी समझ में नहीं आ रहा" निधि बोली। वह भी उस दृश्य को देख रही थी।
उनके सामने 6 एडवांस रोबोटिक्स ड्रिल मशीन थी, वह समुंदर में मछली की तरह जमीन के अंदर और बाहर आ जा रही थी।
"दरअसल मैं तुम्हें बताना भूल गया था" विनम्र बोला " इन लोगों ने एक पागल सा साइंटिस्ट हायर कर रखा है, यह सब उसी का काम लग रहा है
"क्या!!" निधि चौंकी "मर गए!! कोई भी साइंटिस्ट कभी पागल नहीं होता, उसके यह एक्सपेरिमेंट हमारी...." निधि चुप हो गई।
"जो भी हो खतरा तो उठाना ही पड़ेगा" विनम्र अपने इर्द-गिर्द देखने लगा। अंदर जाने के दो रास्ते थे। एक सामने की तरफ और एक पीछे। जितनी भी ड्रिल मशीन थी वह सामने थी जबकि पीछे कोई ड्रिल मशीन नहीं थी। "मेरे पास एक आईडिया है" वह निधि से बोला। "यहां अंदर जाने के दो दरवाजे हैं। एक आगे की तरफ और एक पीछे की तरफ, मैं इन मशीनों का ध्यान भटकाता हूं.... तुम पीछे से अंदर जाओ"
निधि ने सहमति जताई और फिर वह दोनों अलग-अलग हो गए। वकार अहमद और युसूफ यह दृश्य अंदर से ही देख रहे थे। "आखिर यह लोग कर क्या रहे हैं" यूसुफ ने उन दोनों को अलग होते देख कहा
वकार अहमद ने एक शैतानी मुस्कान दी "अलग-अलग मरने की तैयारी" उसने कहा और दो तेज धार वाले खंजर निकाले और लेब के पीछे की तरफ मोर्चा संभालने के लिए चला गया।
लैब के सामने विनम्र मशीनों के साथ जूझने लगा और उनका ध्यान पूरी तरह से अपनी तरफ कर लिया। वहीं निधि लैब के बाएं हिस्से से घूमते हुए पीछे के दरवाजे पर पहुंच गई। वहां कोई भी सिक्योरिटी गार्ड नहीं था। निधि ने चारों तरफ देखा, जहां उसे कोई दिखाई नहीं दिया, और इसके बाद तेजी दिखाते हुए उस दरवाजे से अंदर चली गई।
"स्वागत है आपका महारानी" उसके अंदर आते ही सामने वकार अहमद ने उस पर तंज कसा। वह ठीक उसके सामने ही खड़ा था। तेज धार वाले खंजर उसके हाथों में थे।
निधि ने अपनी मूठियां भींची और होठ सख्त कर लिए। वह गुस्से से वकार अहमद को देख रही थी। "आज यह तुम्हारी जिंदगी का आखरी दिन है" निधि ने वकार अहमद को जवाब दिया।
यह सुनकर वकार अहमद जोर-जोर से हंसने लगा। "हा हा हा...... तुम्हें क्या लगता है, तुम जैसी छोटी सी लड़की मेरी जान लेगी" वह बोला और कुछ कदम पीछे हट गया।
"युद्ध में कोई भी छोटा बड़ा नहीं होता" निधि सामने से बोली और वह भी कुछ कदम पीछे हट गई।
इसके बाद वकार अहमद निधि की तरफ दौड़ने लगा, निधि भी वकार अहमद की तरफ दौड़ने लगी, जैसा ही दोनों एक-दूसरे के करीब आए वकार अहमद ने अपना खंजर हवा में लहराते हुए उसे निधी की तरफ बढ़ा दिया, लेकिन निधि तुरंत फिल्प मारते हुए नीचे से निकल गई। वकार अहमद का वार खाली चला गया। वह तेजी से पलटा और अपने पीछे गई निधि पर झपटा, निधि ने उसके खंजर वाले हाथ को अपने हाथ से रोक लिया फिर एक लात उसके पेट में सरका दी। वकार अहमद गिरते हुए कुछ कदम पीछे हो गया। निधि ने इस मौके का फायदा उठाया और तुरंत दोबारा ग्राउंड फ्लिप मारते हुए उसकी लात के नीचे वाले हिस्से पर वार किया। वकार अहमद नीचे गिर गया, पर वह फ्लिप मारते हुए खड़ा भी हो गया। उसने खंजर हवा में फैंका और दूर से ही निधि पर वार किया पर, निधि नीचे झुककर इस वार से बच गई। वकार अहमद की भौहें और बड़ी हो गई। अब उसके हाथ में सिर्फ एक खंजर था। दोनों में वापिस द्वंद होने लगा। वकार अहमद के पास खंजर था जबकि निधि के पास कोई हथियार नहीं था, वह वकार अहमद के हर एक हमले का डिफेंस कर रही थी। दोनों में hand-to-hand कॉम्बॉट हो रही थी। लेकिन बीच में ही निधि ने उशयारी दिखाई और उसके खंजर वाले हाथ को पकड़ कर घुमा दिया। वकार अहमद का वह खंजर भी नीचे गिर गया। निधि ने मौका ना छोड़ते हुए तुरंत उस हाथ को झटका दिया और अपने दूसरे हाथ की कोहनी सीधे उसके गले के नीचे वाले हड्डी पर मार दी। निधि का यह वार इतना खतरनाक था कि उसने उसके गले की हड्डी तोड़ दी। वकार अहमद की सास गले में ही अटक गई और वह चक्कर खाते हुए पीछे जा गिरा। लेकिन वह अभी मरा नहीं था, सिर्फ पीछे गिरा था। निधि ने उस पर ध्यान नहीं दिया और उसे ऐसे ही छोड़ कर वहां से चली गई। हालांकि निधि ने उसे इस काबिल कर दिया था कि वह अब दोबारा खड़ा ना हो पाए।
वकार अहमद को पीछे छोड़ने के बाद निधि बिल्डिंग में एक लंबे गलियारे के अंदर थी। इस लंबे गलियारे के अंत में एक लिफ्ट ऊपर की ओर जा रही थी और एक लिफ्ट नीचे की ओर। नीचे साइंटिस्ट की लैब थी जहां से वह अपने एक्सपेरिमेंट को कंट्रोल कर रहा था। निधि का टारगेट सबसे पहले वहां पहुंच कर उसे बंद करना था ताकि विनम्र भी अंदर आ सके। निधि लिफ्ट में गई और सीधे ग्राउंड फ्लोर पर पहुंची।
लिफ्ट खुलते ही उसके ठीक सामने साइंटिस्ट था, वह अभी भी अपने कंप्यूटर स्क्रीन पर कुछ बटनों से खेल रहा था। इधर यूसुफ भी निधि का यह कारनामा स्क्रीन पर देख चुका था। सिक्योरिटी के रूप में उसके पास 6-7 गार्ड ही थे, उसने उनमें से दो गार्ड तुरंत साइंटिस्ट के बैकअप के लिए भेज दिए। पर वहां साइंटिस्ट अकेला नहीं था, उसके साथ वाली औरत भी वहीं थी।
साइंटिस्ट की लैब में घुसते ही औरत और निधि एक दूसरे के आमने सामने आ गए। औरतों में अपने हाथ हवा में फैलाए और खुद के मार्शल आर्ट स्पेशलिस्ट होने का दावा किया। निधि मुस्कुराई.... शायद इसलिए क्योंकि वह भी इसमें परफेक्ट थी। जल्द ही दोनों की टक्कर हो गई। निधि और वह औरत एक दूसरे से लड़ने लगे थे। औरत अपने दोनों हाथों और दोनों पैरों से काफी फुर्ती में वार कर रही थी, जबकि निधि भी उतनी ही तेजी से उसका जवाब दे रही थी। औरत ने घूमते हुए अपने हाथ को तेज गति दी पर निधि पीछे की और खिसकती हुइ इस से बच गई। औरत ने अपनी लात हवा में घुमाई और उसे निधि की चेस्ट पर मारा निधि उस लात का हल्का सा धक्का खाते हुए तुरंत संभली पर अगले ही पल उसने उसे लात को अपने हाथों में जकड़ लिया। इसके बाद उसने उस लात को पकड़कर घुमा दिया जिससे औरत सीधे नीचे गिर पड़ी। निधि तुरंत उस पर झपटी और उसकी गर्दन को अपनी भुजाओं में ले लिया। औरत का दम घुटने लगा, निधि ने थोड़ा सा जोर और लगाया और दम घोट कर उसे अचेत कर दिया। साइंटिस्ट को लड़ना नहीं आता था.... वह उस औरत की हालत देखकर तुरंत वहां से भाग गया। लैब पूरी तरह से खाली हो चुकी थी।
निधि तुरंत कंप्यूटर पर गई और देखा क्या टाइप करना है, लेकिन कुछ भी उसके पल्ले नहीं पड़ रहा था। वह नहीं जानती थी कि यहां से उन ड्रिल मशीन को कैसे कंट्रोल किया जाए। उसके दिमाग में कुछ नहीं सुझ रहा था... आखिर में उसका ध्यान लैब के सर्किट पर गया जहां से पूरी लैब और उसके उपकरण कंट्रोल हो रहे थे। इसके अलावा यहां के कैमरे और बाकी की चीजें भी इसी सर्किट से कंट्रोल हो रही थी। निधि उस सर्किट के पास गई और उस पूरे के पूरे सर्किट को उखाड़ दिया। सर्किट के उखाड़ते ही बाहर की ड्रिल मशीनों की गतिविधियां रुक गई। इसके साथ ही सीसीटीवी कैमरे भी बंद हो गए और यूसुफ को दिखने वाला दृश्य भी।
ड्रिल मशीन के तुरंत बंद होते ही विनम्र तेजी से सामने वाले दरवाजे से अंदर गया। उसने लिफ्ट के बटन दबाएं पर वह बंद थी। सर्किट उखाड़ने के कारण लैब के तमाम इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम भी ठप पड़ चुके थे इसलिए लिफ्ट भी काम नहीं कर रही थी। वह सीढ़ियों से चौथे फ्लोर की ओर जाने लगा लेकिन यूसुफ की सेफ्टी करने वाले 4 सिक्योरिटी गार्डो ने उसका रास्ता रोक लिया। निधि भी लैब का सारा काम निपटा कर सीढ़ियों से चौथे फ्लोर की ओर आ रही थी पर जो दो सिक्योरिटी गार्ड यूसुफ ने भेजे थे वह निधि के सामने आ खड़े हुए।
विनम्र उन चारों सिक्योरिटी गार्डों का सामना करने लगा और निधि उन दोनों सिक्योरिटी गार्ड्स का। दोनों का मुकाबला सीढ़ियों पर था।
विनम्र तेजी से पहले सिक्योरिटी गार्ड पर झपटा और उसके पेट पर पंच मारा, फिर वह दूसरे सिक्योरिटी गार्ड की तरफ गया और उसकी गर्दन पर वार किया इसके बाद तीसरे सिक्योरिटी गार्ड के जांघ पर और चौथे सिक्योरिटी गार्ड की चेस्ट पर। फिर वह पलट कर वापिस पहले गार्ड पर आया और उसकी गर्दन पर वार किया, फिर दूसरे सिक्योरिटी गार्ड की जांघ पर, तीसरे सिक्योरिटी गार्ड की चेस्ट पर और चौथे सिक्योरिटी गार्ड के पेट पर। ऐसा उसने चार से पांच बार दोहराया जिसके बाद चारों सिक्योरिटी गार्ड वही चीत पड़ गए।
निधि दोनों सिक्योरिटी गार्डों से एक पाइप के जरिए लड़ रही थी, उसने वह पाइप पहले सिक्योरिटी गार्ड की जांघ पर मारी और दूसरे सिक्योरिटी गार्ड के गर्दन पर, फिर वापस इसे दोहराते हुए पाइप पहले सिक्योरिटी गार्ड की गर्दन पर मारी और फिर दूसरी सिक्योरिटी गार्ड की जांघ पर। उसके हमलों में काफी तेजी थी। जल्द ही उनका काम तमाम करने के बाद निधि भी चौथे फ्लोर की ओर जा रही थी।
चौथे फ्लोर पर युसूफ अकेला था प्रधानमंत्री के साथ। जैसे ही विनम्र वहां पहुंचा वह तेजी से प्रधानमंत्री के पास गया और अपना रिवाल्वर उनके सर पर तान दिया। " देखो अगर पास आने की कोशिश की तो मैं प्रधानमंत्री को मार दूंगा" उसने विनम्र को धमकी देने वाले अंदाज में कहा। विनम्र यह सुनकर रुक गया। इतने में निधी भी वहां आ गई। दोनों प्रधानमंत्री की जान पर बनता देख किसी भी तरह का वार नहीं कर रहे थे। युसुफ बोला "भले ही खेल मेरे हाथ से निकल चुका है, लेकिन मैं इसे तुम दोनों के हाथ नहीं लगने दूंगा। प्रधानमंत्री को खत्म कर मैं पूरा पासा ही पलट दूंगा। इनके मरने के बाद आवाम में विद्रोह मच जाएगा और वह जंग की मांग करने लगेंगे" इतना कहकर वह शैतानी हंसी हंसने लगा। "जगं तो होकर रहेगी ही.... इसे कोई नहीं रोक सकता"
निधि ने देखा कि युसुफ का ध्यान उसकी तरफ न होकर विनम्र की तरफ था। वह जो भी कह रहा था सिर्फ उसे कह रहा था। निधि ने चुपके से अपने कमर के पीछे वाले हिस्से में हाथ डाला और वहां से एक छोटा नुकीला खंजर हाथ में पकड़ लिया, फिर उसे हवा में फेंक कर सीधे युसुफ के सर के बीचो बीच मार दिया। खंजर माथे के बीच वाले हिस्से पर जा लगा और वकार अहमद पीछे की और लड़खड़ाते हुए सीधे कांच का शीशा तोड़कर नीचे गिर गया।
"मुझे धमकीं पसंद नहीं" यूसुफ को खिड़की से नीचे गिराने के बाद निधि बोली। यह सुनकर विनम्र निधि को देखने लगा। काफी देर तक देखने के बाद वह मुस्कुरा दिया।
दोनों ने फिर ज्यादा देरी ना करते हुए प्रधानमंत्री को खोलो और उन्हें रसिया के बंधन से आजाद किया।
"इंशा अल्लाह.... तुम लोगों का शुक्रिया अदा मैं जिंदगी भर नहीं कर सकता.... मैं नहीं जानता मैं तुम लोगों का एहसान कैसे चुकाऊंगा"प्रधानमंत्री ने निधि और विनम्र दोनों को बोला,
"ऐसा कहकर आप हमें लज्जित ना करें" निधि बोली
फिर विनम्र बोला "आपकी जान बचाना हमारा फर्ज था"
प्रधानमंत्री ने वायरलेस निकाला और अपने सिक्योरिटी सिस्टम से कांटेक्ट किया। जल्द ही वहां पुलिस आ गई और उन्होंने वकार अहमद को पकड़ लिया। वह अभी भी जिंदा था। बाकी के सारे हालात अब उनके कंट्रोल मे थें।
इस पूरे मसले में हालात कई बार बिगड़े और कई बार सुलझे। निधि ने प्रधानमंत्री के 2 खास लोगों को मार दिया पर लुइस इल्लल्लाह की जान बचाने के कारण उसे माफ कर दिया गया। निधि के इरादे प्रधानमंत्री को मारने के थे पर विनम्र और उसके काम को देखते हुए निधि ने हालातों को धैर्य का परिचय देते हुए बातों से सुलझाया। जंग में किसी का फायदा नहीं, यह बात प्रधानमंत्री लुइस इल्लल्लाह की समझ में आ गई। वकार अहमद को गद्दारी करने के कारण उस पर आंतकवाद का मामला डालकर उसे फांसी की सजा दे दी गई। साइंटिस्ट भाग चुका था जिसका बाद में कोई अता पता नहीं चला।
प्रधानमंत्री ने उसी रात 12:00 बजे अपने जनता को संबोधित करते हुए एक नया भाषण दिया।
"मेरे प्यारे भाइयों और बहनों!! मुझे अति खुशी हो रही है कि मैं इस वक्त....आप लोगों को एक सुखद समाचार देने के लिए यहां उपस्थित हूं। जंग में कभी किसी का फायदा नहीं हुआ....। इसमें सिर्फ और सिर्फ 2 देशों की आवाम और जान मान की ही हानी हुई है। पता नहीं कितने हजारों लाखों बेगुनाह और निर्दोष लोग मारे जाते हैं। जंग तो दो सरकारों और दो देशों की होती है जबकि उनका शिकार उनकी आवाम होती है। जंग करके ना ही तो सिकंदर को कुछ मिला और ना ही हिटलर को.....इसलिए मैं घोषणा करता हूं कि सीरिया देश आज से जगं की राह पर नहीं बढ़ेगा.... वह शांति और प्यार की सद्भावना से आपसी देशों से संबंध बनाएगा और पूरे विश्व में अमन कायम करेगा। इसके अलावा सीरिया देश में लोकतंत्र दोबारा लागू होगा.... जल्दी एक सुनियोजित समय देखकर सीरिया में इलेक्शन करवाए जाएंगे और अब आप की सहमति से नया नेता चुना जाएगा। इंशा अल्लाह..... हम पर कृपा बनाए रखें"
प्रधानमंत्री का यह भाषण सुनकर वहां की पूरी जनता में एक नई भावना जाग गई। वह जिस तानाशाही शासक को अपने लिए अभिशाप मानती थी वह उनके गुणगान करने लगी। शायद इसीलिए लुइस इल्लल्लाह को इस पूरे घटनाक्रम में किसी तरह का नुकसान नहीं हुआ और उसन शांति और अमन का रास्ता चुना।
ठीक 2 दिन बाद।
निधि और विनम्र दोनों सीरिया की राजधानी के एयरपोर्ट पर खड़े थे। उनके साथ प्रधानमंत्री लुइस इल्लल्लाह और उनका सिक्योरिटी सिस्टम भी था। वह लोग निधि को इंडिया के लिए विदा करने आए थे।
सभी लोगों से कुछ दूर निधि और विनम्र अकेले खड़े थे। निधि के हाथ में एक जैकेट थी जो उसने अपनी नीली टी-शर्ट के ऊपर पहन रखी थी।"दुनिया में हमेशा अजीब चीजें होती रहती है, जरूरी नहीं सब बुरे के लिए हो" निधि ने यह बात विनम्र को कही।
"लेकिन एक बार जब हालात बदल जाते हैं तो वह वापस सही नहीं होती" विनम्र ने जवाब दिया।
"तुम आखिर मानते क्यों नहीं" निधि बोली "तुम वापस इंडिया क्यों नहीं चलते..."
"नहीं जा सकता!!" विनम्र मुस्कुरा कर बोला। "अब यही मेरी दुनिया है"
निधि ने एक लंबी सांस बाहर छोड़ी और मुस्कुरा कर कहा "मैं तुम्हें नहीं समझा सकती... यह तुम्हारा फैसला है... पर अगर तुम आओगे तो वहां कोई भी तुम्हें नजरअंदाज नहीं करेगा" फिर उसने एक और लंबी सांस ली और विनम्र को चूम लिया।
पीछे प्रधानमंत्री के साथ साथ सब लोग इस दृश्य को देख रहे थे। निधि ने विनम्र को चुम्मा और अपनी जैकेट कंधे पर टांग कर जहाज की तरफ जाने लगी। पीछे से प्रधानमंत्री विनम्र के पास आया और उसके कंधे पर हाथ रखा "शायद वह तुम्हें चाहती है....."
"हां जानता हूं" विनम्र एक दोहरी मुस्कान के साथ निधि को जाता हुआ देख रहा था।"लेकिन वह चाहती है कि मैं उसके साथ वापिस इंडिया चलूं"
"बरखुरदर!!!" प्रधानमंत्री ने उसकी तरफ अजीब सी नजरे बनाई "तो तुम जाते क्यों नहीं... वह तुम्हारा अपना देश है"
विनम्र ने हैरानी से लुईस की तरफ देखा "अगर मैं चला गया हूं यहां आप की हिफाजत कौन करेगा"
प्रधानमंत्री अपने आसपास देखने लगे "तुम्हें क्या लगता है यह सिक्योरिटी सिस्टम यहां सिर्फ मुगफली बेचने के लिए है" उन्होंने विनम्र के साथ एक हल्का सा मजाक किया। "तुम अपने देश जा सकते हो.... मेरी तरफ से तुम्हें कोई रोक-टोक नहीं"
विनम्र ने एक गहरी सांस ली और गर्दन ना के अंदाज में हिलाते हुए कहा "शायद नहीं!! अब बहुत देर हो चुकी है" और फिर अपने कदम खींच कर अपनी जीप की तरफ जाने लगा।
प्रधानमंत्री बोले "बेटा!! अभी तक तो देरी हुई नहीं है.... पर अगर अभी भी नहीं संभले तो जरूर देरी हो जाएगी। वह अच्छी लड़की है......"
विनम्र के जीप की तरफ जाते कदम रुक गए "आप मुझे दुविधा में डाल रहे हैं" उसने मुड़कर प्रधानमंत्री को कहा।
"मैं तुम्हें दुविधा में नहीं डाल रहा.... बल्कि दुविधा से निकाल रहा हूं" प्रधानमंत्री उसके करीब आए और विनम्र की आंखों में आंखें डालकर कहां " अक्सर इंसान तभी दुविधा में होता है जब वह फैसला नहीं कर पाता.... तुम फैसला करो...." फिर वापस निधि की तरफ देखने लगे "उसके और तुम्हारे बीच सिर्फ 15 मीटर की दूरी है... यह 15 मीटर तुम्हारे आने वाली जिंदगी डिसाइड करेंगे। अगर तुम आज उसे अकेले जाने देते हो तो शायद आने वाले समय में तुम्हारी लाइफ ऐसे ही चलती रहेगी जैसे चलती आ रही है..... पर अगर तुम उसका साथ देते हो तो तुम्हारे साथ साथ उसकी लाइफ भी बदल जाएगी....!!" फिर उन्होंने भी अपने कदम पीछे खींचे और वहां से जाकर गाड़ी में बैठते हुए बोले "तुम सिर्फ फैसला करो" और गाड़ी में बैठकर वहां से निकल गए
उस पूरे क्षेत्र में अब विनम्र अकेला बचा था। उसके सामने जहाज था जो निधि को लेकर इंडिया जाएगा वह भी सिर्फ और सिर्फ 15 मीटर की दूरी पर। विनम्र ने एक गहरी... अत्यंत ही गहरी सांस ली और अपनी आंखें बंद की। वह समंदर की गहराइयों को महसूस करते हुए उसमें डुब रहा था..... जिसके एक छोर पर उसकी वर्तमान जिंदगी थी और एक छोर पर निधि। निधि अपना हाथ देकर उसे सहारा देने की कोशिश कर रही थी जबकि उसकी वर्तमान जिंदगी में कोई भी नहीं था जो उसे डूबने से बचाने के लिए अपना हाथ आगे करें। विनम्र ने अपनी आंखें खोली और अतत: उस 15 मीटर की दूरी पर चलने का निर्णय ले लिया। जब निधि ने जहाज पर चढ़कर पीछे मुड़कर देखा..... दृश्य बदल चुका था...... विनम्र भी उसी और आ रहा था।
HAPPY ENDING
इंडिया में।
एकेडमी का ऑफिस।
ऑफिस में कैप्टन रोड जो कि निधि के अंकल से, उसके सामने निधि और विनम्र दोनों खड़े थे।
कैप्टन रोड उन दोनों से बोले"मुझे खबर मिल गई थी की इराक के प्रधानमंत्री ने हमारे साथ धोखा किया है। यह सूचना सरकार को भेज दी है। जल्दी वह इस पर कार्यवाही करेंगे। एजैंसी के साथ धोखा करने वाले लोग पकड़े जा चुके हैं, और उन्हें सजा भी मिल गई। तुमने अच्छा काम किया है'निधि " वह आगे आए और उन्होंने निधि के कंधे पर हाथ रखा "आई एम प्राउड ऑन यू"
फिर वह विनम्र की तरफ मुड़े "तुम्हारी काबिलियत, काफी बेहतर है। मैं उम्मीद करता हूं आने वाले समय में तुम हमारा साथ नहीं छोड़ोगे। किसी भी तरह की ऐसी कोई गलती नहीं करोगे जिसे हमें इस बात पर पछतावा हो कि मैं तुम्हें एजेंसी में दोबारा जगह दे रहा हूं। तुमने एजैंसी के साथ की जो किया वह माफ करने लायक नहीं.... तुमने हमारी दो बेशकीमती एजेंट को खत्म किया है.... इसलिए तुम पर कार्यवाही तो होगी, पर सख्ती नहीं बरती जाएगी। एकेडमी के नियमों के तहत तुम्हें 3 साल की नजरबंद रहने की सजा दी जाती हैं। तुम अगले 3 साल तक एकेडमी के एजेंट तो रहोगे पर उसका कोई भी काम तुम्हें नहीं मिलेगा। 3 साल तक तुम गोवा के जंगल में रहकर वहां की साफ-सफाई का काम करोगे। जब तुम्हारी सजा खत्म हो जाएगी तब तुम्हारा शानदार स्वागत इस एकेडमी में किया जाएगा"
आज की मीटिंग यहीं खत्म होती है। कैप्टन रोड वहां से निकल गए। विनम्र निधि को घूरने लगा "यह है तुम्हारा इंडिया"
निधि मुस्कुराई "शुक्र मनाओ जेल में नहीं डाला.... वैसे भी 3 साल तो है.... आंख बंद करते ही निकल जाएंगे"
"अच्छा बेटा.... मुझसे उशियारी..... मैं भी देखता हूं ऐसा कौन सा जंगल है जो मुझे बाधं कर रखता है" उसने कहा और निधि के पीछे भाग पड़ा। निधि भी वहां से आगे की तरफ भाग पड़ी।
*******THE FINAL HAPPY ENDING******
