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A R Sahil

Others

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A R Sahil

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नेम प्लेट

नेम प्लेट

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बेंगलुरु के एक आलीशान कैफे में कबीर बैठा था। टेबल पर उसकी पसंदीदा ब्लैक कॉफी ठंडी हो रही थी। उसके सामने एक सफेद रंग का लिफाफा रखा था: उसका टर्मिनेशन लेटर।

पिछले दस सालों से कबीर का दिन सुबह छह बजे शुरू होता था और रात के बारह बजे एक कॉर्पोरेट फोन की स्क्रीन पर खत्म होता था। वह उस नामी टेक कंपनी का वाइस प्रेसिडेंट था। लोग उसके केबिन के बाहर खड़े होने के लिए अपॉइंटमेंट लेते थे। उसकी पहचान उसकी तीन चीज़ें थीं: उसका भारी-भरकम पद, उसकी मर्सिडीज कार, और उसका पांच बेडरूम का फ्लैट।

लेकिन आज, सिर्फ एक पैराग्राफ के ईमेल ने वह सब छीन लिया था। कंपनी में मंदी आई, रीस्ट्रक्चरिंग हुई, और कबीर को ‘कॉस्ट कटिंग’ के नाम पर बाहर कर दिया गया।

कबीर ने कैफे के शीशे से बाहर सड़क पर चलती भीड़ को देखा। अचानक उसे एक अजीब सा डर लगा। उसने अपने हाथ देखे, जो कांप रहे थे। उसने खुद से पूछा, “अगर मैं वाइस प्रेसिडेंट नहीं हूँ… तो मैं कौन हूँ?”

शाम को वह अपने घर लौटा। उसने दरवाजे पर लगी चमचमाती नेमप्लेट को देखा, जिस पर लिखा था: “कबीर थापर, वी.पी. – टेककॉर्प”। उसने जेब से चाबी निकाली, लेकिन रुक गया। उसे लगा कि वह इस घर का हकदार ही नहीं है। यह घर तो उस वी.पी. का था, जो अब अस्तित्व में ही नहीं था। सालों से उसने अपनी पसंद, अपने शौक, यहाँ तक कि अपनी मुस्कान को भी उस कॉर्पोरेट मुखौटे के पीछे छुपा दिया था।

चौथे दिन, उसकी माँ का फोन आया। कबीर ने भारी आवाज़ में कहा, “माँ, मेरी नौकरी चली गई। मैं अब कुछ भी नहीं हूँ।”
माँ ने दूसरी तरफ से हँसते हुए कहा, “पागल है क्या कबीरू? नौकरी गई है, तू तो वहीं है। बचपन में जब तू बिना चप्पल के बारिश में दौड़ता था, तब भी तू कबीर था। जब तू कॉलेज में गिटार बजाता था, तब भी तू कबीर था। घर आ जा कुछ दिन।”

‘कबीरू’… यह नाम उसने सालों से नहीं सुना था। अगले ही हफ्ते कबीर ने अपना सामान बांधा और अपने होमटाउन, देहरादून के लिए निकल पड़ा।

देहरादून की हवा में बेंगलुरु जैसी हड़बड़ी नहीं थी। शुरुआती कुछ दिन कबीर के लिए बेचैनी भरे थे। सुबह उठकर बिना किसी ईमेल या मीटिंग के वक्त काटना उसे पहाड़ जैसा लगता था। एक दोपहर, घर के पुराने स्टोर रूम की सफ़ाई करते हुए उसकी नज़र धूल से सने एक काले सूटकेस पर पड़ी। उसने उसे खोला, अंदर उसका पुराना गिटार था, जिसका एक तार टूटा हुआ था।

कबीर की उंगलियों ने अनजाने में ही लकड़ी के उस टुकड़े को छुआ। उसने नया तार खरीदा, गिटार ट्यून किया और बरसों बाद उसकी उंगलियों ने एक धुन छेड़ी। वह धुन कॉर्पोरेट टारगेट्स की नहीं, बल्कि उसके कॉलेज के दिनों की आज़ादी की थी। गिटार की हर गूंज के साथ, कबीर के भीतर जमी कॉर्पोरेट धूल साफ होने लगी। उसे अहसास हुआ कि खुशी बाहर के रुतबे में नहीं, बल्कि इस सुकून में थी।

कबीर ने एक बड़ा फैसला लिया। उसने बेंगलुरु का वह फ्लैट बेच दिया जिसने उसकी रातों की नींद छीन ली थी। देहरादून के पहाड़ों के बीच, उसने एक छोटा सा, खूबसूरत ‘म्यूजिक कैफे’ खोला, जहाँ शाम को हल्की कॉफी की खुशबू के साथ गिटार की धुनें तैरती थीं।

कैफे के लकड़ी के मुख्य दरवाज़े पर अब एक नई, सादी सी नेमप्लेट लटकी थी। उस पर कोई पद नहीं लिखा था, कोई बड़ी कंपनी का नाम नहीं था। उस पर बस नक्काशी से लिखा था: “कबीर”।

कबीर ने मुस्कुराकर उस नेमप्लेट को देखा। आज वह किसी कंपनी का वाइस प्रेसिडेंट नहीं था, लेकिन वह पहली बार खुद के बेहद करीब था।


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