Sheetal Raghuvanshi

Others


4.5  

Sheetal Raghuvanshi

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मेरी सासु माँ को जीने दो!

मेरी सासु माँ को जीने दो!

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यह कहानी श्रीवास्तव अंकल जी मतलब हमारे पड़ौसी के परिवार की है ।वे सबकी मदद करते थे, बड़े ही भले इंसान थे और उनसे हमारे पारिवारिक सम्बन्ध थे।उनके तीनो बेटे दूसरे शहरों में नौकरी करते थे ।तीनों ब्याहता बेटियों में से मंझली और छोटी यही मुज्जफरपुर में रहती है ।कुछ 2-3 दिनों से बीमार थे,तो सिंधुजी मतलब उनकी पत्नी ने बेटों को खबर करदी थी , बड़ा बेटा विनय और उसकी पत्नी सिया तुरन्त फ्लाइट पकड़ कर अपने बच्चों के साथ आगए थे और उनकी सेवा में लगे थे ।


मंझले और छोटे ने कहा अभी तो भैय्या आगये है , हम लोग एक दो दिन में छुट्टी लेकर पहुँच जाएंगे ....बड़ी बहू सिया यथा नाम तथा गुण!बहुत ही शांत और हँसमुख स्वभाव की थी ,किन्तु उसी को हमेशा सास व ननद के ताने सुनने पड़ते थे, क्योंकि वो बिना दहेज़ के इस घर मे आयी थी, मंझली और छोटी ठप्पे से रहती थी , भारी दहेज़ जो लाई थी,इसलिये उन्हें कोई कुछ नही क़हता था।सिया वैसे तो वह नौकरी करती थी, लेकिन मौके बे मौके जैसे ही कोई काम पड़ता, पर्व ,त्योहार या सास ससुर बीमार होते तो उसी को बुलाया जाता था,इसका कारण यह था कि वह मन लगाकर से सेवा करती और कभी पलट कर सास को जवाब नही देती थी।


विनय ने कह रखा था ," सिया अगर कोई शिकायत हो मुझसे कहना माँ ,पिताजी या परिवार में किसी को उल्टा जीवब मत देना न ही किसी का दिल दुखाना।"इसलिये सिया कभी भी शिकायत नही करती थी कि और भी दो बहुएँ है उन्हें क्यों नही बुलाते बल्कि जैसे-तैसे दफ्तर से छुट्टी लेकर पहुंच जाती थी।पिछले 8 बरस से यही सिलसिला चल रहा था .....इस ही कारण अब सिंधु जी का मन उसकी तरफ से साफ होगया था और वे उससे सुख-दुख साँझा कर लेती थी और प्रेम से बात करती थी।किन्तु जब कभी परीवार इकट्ठा होता और विशेषकर बेटियाँ आजाती तो वही पुरानी खूंखार सास बन जाती थी।


बरहाल, श्रीवास्तव जी अस्पताल में भर्ती थे रात को अचानक तबियत बिगड़ गई और डॉक्टर्स ने बताया कि वे अब इस दुनिया मे नही रहे.....विनय फोन करके दोस्तों और रिश्तेदारों को ख़बर दे रहा था , सिया अपनी सास के पास ही बैठी सांत्वना दी रही थी, बड़ी बेटी दूसरे शहर में थी वह आगयी थी कुछ घण्टों बाद मझली और छोटी भी पहुँच गई , मंझले और छोटे बेटे बहु भी आगये थे ।कहने को तो श्रीवास्तव अंकल अपने पीछे एक भरापूरा परिवार छोड़ गए थे, लेकिन सिंधु आंटी अपने आप को नितांत अकेला और असहाय महसूस कर रही थी ....अभी रिश्तों की असलियत और समाज की सच्चाई से उनका सामना होना बाकी था।


पंडित जी आचुके थे अंतिम यात्रा की सारी तैय्यारियाँ पूर्ण होगई थी और सिंधु जी अपने पति की पार्थिव देह के पास बैठी हुई करुण विलाप कर रही थी...

सिया के आँसू रुकने का नाम नही ले रहे थे, वो अपनी सास के पास बैठी रो रही थी, सिंधु जी की बड़ी बेटी दहाड़े मारकर रो रही थी... मझली बेटी,छोटी बेटी और मझली बहु...औपचारिकता करते हुए नज़र आई।छोटी बहू जो 2 महीने पेट से, वो एक तरफ सोफे पर निर्विकार रूप से बैठी हुई थी, उसकी आंख में एक आंसू भी नही था....उसके हाव-भाव से लग रहा था कि वह ,इंतज़ार कर रही है कि कब ये सब रस्मे खत्म हो और वह अपने मायके जाए ....पार्थिव देह को श्मशान ले जाया चुका था, अब बारी थी घर को साफ करने और ऐसे मौके पर किये जाने वाले रीति रिवाज़ों की ।


सिया की मौसी सास के निर्देश पर सिया सभी काम कर रही थी ।सिंधु जी का सिंदूर पोंछा गया , अब नावन ( नाई की पत्नी ) ने सिंधु जी को नहलाया गया , नावन ने कहा जाईये अब साड़ी पहन लीजिये, सिया ने अलमारी से एक साड़ी निकाल कर सास को देदी,तब तक उनकी बड़ी बेटी आगयी और बोली भाबी ये क्या ??ये तो कत्थई रंग है!कोई सफेद या हल्के रंग की साड़ी दो(वेसे सच तो यह है कि सफेद साड़ी तो बिरले ही, कोई ब्याहता रखती होगी अपनी अलमारी में )

लोग क्या कहेंगे ?पापा को गए अभी एक दिन भी नही हुआ और मम्मी रंग बिरंगे कपड़े पहन रही है.....??


सिया को बहुत गुस्सा आया मन किया कि कह दे कि"यहाँ कोई फ़िल्म की शूटिंग नही चल रही है , जो सफेद, कड़क कलफ लगी साड़ी पहनकर रोने की पूर्व तैय्यारी है"पर कुछ बोली नही एक हल्के रंग की साड़ी सास को पहना दी।अब छोटी ननद उसके पास आई और बोली भाबी अपने सलवार सूट देदो,मैं कपड़े नही लायी , नहाकर घर जाना है...

वो धीरे से बोली क्यों .??....


तब ननद ने जवाब दिया " आप सब लोग तो हो यहाँ , मैं अब तीसरे के दिन आजाऊँगी , वैसे भी अभी यहाँ मेरा कोई काम तो है नही"


इतने में बड़ी ननद आकर बोली ठीक है माही (बड़ी ननद की 17 साल की बेटी) को भी लेती जाना आराम कर लेगी वहाँ।


सिया हैरान थी कि, अभी पिता को गुज़रे हुए एक दिन भी नही हुआ और बेटियां कैसी बातें कर रही है ......दोपहर तक मंझली बेटी भी चली गई।शाम होते-होते छोटी बहू की माँ ने सिया की सास को बतायाकि मैं अपनी बेटी को ले जारही हूँ ,यहाँ गमी के माहौल में बच्चे पर बुरा असर पड़ेगा। ब्रह्म भोज के दिन इसे लेकर आजाऊँगी....बेचारी सिंधु जी क्या कहती....उन्हें तो अपना ही होंश नहीं था।विनय ने पिता को दाग दिया था इसलिये 13 दिन तक पिता के कमरे में ही रहना था और सारे कर्मकांड करने थे।


रोज़ जो मृतक के लिए पिंड देने को भोजन बनना था वह रिवाज़ के अनुसार चूल्हें पर बनाना होता है, सिया ने अपनी ज़िंदगी मे कभी चूल्हा देखा भी नही था, लेकिन आजकल रोज उसी पर जैसे तैसे खाना बना रही थी , क्योंकि रिवाज़ है ।दोनो पति पत्नी तन ,मन , धन से सारे रस्म रिवाज़ कर रहे थे सिंधु जी सब देख रही थी कि विनय और सिया कितने जतन से सब काम कर रहे हैं.....मंझली बहु अपनी मौसी सास, बड़ी ननद और नानी सास के साथ सिंधु जी के बगल में बैठी रहती और सिया काम मे लगा रहती उसके सर पर तो जैसे पूरे घर की जिम्मेदारी आगयी थी।

पता नही कैसे वह रोज़ 20 -25 लोगो का बिना तड़के, तेल मसाले का सदा खाना चाय-पानी सब अकेले कर लेती थी, उसे भी खुद पर आश्चर्य होता था।

लेकिन उसे दुख इस बात का था कि इस व्यस्तता में उसे अपनी सास के पास बैठकर उन्हे सांत्वना देने या उनके आँसू पोछने का समय नही मिल पाता था ....सिंधु जी नहाकर बैठी हुई थी , बिखरे बाल, उजड़ा भाल लिए.....सिया कमरे में किसी काम से आई तो ठिठक कर उसके पाँव रुक गए ....

अपनी सास को इस रूप में देखकर उसका हृदय द्रवित होगया।सिंधु जी 60 की थी किन्तु 55 से ज्यादा नही लगती थी, सिया ने उन्हें बिना श्रृंगार किये कभी नहीं देखा था , वे हमेशा चटक रंगों की कलफ लगी, प्रेस की हुई साड़ी पहनती थी , लेकिन आज दीन-हीन सी जान पड़ रही थी.....


वह झट से तेल की शीशी ले आयी सास के बालों में तेल डालकर उनकी चोटी करदी ।नानी सास पलँग पर बैठी यह देख रही थी.... लेकिन कुछ बोली नही....लेकिन ये क्या बड़ी ननद आते ही उस पर बरस पड़ी भाबी मम्मी की चोटी क्यों करदी ?तेरह दिन तक साबुन नही लगाते है और न ही कंघी करते है, पलँग पर सोते भी नही है, यही रिवाज़ है.....तो सिया ने जवाब दिया दीदी अब तो 10 दिन होगए हैं, मम्मी के बाल उलझ गए थे इसलिये .....

नानी सास बीच मे बोली कोई बात नही ,आजकल कोई नही मानता ये सब.....


तो ननद बोली "लोग क्या कहेंगे नानी ??


मम्मी को कम से कम सवा महीने तक तो समाज के नियम कायदे मानना ही चाहिए"...


भाभी को तो अक्ल नही है ,मम्मी तू काहे न बतवाएले की के ई सब न करल जाहि........सिया पढ़ी-लिखी ननद के मुँह से ऐसी बाते सुनकर दंग थी...वह गुस्से में चुपचाप कमरे से बाहर चली गई।


आज 10 वें की रस्म थी , ना ही दोनो बेटियों की कोई खबर थी और न ही छोटी बहू की ।सिया की नानी सास ने कहा सबको फोन लगाकर बुलालों आज कच्ची रसोई होगी, सबको दामाद जी के नाम का कौर डालना है ....उसने फोन लगाया तो छोटी ननद बोली भाभी बच्चे स्कूल गए है वो अजाएँगे तब देखूँगी, लेकिन वह नही आई।मंझली ने फोन नही उठाया...

छोटी देवरानी की मां ने कहा कि "इसकी तबियत ठीक नही है , आज नही आसकेगी, इसकी तरफ से आप ही ससुरजी के नाम का कौर निकाल देना"

खैर दसवें की रस्म होगई ....अब तेरहवीं यानी ब्रह्म भोज का दिन आया , शास्त्रोनुसार गौ दान करवाया गया और नाना प्रकार के व्यंजन बने ब्राह्मणों के लिए।सभी रिश्तेदार, सगे सम्बन्धी आये हुए थे आज दोनो बेटियां और छोटी बहू भी थी तीनों बार-बार रोने का उपक्रम कर रही थी ।


मझली बहु और सुमति कैसे पीछे रहती वे भी दहाड़े मारकर रोने लगती ....सिया शांत भाव से चुपचाप काम मे लगी हुई थी उसे अभी रोने की फुर्सत नही थी....लेकिन सिंधुजी जड़वत बैठी पति की तेरहवीं की सारी रस्मे निभा रही थी और बेटियों और बहुओं के क्रिया कलाप भी उनकी नजर से छिपे नही थे।

अंत मे पगड़ी कि रस्म हुई, अब श्रीवास्तव जी की पगड़ी विनय के सर पर बांधी गई, अचानक उसे पिता की जिम्मेदारियों का एहसास हो चला और आंखों से अश्रु धारा निकल पड़ी.....


शाम को लगभग सभी रिसश्तेदार खा-पीकर घर लौट गए थे।मंझली और छोटी ननद भी जारही थी , फिर भंडारे में आकर सिया से बोली "भाभी गुलाबजामुन और मिठाई बची हो तो पैक करदों"सिया ने सबको स्टील के डब्बों में भरकर लड्डू , गुलाबजामुन दे दिया।छोटी देवरानी दोपहर में ही अपनी माँ के साथ वापस चली गयी थी।सब के जाने के बाद सिंधु जी विचारों में खोई थी...अंदर ही अंदर घुट रहीं थी..

सोच रही थी छोटी बहू को आये तो अभी एक साल ही हुआ है...लेकिन मेरी अपनी बेटीयाँ.......उन्हें भी मेरी कोई परवाह नहीं....हमने तो कभी बेटा-बेटी में फर्क नही किया , सबको पढ़ाया लिखाया , इतना दान दहेज़ देकर शादी की।सबकी डिलीवरी में सेवा की, छोटी की जुड़वा बेटियां हुई तो कैसे संभालेगी दोनो को एक साथ यही सोचकर 3 साल तक यही घर पर रखकर सेवा की ....इनके पिता जी भी बेटियों और नाती-नातिन को पर्व त्योहरा पर कितना शगुन देते थे, मुसीबत में रुपये पैसे से तीनों दामादों की हमेशा मदद की .....आख़िर कहाँ कमी रह गईं जो आज उनके जाते ही मेरी बेटियों ने मुझे पराया कर दिया .....माँ के प्रति इतनी संवेदन हीनता.......बड़ी बेटी को उन्होंने खुद मझली बहु से कहते सुना था कि "भाभी मम्मी के कपड़े- साड़ी सवा महीने तक तुम लोग मत धोना ,अपशगुन होता है"....


एक तो पति के जाने का दुख उस पर बेटियों का बदला व्यहवार , सिंधु जी अपनी बेटियों के व्यहवार से टूट चुकी थी.....सोच-सोच कर उनकी आंखों से आंसू बारबार उनके गालों पर लुढ़क जाते हैं...वे अपने आप को बहुत ही अकेला अनुभव कर रहीं थी....आज उनकी माँ और बहन भी सिया को सास का ध्यान रखने का बोलकर चली गयी थी।कल बड़ी बेटी भी लौट जाएगी .....

शाम को बड़ी बेटी सुमति सिंधु जिनके पास आकर बोली "मम्मी तेरी अलमारी की चाबी देना जरा" , उन्होंने चुपचाप चाबी देदी।


सिया अभी उनके कमरे की सफाई कर रही थी, तभी सुमति ने माँ की अलमारी खोली और छाँट कर सारी नई साड़ियाँ जो अब तक पहनी नही गई थीं निकाल ली, सिया ने पूछा क्या कर रही है दीदी .....?


कुछ नही सिया " मम्मी क्या करेगी अब इन साड़ियों का ,वैसे भी साल भर तो अब कहीं जाना नही है माँ को "


लेकिन दीदी...


"ये वाली साड़ी तों पिछले महीने मम्मी जी ने अपनी पसंद से मेरे साथ जाकर कितने चाव से खरीदी थी ....

..इसे रहने दीजिए, अभी नही तो थोड़े दिन बाद पहन लेंगी"


सुमति बोली "भाभी तुम्हे कोई साड़ी पसन्द है, तो तुम भी लेलो अब वैसे भी अब मम्मी को इतनी भारी साड़ियाँ नही पहनना चाहिए....

और हाँ , कल मैने सबके सामने कुछ नही कहा,लेकिन आप सवा महीने तक माँ को बिना नमक का ही खाना देना" ...यही रिवाज़ चलता है यहाँ , "मेरे ससुर जी शांत हुए थे तो मेरी सास ने सारे नियम फॉलो किये थे"...


तभी सिया की मझली देवरानी आगयी ,बोली दीदी कल मम्मी कितनी तेज़ आवाज में भैय्या को बुला रही थी , आप उनको समझाओ कि,थोड़ा धीरे बोला करें अच्छा नही लगता ,लोग बातें बनाएँगे".......


सुमति बोली " हाँ ! मैं समझाऊंगी माँ को ।ये सब अच्छा नही लगता , लोग क्या कहेंगे कि श्रीवास्तव जी की पत्नी और परिवार को उनकी मौत का कोई दु:ख ही नही है...."


सिया शुरू दिन से ही देख रही थी ये सब नाटक , उसके सब्र का बांध टूट गया अब उस से रहा नही गया , तो वह बोल पड़ी.....दीदी भगवान न करे यदि पापाजी की जगह मम्मी जी को कुछ होजाता तो क्या वो भी यह नियम कायदे करते.....

सिया तुम पगला गई हो क्या ?समाज आदमियों को ये सब करने को नही कहता...दीदी मम्मी के कपड़े छूने से छूत लगती है , उनकी नई साड़ियों में छूत नही लगेगी आपको ....

सब लोग अच्छा खाना खाएंगे, मम्मी जी सब्जी में नमक भी नही खा सकती , कैसे खाएंगी बिना नमक का रूखा सूखा भोजससुरजी आप सबके भी तो पिता थे, तो फिर सब नियम कानून सासुजी पर ही क्यों लागू होकिन लोगो की बात कर रही है आप लोगऔर क्यों...?"


दीदी पापाजी की उम्र 75 बरस थी , वो अपने सारे फ़र्ज़ निभा कर , अपना जीवन आपने मुताबिक जीकर गए है इस दुनिया से.....अरे ! हम तो बहुएँ है, लेकिन आप तो "बेटी होकर भी मम्मी जी के दुःख दर्द में उन्हे सांत्वना देने की बजाए क्या करों, क्या न करो की सलाह दे रही है"....आपको अपनी माँ से ज्यादा दुनियां और रीति रिवाज़ों पड़ी है"आप कब से लोग क्या कहेंगे सोचने लगीं"लोग तो बाद में कहेंगे, आप तो अभी ही अपनी बातों से मम्मी जी का कलेजा छलनी कर दोगी.....दीदी मैं आपसे कहे देती हूँ ,भगवान के लिए ....आप ऐसी कोई भी फ़िज़ूल बात मम्मी जी से मत कहना!

ये भूलिए मत की "ससुर जी दुनिया से गये है" ...."सासू माँ अभी जिंदा है "....भगवान के लिए उन्हें चैन से जीने दीजिये"...उन्हें उनके हाल पर छोड़ दीजिए .....कहते-कहते उसका गला रुंध गया ...".


आंखों से आँसू बहने लगे ....इधर किसी काम से आई सिंधु जी के पांव दरवाजे पर ही ठहर गए....उन्होंने सारा वार्तालाप सुन लिया था शायद....

इसीलिए उनका माथा चकरा गया, लड़खड़ाते हुए वही दरवाज़े के सहारे बैठ गयी , सुमति झट से माँ के पास आकर कुछ कहने लगी .....

उसने क्या कहा वे नही सुन पाई.....उनका मस्तिष्क सुन्न पड़ गया, हाथ पैर ठंडे पड़ रहे थे....पूरा शरीर पसीने से तर-बतर होगया था, सिया घबराकर विनय और अपने देवर को बुलाई ।


विनय दौड़कर बी पी मशीन लेकर आया ....BP 160 था, तुरन्त टेबलेट दिया और माँ को पलँग पर लिटा दिया।उनकी आंख लग गई , थोड़ी देर बाद जब आंख खुली तो सिया चुपचाप उनके पैरों के पास बैठी थी......सिंधु जी की ने धीरे से पुकारा सिया...तो वह झट से उनके सर के पास आकर बैठ गयी और सर पर हाथ फेर कर पूछा अब कैसी तबियत है मम्मी...??

सिंधु जी फीकी मुस्कान के साथ बोली अब तबियत भी ठीक है बहु और दिमाग़ भी ...


सिया ने कहा मैं आपके लिए कड़क चाय बनाकर कर लाती हूँ, पीकर ताज़गी महसूस करेगी !

तब तक सुमति आगयी और बोली माँ अब कैसी तबियत है??

"मैं ठीक हूँ बेटी"माँ ! मेरी फ्लाइट की टिकट कल की है, लेकिन अगर आप कहो तो मैं रुक जाती हूँ!


" नही बेटी अब तो ये जीवन भर का रोना है"


ये दुःख मुझे अकेले ही भोगना है.....


तुम जाओ अपना घर सम्हालो....वरना लोग क्या कहेंगे कि सिंधु जी ने बहुओं के होते हुए भी, सेवा टहल करने के लिए बेटी को जबरजस्ती रोक रखा है ...


तब तक सिया चाय लेकर आगयी , सबको चाय देकर वही बैठ गयी, सिंधु जी बोली बेटा तुम अपने ऑफिस से कुछ दिन और छुट्टी लेकर रुक सकोगी मेरे पास .....


"तुम्हारे रहने से मुझे हिम्मत रहेगी"


क्यों नही मम्मी जी , मैने पहले ही छुट्टी बढ़वा ली है...सुमति मुँह बिचकाकर दूसरे कमरे में चली गई।


अगले दिन सुमति भी चली गयी और मंझली बहु भी।सबके जाने के बाद सिया अपनी सास के पास जाकर बैठ गयी....तो सिंधुजी ने उसका हाथ पकड़कर बोला धन्यवाद बहु जो तुम रूक गई, मेरी तो आस ही टूट गयी थी, तुम्हारे रुकने से मुझे बहुत हिम्मत मिली है ......


ये आप कैसी बातें कर रही है मम्मीये तो मेरा फ़र्ज़ है , इसमे धन्यवाद कैसा क्या आप मुझे अपनी बेटी नही मानती है मैं भी आपकी बेटी जैसी ही हूँ ....फिर ऐसी बाते क्यों कर रही है आप....



"तुम मेरी बेटी नही हो !बहु"....अच्छा हुआ तुम मेरी बेटी नही हो....जो दुःख मेरी बेटीयाँ नही समझ पाई, वो तूने समझा...मैंने तुझें कितने ताने दिए, लेकिन ये तेरे संस्कार ही है , जो तू आज भी अपनी सास की इतनी परवाह करती है...भाग्यशाली है तेरे माता-पिता जो , तुझ जैसी बेटी पाई है ....उनकी आँखों से आँसुओं की धार अविरल बह रही थी...

सिया किसी बूढ़ी सयानी कि तरह कभी अपनी सास के सर पर हाथ फेरती कभी उनके आंसू पोंछती रही ......दोनो सास बहू एक दूसरे से गले मिलकर रोये जारही थी....सिंधु जी को रिश्तों की परख होगई थी, वहीं सिया का मन हल्का होगया था की वह अपनी सास का दुःख बांट पाई...कुछ देर बाद जब भावनाओं का ज्वार थमा तो सिंधु जी ने कहा बेटा "मैं बहुत खुशनसीब हूँ जो तू मेरी बेटी नही, बहु है"


सिया झट से सासूमाँ के गले लग गई, लेकिन एक सवाल उसका पीछा नही छोड़ रहा था , वो यह की इतना प्यार देने और मानने वाली माँ के प्रति अचानक तीनों बेटियों का रवैया कैसे बदल गया?




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