मैं एक नारी हूं
मैं एक नारी हूं
मैं एक नारी हूं ,बिटिया हूं ,बहन हूं, पत्नी हूं, माता हूं ,सासू मां हूं ऐसे कितने पात्रों को संसार व गृहस्थी के रंगमंच पर एक महिला जीवन के अलग-अलग पायदानों पर जीती है। सुमि ने इन सब पात्रों को भरपूर जिया जो एक मिसाल है। सुमि ने माता-पिता का इकट्ठा प्यार अपने पिता से पाया था। पिता एक सरकारी अधिकारी थे पर उन्होंने अपने व्यस्त समय मैं भी सुमि को संस्कार दिए, जिन्हें उसने अपने जीवन में उतारा और ऐसा अपनी बेटियों को बांटा की नाते रिश्तेदार ,मिलने जलने वाले ,आस-पड़ोस यहां तक कि बेटियों के ससुराल वाले भी सम्मान से स्मरण करते हैं ।
सुमि प्रोढ़ता की ओर बढ़ रही थी उसने और उसके पति ने मिलकर दो बेटियों के लिए अच्छे घर वर ढूंढे तथा उनका ब्याह भी कर दिया तीसरी बेटी अभी बाकी थी ।
बड़े दामाद का ट्रांसफर वहीं हो गया जहां सुमि का घर था और उसी कॉलोनी में घर मिल गया। बड़ी बेटी के यहां एक नन्हा सा प्यारा सा नवासा था पर बड़की के मन में अपने मां के संस्कार थे। हमेशा जीवन में कुछ नया करते रहना चाहिए ।उसने जब देखा कि मां अब इतनी व्यस्त नहीं है क्योंकि छुटकी एम ए कर रही थी उसने मां को तैयार किया कंप्यूटर क्लास में शामिल होने का और वह अपने साथ सुमि को भी स्कूटर पर ले जाने लगी। पर उस दिन होनी कुछ और ही सोच रही थी सुमि कब कैसे बिटिया के स्कूटर से गिर गई राम जाने और पूरी तरह से घायल हो गई बड़ी मुश्किलों से बड़की उसे अस्पताल लाई। पिताजी को खबर की ,इलाज चला काफी दिन बाद टूटे हाथ पर प्लास्टर के साथ में सुमित घर लौटी एक अत्यंत सक्रिय जीवन जीने वाली नारी असहाय होकर। पति प्राइवेट नौकरी वाले व्यस्त। दोनों बेटियों को अपने पति बच्चों को भी देखना था ।छोटी बेटी ने पढ़ाई व कालेज के अलावा मां की देखरेख, दवाइयां, नहलाना- धुलाना और घर गृहस्थी के कामकाज सब की कमान बखूबी संभाली और दो माह में सुमि फिर से कंप्यूटर क्लास जाने को तैयार थी ।
सत्य है एक नारी जो अपने माता-पिता से संस्कार लाती है उन संस्कारों को अपनी बेटियों में स्थानांतरित करती है और पीढ़ी दर पीढ़ी यह सिलसिला चलता रहता है बशर्ते संस्कारों में सकारात्मकता हो।
