कश्मीरा की चिट्ठी
कश्मीरा की चिट्ठी
"बेटा, कश्मीरा को फोन लगाते रहना, शायद लग जाए।" माँ ने बेबसी में दिल्लू से कहा। "मम्मी यार तुम भी, ज़रा सी बात पे परेशान हो जाती हो। बस दो-तीन दिन पहले ही तो बात हुई थी न उनसे" दिल्लू के जवाब में झल्लाहट अलग से ही महसूस हो रही थी। "बेटा चार दिन..." शेष वाक्य मानो माँ के दिल में ही दफन हो गया हो। अपनी माँ की हालत समझते हुये, दिल्लू उनके पास बैठ कर बोला, "तुम इतना परेशान क्यों हो जाती हो ? तुम्हें पता है न, उनके घर में कितनी सिक्यूरिटी लगी है। वो ठीक ही होगी। शायद उनका फोन खराब हो गया होगा।"
"वो जो उसके पड़ोसी हैं, लड्डू और जिन्नी, उनके भी तो फोन नहीं लग रहे न।" माँ ने दिल्लू को तर्क देते हुए कहा। "तो हो सकता है उस एरिया के सारे नेटवर्क्स में कुछ दिक्कत आ गई हो " दिल्लू का जबाव इतनी जल्दी आया कि माँ अब शांत हो गयी।
माँ अपने ख्यालों में डूबी ही थी कि किसी ने दरवाजे पे दस्तक दी। "देख जाके कौन आया है गेट पे" माँ ने दिल्लू को बोला। आलसी दिल्लू वहीं से चिल्लाते हुए बोला, "कौन है?" "पोस्टमैन।" आगुंतक ने भी उसी सुर में जबाव दिया। दिल्लू खुशी से चिल्लाया, "लगता है मेरी नौकरी की चिट्ठी लेके आया है।" वह दौड़ता हुआ दरवाजा खोलने गया। मगर दिल्लू के अरमानों पर पानी फेरते हुए, पोस्टमैन ने उसके हाथ में एक अन्तर्देशीय थमा दिया और चलता बना। दिल्लू मुंह लटकाते हुए माँ के पास आया और बोला, "ये लो, कश्मीरा दीदी की चिट्ठी है। कोई नौकरी वौकरी नहीं है। माँ के चेहरे की मुस्कान तो बेटी की चिट्ठी से भी उतनी ही बरकरार रही और बोली, "मेरा चश्मा नहीं है यहां, तू इसे खोल के पढ़ ज़रा।"
दिल्लू अपनी जिंदगी में, शायद पहली बार कोई अन्तर्देशीय खोल रहा था। जैसे तैसे उसने चिट्ठी खोल पायी। माँ बड़ी बेसब्री से अपनी कश्मीरा बेटी के शब्दों को सुनना चाह रही थी और दिल्लू था कि बस चिट्ठी के काग़ज़ को निहारे जा रहा था। कुछ बोल ही नहीं रहा था। उसने काग़ज़ पलट कर भी देखा। मगर चिट्ठी में कुछ पढ़ने जैसा था ही नहीं। उसे पेन से लिखा हुआ कुछ दिखा नहीं, सिवाय घर के पता के। बहुत गौर से देखने पर दिल्लू को कुछ निशान दिखाई दिए, जैसे पानी की कुछ बूंदें काग़ज़ पर गिर के सूख गई हो।
अब कश्मीरा की ख़ामोशी इस चिट्ठी से निकल कर घर में सन्नाटा बन के फैल गयी थी।
