कमरे के कोने में रखी पुरानी लकड़ी
कमरे के कोने में रखी पुरानी लकड़ी
कमरे में उस ठंडी फुसफुसाहट से मेरी रीढ़ की हड्डी में सिहरन दौड़ गई। कांपते हाथों से मैंने अपनी दादी की अलमारी से उनकी पुरानी डायरी निकाली, जिसमें इस हवेली का इतिहास था। जैसे ही मैंने पन्ने पलटे, मुझे एक धुंधली तस्वीर मिली। यह उसी औरत की थी जिसे मैंने खिड़की के बाहर देखा था। तस्वीर के पीछे लिखा था "मंजुलिका: 1945।"
मेरी दादी की डायरी के अनुसार, मंजुलिका इस हवेली की सबसे छोटी बहू थी, जिसे कभी बाहर नहीं देखा गया था। लोगों ने कहा कि वह किसी गुप्त ध्यान में डूबी हुई थी, और एक अंधेरी रात में, वह अचानक गायब हो गई। लेकिन गायब होने से पहले, उसने अपनी वसीयत और कुछ कीमती गहने इस हवेली की दीवारों के भीतर कहीं छिपा दिए थे। क्या वह परछाई मुझे उस खजाने तक ले जाने की कोशिश कर रही थी? या वह किसी और चीज़ का बदला ले रही थी?
फिर अचानक, कमरे के कोने में रखी पुरानी लकड़ी की अलमारी अपने आप खुलने लगी। अंदर से एक पुरानी पायल की आवाज़ आई—"छन... छन... छन..." मैंने हिम्मत जुटाई और अलमारी के अंदर देखा। कपड़ों के ढेर के नीचे एक छोटा सा, सीक्रेट दरवाज़ा छिपा था। जैसे ही मैंने उसे छुआ, पूरी हवेली एक अजीब वाइब्रेशन से गूंज उठी। दीवार पर खून से लिखे शब्द अब चमक रहे थे, जैसे मुझे गाइड कर रहे हों।
