कहानी: मौन त्याग की नारी 🌸
कहानी: मौन त्याग की नारी 🌸
महिला दिवस के दिन स्कूल में कार्यक्रम था। मंच पर बड़ी-बड़ी महिलाओं की बातें हो रही थीं—रानी लक्ष्मीबाई, सरोजिनी नायडू, कल्पना चावला… सबकी वीरता और उपलब्धियाँ गाई जा रही थीं।
भीड़ में बैठा छोटा राहुल यह सब सुन रहा था। अचानक उसके मन में एक सवाल आया—
"क्या केवल वही महिलाएँ महान होती हैं जो इतिहास में लिखी जाती हैं?"
उसकी नज़र सामने बैठी अपनी माँ पर गई। साधारण सी साड़ी, थका हुआ चेहरा, पर आँखों में गहरा स्नेह।
राहुल के पिता पिछले पाँच साल से दूसरे राज्य में मजदूरी करने गए हुए थे। साल में सिर्फ एक बार घर आते थे।
घर में माँ ही सब कुछ थी—
माँ भी, पिता भी, दोस्त भी, और सहारा भी।
सुबह चार बजे उठकर वह चूल्हा जलाती, बच्चों के लिए खाना बनाती, फिर खेत में काम करने चली जाती।
दोपहर में लौटकर बच्चों को पढ़ाती, शाम को फिर घर के कामों में लग जाती।
कभी-कभी रात को राहुल देखता—
माँ चुपचाप आँगन में बैठी आसमान की तरफ देख रही होती थी।
शायद वह अपने पति को याद करती थी…
शायद अपनी थकान को छुपाती थी…
पर अगले ही पल जब बच्चे सामने आते, वह मुस्कुरा देती।
राहुल को याद आया—
उसकी दादी अक्सर एक और कहानी सुनाती थीं।
यशोधरा की…
जिसने अपने पति सिद्धार्थ को संसार का बुद्ध बनते देखा, पर खुद अपने मन का दुख किसी से नहीं कहा।
उर्मिला की…
जो चौदह वर्षों तक लक्ष्मण की प्रतीक्षा में मौन साधे रही।
और जसोदाबेन की…
जिन्होंने बिना शिकायत के अपने जीवन को शांत समर्पण में जी लिया।
राहुल को अचानक लगा—
इतिहास में लिखी गई नारी महान है,
पर इतिहास से बाहर जीने वाली नारी भी कम महान नहीं होती।
मंच पर भाषण देने के लिए जब बच्चों को बुलाया गया, राहुल भी खड़ा हो गया।
उसने मंच पर जाकर धीरे से कहा—
“आज महिला दिवस है।
हम यशोधरा, उर्मिला और जसोदाबेन को याद करते हैं।
पर मैं उन लाखों नारियों को भी प्रणाम करना चाहता हूँ
जो घरों में रह जाती हैं,
जब उनके पति रोज़ी कमाने के लिए
दूसरे प्रदेशों में चले जाते हैं।
वह अकेले घर संभालती हैं,
बच्चों को बड़ा करती हैं,
और अपनी तकलीफों को
मुस्कान में छुपा लेती हैं।
मेरे लिए मेरी माँ ही सबसे बड़ी नारी है।”
इतना कहते ही राहुल की आवाज भर आई।
पूरे हाल में सन्नाटा छा गया।
फिर धीरे-धीरे तालियाँ बजने लगीं।
उस दिन लोगों को समझ आया—
