जो सबक सीखा ....
जो सबक सीखा ....
"चलो जल्दी करो....". भागते हुए नीता और पूनम सीढियां चढ़ने लगी
"ऐसी भी क्या जल्दी थी "
" बस वो उनका ( फेवरेट) बायलोजी प्रैक्टिकल का पीरियड जो आने वाला था
डिसेक्शन जिसके लिए,अपना पिछला वाला स्कूल छोड़ कर, यहां एडमिशन लिया था!
हां थोड़ा दूर जरूर पड़ रहा था, मगर उससे क्या? अपने मन का सब्जेक्ट पढ़ने के लिए इतना तो करना ही था!
हाई स्कूल स्तर पर आज मेढक का अंतरांग ( इन्टर्नल आर्गन) डिसेक्ट करके शो करना था।
वाओ! कितना अच्छा लग रहा है... अंदर से सभी बाडी के अंगों को देखना!... महसूस करना!
सच ,किताबी ज्ञान, चित्रों से बिल्कुल अलग!!
ये तो अच्छा होता था कि उसके बाद सीधे इंटर्वल पड़ता था तो टीचर के जाने के बाद दोनों ( पक्की) सहेलियां, बाकी के समय में भी डिसेक्टेट मेढक में अपनी सीजर,फारसेप लेकर बाकी अंगों का डीट डिसेक्शन करने में जुट गई!
मसलन,आई बाॅल को पीछे तक कौन सी नस जोड़ती है?
लंग्स कहां से और कैसे जुड़ा है?
लीवर, और गाॅल ब्लैडर में पिंच करके देखने पर कैसा फ्लुएड बाहर आता है?
मतलब कि स्पेसिमेन का पूरा पूरा उपयोग
अरे ये क्या?
बेल बज गई?... यानि की इंटरवल ओवर हो गया
अब?
जल्दी - जल्दी हाथ धोकर, टिफिन से परांठे और सब्जी की रोली पोली बना कर, लगभग ठूंसते हुए टिफिन निपटाया
अगला पीरियड हिंदी का है.. जल्दी भागों
सबसे कड़क ( खुर्राट) टीचर वही थी
रगड़ - रगड़ कर, मतलब घइस- घिस कर सबकी हिंदी सुधारती थी
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तो क्या मिला ये सब पढ़ कर?
यही कि जो चीजें ( या लोग) सामने से जैसे दिखते हैं,अंदर से वैसे नहीं होते.. इसी अंदर की बात को समझना ही जिंदगी का असली सबक है, जिससे हम वर्तमान जीवन की समस्याओं, उलझनों को सुलझा सकें, वरना कोई भी किताबी ज्ञान, भौतिक डिग्रियां व्यर्थ हैं।
और यह भी कि अवसर और ज्ञान का सम्यक उपयोग करने आना चाहिए, शिक्षा किसी भी विशेष, क्षेत्र में प्राप्त की हो उसका सर्वप्रथम उद्देश्य जीवन को सहज,सरल बनाना होना चाहिए.... मुश्किलों में इजाफा करने वाला नहीं।
