हर क्षण को जीना सीखें
हर क्षण को जीना सीखें
एक राजा ने किसी कार्य से क्रोधित होकर अपने मंत्री को फाँसी की सज़ा सुना दी। सायं 6:00 बजे का समय निर्धारित हुआ। इससे दो-तीन घंटे पूर्व मंत्री प्रसन्नचित बैठा था। फाँसी के निर्णित समय आ जाने पर भी राजा ने मंत्री को प्रसन्नचित्त ही पाया। राजा ने उससे पूछा- मौत तुम्हारे सामने नाच रही है, फिर भी तुम इतने प्रसन्न कैसे दिखाई दे रहे हो। उसने उत्तर दिया- महाराज! मौत के पहले जो समय बचा है, उसे तो शांति से जियूँ। मैं मौत के पहले ही क्यों मरूँ। कहा भी गया है -
कल का दिन किसने देखा है,
आज के दिन को खोए क्यों?
जिन घड़ियों में हँस सकते हैं,
उन घड़ियों में रोए क्यों?
इस पर राजा ने निर्णय लिया कि जो जीवन जीना जानता है, मैं उसे नहीं मार सकता। जीने की कला का प्रमुख सूत्र है प्रसन्न, प्रशांत और समाधि में रहना। जो व्यक्ति हर स्थिति में प्रसन्न और शांत रहना सीख लेता है, वह जीने की कला में कुशल बन सकता है। जीने की कला को सीखने का अर्थ है जीवन की सभी क्रियाओं को सम्यक बनाना, अपने दृष्टिकोण को सम्यक बनाना। इस कला को सीखने के लिए सबसे खास बात यह है कि मनुष्य आत्म-निरीक्षण, आत्म-परीक्षण एवं आत्म-समीक्षा करना सीखे। यदि व्यक्ति सारी कलाएं जानता है पर जीवन जीने की कला नहीं जानता तो मानना चाहिए कि उसने कुछ भी नहीं सीखा।
