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वर्षा गुप्ता "रैन"

Children Stories


4.4  

वर्षा गुप्ता "रैन"

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भूली बिसरी यादें

भूली बिसरी यादें

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 ये कहानी है प्यार की, दो भाई बहनो के, याद है मुझे अब तक भूली बिसरी यादें "असल शादी पर आधारित एक सत्य घटना।गाँव में जँहा चारो तरफ शादियों का माहौल है, सभी चौगानो में तम्बू तने है,ढोल नगाड़ो का शोरगुल और धमाचौकड़ी,गाँव दुल्हन की तरह सजा है,मेहमान इतने की जैसे मेला लगा हो, वहीँ गुप्ता जी के घर भी निमंत्रण आया है,सपरिवार...

सीमा छोटी से लाल फ़्रॉक में खूब फब रही है, और राहुल वो भी कुछ महीनें पहले ही लाई हुई डेनिम जीन्स में जँच रहा है। दोनों बहुत उत्साहित है,.शादी देखेंगे, खाना और गाना होगा।बड़ा परिवार है घर के आदमियों की टोली पहले निकल गई और ये औरते है कि सजने सँवरने में कुछ ज्यादा ही वक्त लेती है पर राहुल और सीमा पहले ही बाहर निकल चुके, इन्तजार करते हुए सीमा का धीरज टूट रहा था। चार साल की मासूम लड़की अपने चचेरे भाई राहुल से तुतलाई आवाज में .."भैया हम कब जाऐंगे शादी देखने..?"राहुल निरुत्तर पर इंतजार उससे भी नही हो रहा था दीवाल पर लटकी घड़ी बता रही थी की बहुत वक्त हो गया।राहुल धैर्य खोते हुए बोला सीमा हम आगे चलते है सब आते ही होंगे अब

"भैया हम खो जाएंगे तो "अपनी मासूम सी आवाज में सीमा ने फिर कहा

"तो में हूँ न तेरा भाई..राहुल भी तनकर बोला

सीमा "चलो भैया" कहकर भैया का हाथ थामकर चल दी और राहुल छोटी सी उम्र में ही बहन की जिम्मेदारी उठाने की कोशिश में चल देता है,चलते चलते दोनों ने पलटकर देखा घर वाले पीछे ही आ रहे अब तो दोनों की रफ़्तार बढ़ गई। चलते गए और दुसरी और जा रहे एक बाराती ख़ेमे में शामिल हो गए। घर की औरते सोच रही कि बच्चे गुप्ता जी के साथ,और गुप्ता जी और उनके भाई को ये ज्ञात की बच्चे घर कि औरतो के साथ..दोनों आखिर विवाह मंडल में पहुँच गए। चारो तरफ देखा कोई अपना नही सभी अजनबी बाराती, दोनों ही अधीर होकर अपने माता पिता को ढूंढने लगे ,बाहर निकलने पर भी कोई दिखाई नहीं दे रहा था..सकपकाए खड़े दोनों एक दूसरे को देख रहे थे। जैसे सांप सूंघ गया हो..सामने ढोल,नगाड़े दूल्हा,घोड़ी,नए कपड़े पहने लोग और तरह तरह के पकवान,पर अब यह सब नही भा रहा था। भीड़ के छटनें का इन्तजार कर फिर चलना शुरू किया पर दोनों पहुँच गए किसी सुनसान जगह जहाँ खेत और झाड़िया बस और तेज गर्मी..दूर दूर तलक न कोई आता था न जाता था। ये कोन सी जगह, ये मासूम क्या जाने। सीमा धीरज खोकर खाई से एक बड़े गड्ढे में बैठ गयी जो ज्यादा गहरा नही था, दोनों के कपडे धूल में सन चुके थे।

"भैया अब हम क्या करेंगे" सीमा ने अपने बहादुर भाई की और प्रश्न किया, और राहुल रोने लगा "सीमा हम खो गए।" 

भाई को ढाँढस बंधाते हुए सीमा कह रही है.."अरे पागल!! हम नही खोए हमें पापा लेने आएँगे.."

उधर गुप्ता जी और उनके भाई सब जगह उन्हें ढूंढ़ने में लगे। सभी बाराती ख़ेमे,आसपास के गाँव और यहाँ तक की तालाबो और कुओं में भी न चाहते हुए झाँकना पड़ा। पास के एक कुए में लाल रंग का कपड़ा देख गुप्ता जी की जान हलक में आकर अटक गई। वहाँ रहना अब मुनासीभ न था। सब घर आकर रोने और खुद को कोसने लगे बढ़ चढ़कर मन्नतो और चढावो से भगवान को रिझाया जा रहा था आखिर क्यों न हो बच्चे तो घर की प्राथमिकता है।

भैया प्यास लगी है सीमा ने धीरे से राहुल से बोला दोनों ने हाथ अभी भी पकड़े हुए है। सूर्य का प्रकोप भी बढ़ रहा था ,दोनों बच्चे भूख प्यास से व्याकुल होकर अधीर हो रहे थे.. लेकिन जाने किस देवीप्रेरना से झाड़ियो के पीछे से एक लम्बा-दुबला बुजुर्ग हाथ मे लोटा लिए बाहर निकल आया।शरीर उसका जैसे मानों हड्डियों का ढाँचा,पर बहुत ताकत थी इसमे गाँव के मावा-मक्खनों की।गहरे नारंगी रंग का साफ़ा,धोती और हाथ मे लोटा उसकी पहचान बताते थे कि वो पास के ही किसी ग्रामीण क्षेत्र का है। अपने हाथ का लोटा नीचे धरते हुए वो बच्चों की और आगे बढ़ा, बच्चे सोच में एक दूसरे को टुकरने लगे फिर दोनों ने अपने हाथ और मजबूती से पकड़ लिए। बुजुर्ग ने एक कदम और आगे बढ़ाया की राहुल सीमा का हाथ छुड़ा आगे आकर तनकर खड़ा हो गया।

'तुम क्यों रो रहे हो,आओ मैं तुम्हे पानी पिलाता हूँ' बुजुर्ग ने मुस्कुराकर कहा।

सुनते ही राहुल के कंधे सिकुड़ गए और फिर से पीछे हट गया।

और बुजुर्ग अपने गन्दे लोटे में से पानी पिलाने लगा...सीमा राहुल से कहना चाहती थी "भैया पानी बहुत गन्दा है" पर दोनों के गले सुख रहे थे..तो पी गए।

क्या नाम है तुम्हारा ?.. दोनों से फिर उस देवदूत ने पूछा-

"मेरा नाम राहुल है और ये मेरी बहन है सीमा.."राहुल ने कुछ और आगे आकर उत्तर दिया।

धीरे-धीरे बातों बातों में उनसे माता-पिता और दादा का नाम जानकर वो भला-मानस जान गया की ये बहुत ही पास गाँव के गुप्ता जी के बच्चे है..ख़ुशी की लहर दौड़ पड़ी जब उसने बच्चों से कहा "चलो में ले चलता हूँ तुम्हें तुम्हारे घर...'

दोनों को एक-एक कांधे पर उठाकर चल दिया गाँव की ओर...

गुप्ता जी के घर भीड़ जमा हो चुकी थी। उनके छोटे भाई का भी इकलौता बेटा, रह-रहकर बच्चों की बातें याद आ रही थी। सब निराशा से भर चुके थे तभी भीड़ को चीरते हुए किसी देवदूत की तरह सामने से बुजुर्ग आता दिखा। दोनों बच्चे कंधे पर से जैसे उछलकर गोद में आने को तत्पर हो। सब की आँखों से खुशी और गम की मिश्रित अश्रुधाराए बह गई। बच्चों को गले लगा खुब प्यार किया और बच्चों की भी जैसे जान में जान आई। तभी उस बुजुर्ग का ख्याल आया आँगन में ही बैठक व्यवस्था कर उसे बिठाया। जलपान की सुध अभी गुप्ता जी को आई नही थी, बुजुर्ग की भी चाहत थी कि वो पहले अपना बखान कर लें मोहल्ले के लोगो ने उसे घेर जो रखा था। गुप्ता जी ने एक सवाल क्या किया कि वो फुट पढ़ा और सारा किस्सा विस्तृत में सुनाकर ही साँस ली। सबके चेहरे पर हँसी और खोने का डर एक साथ आये। इस वक्त ये बुजुर्ग सच में किसी देवदूत से कम नही लग रहा था। उसके जलपान की व्यवस्था कर खूब आवभगत की गई। अब वो बच्चों को बहुत भा रहा था। साँझ ढलने आई थी दोनों को लाड़ कर उसने भी विदा ली।

बुजुर्ग के जाने के बाद गुप्ता जी ने बच्चों से पूछा "शादी में जाना है ?" और सब खिलखिलाकर हँस दिए,बच्चे भी.... 

       


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