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Tushar Mandhan

Romance


5.0  

Tushar Mandhan

Romance


भीगी-भीगी रातों में

भीगी-भीगी रातों में

6 mins 822 6 mins 822

उस रात मौसम बहुत खराब था। बारिश रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी और ऊपर से बिजली भी चमक रही थी। काफी देर तक मैंने इंतज़ार किया कि बारिश रुक जाये पर कोई फायदा नहीं हुआ। रात के १२ बज गए थे और अगर मैं उससे ज़्यादा देर करता तो अगले दिन अस्रोपचार की कक्षा सोते हुए बितानी पड़ती। आखिरकार बारिश थोड़ी कम हुई तो मैंने सोचा कि इससे अच्छा मौका शायद दोबारा ना मिले इसलिए मैं उसी वक्त कॉलेज से निकल गया।

बारिश भी जैसे इसी इंतज़ार में थी की कब मैं बाहर निकलूँ और कब वो अपना रूद्र रूप मुझे दिखाए। मैं जितना तेज़ दौड़ सकता था उतनी तेज़ दौड़कर पास के बस स्टैंड तक पहुँचा। सबसे पहले मैंने अपने फ़ोन और किताबें देखी कि कहीं उन्हें कुछ हुआ तो नहीं। गनीमत थी कि उनको इंद्रदेव का क्रोध नहीं झेलना पड़ा। फिर मैंने अपना गीला रुमाल निकला और उसी से अपने चश्मे साफ करने लगा। तभी मुझे याद आया की मेरे बैग में चश्मे साफ करने का कपड़ा था। मैंने उसे निकला और लेंस से पानी पोंछना लगा।

तभी पीछे से आवाज़ आयी ,"सुनिए बस चली गयी क्या ?"

"मैं भी अभी-अभी ही आया हूँ और मेरे सामने तो कोई बस नहीं आयी।" मैंने उत्तर दिया और चश्मे लगाकर पीछे मुड़ा तो पाया की एक एक लड़की लैब कोट में मेरे पीछे खड़ी थी। मैं समझ गया कि वो भी मेरी तरह डॉक्टरी की पढ़ाई कर रही थी। वो कुर्सी पर बैठी और थोड़ी-थोड़ी देर बाद घड़ी देखे जा रही थी। मैं भी कुर्सी पर बैठ गया। तभी माँ का फोन आया।

"बेटा घर पहुँच गया क्या? अखबार में लिखा था कि दिल्ली में तेज़ बारिश आने वाली है।" उन्होंने पूछा।

मैंने उत्तर दिया," हां माँ! मैं घर सुरक्षित पहुँच गया था। अभी सोने ही जा रहा था।"

"ठीक है बेटा! अब तू सो जा। सुबह जल्दी उठना होगा ना, ध्यान रखना।" कहकर माँ ने फोन रख दिया। मैं उन्हें सच बोल कर बेमतलब की चिंता नहीं देना चाहता था।

फिर काफी समय तक शांति रही। ना मैं कुछ बोला और ना वो कुछ बोली। वो बार-बार घड़ी देख रही थी और कभी-कभी फ़ोन भी बाहर निकल लेती। मुझे लगा कि शायद उसका फ़ोन खराब या बंद ना पड़ गया हो इसलिए मैंने उसे पूछा कि अगर उसे फोन पर किसी से बात करनी है तो वो मेरा फ़ोन ले सकती है। उसने हाँ में सिर हिलाया। मैंने उसे अपना फ़ोन दे दिया और उसने कोने में जाकर बात की। मैंने भी सुनने की कोशिश नहीं की।

ऐसे ही इंतज़ार करते-करते २:३० बज गए।

अब उससे ज़्यादा इंतज़ार का कोई फायदा न था। मुझे लगा की पैदल चलना ही अच्छा रहेगा। बारिश आ तो रही थी मगर झमाझम नहीं, रिमझिम। मैं उठा मगर जैसे ही मैं चलने लगा मुझे एहसास हुआ कि मैं उस लड़की को देर रात अकेले नहीं छोड़ सकता।

"सुनिए, २ बज गए है अब कोई भी बस ५ बजे से पहले नहीं आएगी। आपको कोई लेने आने वाला है क्या?" मैंने पूछा।

"नहीं! २ बज गए क्या? माफ़ करना मगर आप कैसे कैसे जा रहे है?" उन्होंने उत्तर दिया।

"मेरा सुबह ६ बजे उपदेश है। बारिश भी कम हो गयी है इसलिए मैं पैदल चलकर अग्रसेन चौक से ऑटो ले लूँगा। आपको कहाँ जाना है? अगर आपको कोई परेशानी ना हो तो मैं आपको छोड़ दूँ ?"

उन्होंने हामी भरी और हम दोनों चल दिए। 

"वैसे आप कौन से साल में है?" मैंने पूछा।  

"आज आखिरी दिन था, अब इंटरशिप के लिए अमृतसर जाऊँगी। और आप?"  

"तीसरा साल।"

"कल अस्रोपचार का कक्षा होगी ना जो इतना उत्साहित हो रहे हो?" 

"हाँ! मगर उत्साहित तो नहीं हूँ लेकिन... सच बोलूं बहुत उत्साहित हूँ!"

वह हँसी और बोली," तो इंटरशिप का क्या सोचा है?"

"दिल्ली में ही मेरी मौसी का हॉस्पिटल है, वहीं सही रहेगा।"

"क्या नाम है हॉस्पिटल का?"

"आशीर्वाद हॉस्पिटल, राज मार्ग पर।"

"डॉ स्मृता तुम्हारी मौसी है!"

"हाँ!"

"सही है।"

ऐसे ही चलते-चलते करीब ५ मिनट ही हुए थे कि तभी सामने सड़क पर खड़े पानी ने हमे रोक दिया। और कोई रास्ता ना था। एक वो ही सड़क थी और वो भी पानी से भरी थी। 

"अब क्या ?" उन्होंने पूछा 

"पता नहीं! आपके परिवार से कोई नहीं आपको लेने नहीं आ सकता क्या?" मैंने उत्तर दिया। 

"नहीं मैं अकेली रहती हूँ। "

"अगर इस पानी से जायेगे तो मरीजों का इलाज करने के बदले खुद ही इलाज ना करना पड़ जाये! २:४५ हो गए है, यहीं रुक जाते है। सुबह होते ही कॉलेज पहुँचकर लॉकर से नए कपड़े बदल लूंगा। "

"हाँ ये सही रहेगा! मगर अभी कहाँ रुके?"

"वहाँ सही रहेगा!" मैंने एक पेड़ की तरफ इशारा करते हुए कहा।  

वो एक बड़ा सा बरगद का पेड़ था जिसके नीचे बेंच और एक चाय की तफरी थी। हम बेंच पर बैठ गए। 

"वो देखो!" वो चाय वाले और उसके बेटे को सोते देखकर उनकी तरफ ऊँगली करके बोली और बैग से कैमरा निकाल कर फोटो खींचने लगी। 

"तुम ये ही सोच रहे होंगे ना कि कितनी पागल लड़की है, डॉक्टर होकर भी फोटो खींचने का शौक रखती है!"

"नहीं! हम डॉक्टर है, इसका मतलब ये थोड़ी ना है की हम कोई शौक नहीं रख सकते।"

"तुम इतनी साल कहा थे? कोई तो मिला जो शौक की अहमियत समझता हो। तुम्हारा भी कोई शौक है क्या?"

"हाँ मैं लिखता हूँ। "

"अच्छा! तो अगर तुम्हारी किताब कभी छपे तो उसका कवर पेज मैं बना दूँगी। "यह कहा कर हम दोनों हँसने लगे।  

"तो कुछ उदाहरण दे सकते हो अपनी कला का।?"

"हाँ, एक किताब हमेशा मेरे बैग में होती है।" यह कहकर मैंने वो किताब अपने बैग ने निकाली और उसे दे दी। 

और फिर मैं उसकी खींची फोटो और वो मेरी लिखी कहानियों की तारीफ करने लगी। और ऐसे ही बिना मतलब की और पागलपन से बातें करते-करते वक़्त का पता ही नहीं चला। 

"तुम दोनों को शर्म नहीं आता क्या? इधर हम सो रहे थे और तुम दोनों हँस -हँसकर हमे सोने ही नहीं दे रहे हो। "तफरी वाला भैया बोला। 

"माफ़ करना हमने ध्यान ही नहीं दिया। "मैं उन्हें कहा। 

"कोई बात ना! बड़े समय बाद राजनीति के अलावा यहाँ कोई बात हुयी। वैसे भी सुबह तो होने ही वाली है। " उसने उत्तर दिया। 

हमने घड़ी देखी तो पता चला की ४:५० बज चुके थे। 

"भैया एक कप चाय बनाना।" उन्होंने कहा और फिर मुझसे पूछा," तुम भी लोगे?"

मैंने भी हाँ कर दी। 

"थोड़ी कड़क बनाना। रात भर नहीं सोए हैं।" मैं बोला। 

हमने चाय पी और जैसे ही हमने वो कप रखा, वो चिल्लाई ,"हृतिक !!"

वो दौड़कर एक कार के पास गयी जो हॉर्न बजा रही थी। उसने कुछ देर बात की और फिर दौड़ कर दोबारा तफरी के पास आयी और बोली," थैंक यू सो मच! तुमने तो मेरा कॉलेज का आखिरी दिन यादगार ही बना दिया। काश थोड़ा और समय होता पर, वो मेरा बॉयफ्रेंड मुझे लेने आ गया तो अब मैं जाती हूँ। पूरी रात हम बोलते रहे मगर मैंने तुमसे तुम्हारा नाम तो पूछा ही नहीं। मेरा नाम राधा है है और तुम्हारा ?"

"श्याम!"

"तो श्याम, तुम बहुत कमाल के हो। तुम्हारे भविष्य के लिए तुम्हें ईश्वर शक्ति दे और मैं अलविदा नहीं कहूंगी क्योंकि हम फिर ज़रूर मिलेंगे!" ये बोलकर उन्होंने मुझे गले लगाया और फिर दौड़ कर कार में बैठ कर चली गयी। 

मैं कार को तब तक बिना कुछ सोचे देकता रहा जब तक वो आँखों से ओझल नहीं हो गयी। मैं भी चलने ही वाला था की तभी फिर बारिश बहुत हो गयी।इसलिए मैं फिर तफरी के साथ वाले बेंच पर बैठ गया और चायवाले भैया को एक और कप चाय बनाने को कहा। इसी बीच उसका बेटा जाग गया और उसने रेडियो चला दिया। चायवाले भैया ने उसे रेडियो बंद करने को कहा मगर मैंने उनसे उसे चलते रहने देने का आग्रह किया जो उन्होंने मान लिया। 

मैं चाय पीते-पीते बारिश रूकने का इंतज़ार कर रहा था तभी रेडियो पर गाना बजा-

                              " भीगी-भीगी रातों में, मीठी-मीठी बातों में

                              ऐसी बरसातों में, कैसा लगता है, हाँ

                              ऐसा लगता है, तुम बन के बादल

                              मेरे बदन को भीगो के मुझे"


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