अवनि
अवनि
तूफ़ान आज कई दिन बाद थमा था - अवनि के अंदर का भी और बाहर का भी। सूरज के निकलने के साथ ही उसने भगवान का शुक्र अदा किया कि अंतत: रौशनी की किरण तो दिखी।
हवा के झोंके सी थी अवनि जिसे रोहित के आँचल में डाल दिया गया था। पहले दिन से ही रोहित जान गया था कि वह उसकी प्राण-वायु है और उसे अवनि को संभाल के रखना है। बस रोहित ने अवनि की पहरेदारी को ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया और अपनी आँखों को और कोई सपना देखने की अनुमति ही नहीं दी। अवनि जलती रही पर वह रोहित को जलाना नहीं चाहती थी इसलिए खुद ही बुझती भी रही। वह घुट रही थी क्योंकि उसकी पूरी ऊर्जा अपनी ही गति को रोकने में व्यर्थ जा रही थी।
अवनि सच ही में हवा का झोंका ही थी जिसे कभी-कभी कोई महसूस तो कर पाता था पर कभी कोई देख नहीं पाता था। इधर कुछ दिनों से अनूप ने अवनि को पहचान लिया था और धीरे - धीरे उसे राहत देने की कोशिश शुरू कर दी थी। अनूप खुद एक बहुत काबिल, मासूम, सच्चे दिल वाला परिंदा सा था जो अवनि के सामने एक बच्चा बन जाता। वह अपने प्रयास में जल्दी ही सफल भी हो गया। अवनि बाहर निकली, मुस्कराई और अनूप की उड़ान को देखने लगी। अनूप रुकने लगा पर अवनि यह नहीं चाहती थी की वह रुके।
वह कहना चाहती थी कि मैं रोहित की प्राण-वायु हूँ और उसके प्राणों में ही रहूँगी पर तुम्हारी उड़ान को ऊंचाई देने का प्रयास करती रहूँगी। हमारी जीवन यात्रा की सफलता इसी में है कि हम कुछ अच्छा कर पाएँ। मुझे मुस्कान दे कर तुम सफल हो चुके हो और अपनी उड़ान भर के मुझे भी सफल कर सकते हो। मैं आसपास हूँ, महसूस होती रहूँगी पर मुझे देखना या छूना संभव न होगा।
अब अवनि का एक ही सवाल था कि क्या अनूप आगे बढ़ पायेगा, अपने सपने पूरे करने में जुटेगा या वह भी रोहित की तरह अवनि के पास अटक के रह जाएगा। उसका एक ही आग्रह था कि अनूप आगे बढ़ता रहे और अपना मुकाम हासिल करे।
