आस्था और arth
आस्था और arth
प्रमाणों की माने तो बनारस विश्व का सबसे पुराना शहर है जो आज भी अस्तित्व में है। आज ऐसा नहीं है की इस शहर में किसी आधुनिक संसाधन की कमी है। चौड़ी सड़कें, बड़ी-बड़ी इमारतें, विश्वविद्यालय, अस्पताल और भी लगभग वो सारी चीजें जो एक नगर को मॉडर्न बनती है। पर जब आप इस शहर के पुराने इलाकों में जाते है तो आपको इसकी प्राचीनता का भी एहसास होता है। सकरी गलियाँ, दशकों पुराने मकान और उनमें रहते वो लोग जो शहर में रह कर भी उसकी भाग दौड़ से बचे हुए है। तब आप उस बनारस को जानते है जहां भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने हिन्दी को जनमानस तक पहुचने की मुहिम छेड़ी थी। प्रेमचंद के कितने ही पात्र इसी मिट्टी में पनपे। जिन गंगा घाटों पर कभी तुलसीदास ने रामनाम की धुन छेड़ी थी वहाँ आज भी कई संत भगवान को ढूंढते मिल जाएंगे।
यूं तो पहले भी इस शहर में अपने परिवार के साथ आया था किन्तु गत कुछ वर्षों में मुझे ये सौभाग्य नहीं मिल था। इसलिए जब प्रथम वार्षिक परीक्षा समाप्त होने के बाद जब दोस्तों ने काशी यात्रा का मन बनाया तो मैं भी उनके साथ हो गया। यात्रा केवल दो ही दिनों की थी इसलिए कम समय में ज़्यादा घूमने का उद्देश्य था। धनबाद से पूरी रात सफर करने के बाद हम सबह ६ बजे वाराणसी पहुंचे। एक सराय में कमरा लेकर और नित्य कार्यों से मुक्त होकर हम तुरंत ही घूमने निकाल गए। हमारा कमरा काशी विश्वनाथ मंदिर से ज्यादा दूर नहीं था इसलिए हमने पैदल चलना शुरू किया। यारों की बातों में दूरी ऐसे भी कुछ काम मालूम होती है। इन कुछ सालों में काफी कुछ बदल गया था। विश्वनाथ मंदिर अब कॉरिडर बन चुका। कुछ पुरानी इमारतें अब भी थी पर काइयों का वजूद अब इतिहास हो चुका था। विकास की नवीनता में मैं पुरानी समिरीतियों को तलाश रहा था। हालांकि इस नवनिर्माण ने लोगों के व्यवहार पर कुछ खास असर नहीं डाला था। “भैया इधर जूता उतारिए, आगे आलोईड नहीं है।“, “इधर से स्पेशल प्रसाद लीजिए।“ और भी कई ऐसे आवाहाण जिन्हे नजरंदाज करके हम आगे बढ़ते रहे।
मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही मेरी आखें चौंधियाँ गई। जहां कभी ऊंचे मकानों के बीच से एक गली जाती थी आज वहाँ आज बड़ा खुला प्रांगण था। फर्श पर संगमरमर का काम हुआ था और चारों ओर बेरकैड लगे थे। हमारे समय वहाँ ज्यादा भीड़ नहीं थी इसलिए जल्दी ही हमारी बारी या गई। पर जब गर्भगृह में जाने का रास्ता बंद पाया तो मेरा मन कुछ खिन्न हो गया। जहां पिछली बार मैंने शिवलिंग को स्पर्श किया था वहाँ झरोखा दर्शन से मेरा मन नहीं भरा। एक बार को खयाल आया की क्या फायदा ऐसे चकाचौंध का जब लोग ढंग से पूजा भी न कर पाएं। मैंने मनोवेग को तर्क से सांत करने का प्रयास किया। शायद भीड़ के सुसंचालन के लिए यह व्यवस्था जरूरी हो।
अचानक से मैंने देखा की दूसरे द्वार से कुछ लोग गर्भगृह में प्रवेश कर रहे है। शायद मैंने गलत द्वार से प्रवेश करना चाहा। अपने दोस्तों के साथ मैं जल्दी ही उस लाइन में लग गया। पर थोड़ी ही देर में मेरा भ्रम टूटा। उस द्वार से भी सभी को प्रवेश नहीं था। ये सौभाग्य सिर्फ एक विसेश वर्ग के लोगों को थी जिन्हे समाज ने वीआईपी की उपाधि दी है। जिनके पास अर्थ अपितु ओहदे की शक्ति होती है। उस वक्त मैं इन में से किसी कसौटी पर खडा नहीं उतरता था। अतः फिर बाहर से ही लौट गया।
उस दिन मैं और भी कुछ जगहें गया। पूरा दिन भटकने के बाद हम सभी घाट पर पहुंचे। गंगा आरती थोड़े देर में शुरू होने वाला था। लोगों की भीड़ बढ़ने लगी थी। माँ गंगा अभी उफान पर भी इसलिए घाट का काफी हिस्सा अभी भी जलमग्न था। पर संध्या की बेला में माँ कुछ शांत दिखाई पड़ती थी। चेहरे को स्पर्श करती शीतल हवाएं चित्त को अत्यंत मनोरम प्रतीत होती थी। जब आरती शुरू हुई तो मानो वहाँ एक अलग-सी ऊर्जा का संचार हो गया था। ज्यों-ज्यों सूर्य का प्रकाश मंद होकर रात्रि के अंधकार में अलोप हो रहा था, शरीर भी विश्राम हेतु विव्हल हो रहा था। जब बिस्तर पर लेटा तो दिनभर की थकान का एहसास होने लगा। पलकें बंद होने को बेचान थी पर अभी निद्रा के आगमन में कुछ पल शेष थे।
मेरा मन स्वतः ही आज सुबह की बात पर मंत्रणा करने लगा। बाबा जो स्वयं वैराग्य के प्रतीक है उनके दरबार में अर्थ का आधिपत्य मुझे कुछ असंगत मालूम होता था। पर यह बात सिर्फ इसी जगह तक सीमित नहीं। आज हर बड़े धार्मिक स्थल पर यही भेद दिखाई पड़ता है। हर साल मुंबई के लालबाग से ऐसी तस्वीरें सामने आती है जिनमें बड़े सिलेब्रिटीज और उद्योगपति आराम से गणपति की पूजा वहीं आम लोगों को प्रतिमा के सामने आते ही हटा दिया जाता है। आज के समाज में जहां हर स्थान पर वर्गीकरण है वहाँ सिर्फ ईश्वर ही है जिनपर सबका समान अधिकार है। जिसके पास कुछ नहीं नहीं है उनकी आस्था भी उतनी ही भाव-विभोर होती है जितनी उनकी जिन्हे भगवान ने सबकुछ दिया है। पर क्या कुछ लोग सच में इतने बड़े बन जाते है की उन्हे ईश्वर के दरबार में भी विशेष समझा जाए? मेरा हृदय इस सवाल पर अभी और गहराई में जाना चाहता था, किन्तु मेरा मस्तिसक निद्रासन का स्वामित्व स्वीकार कर चुका था।
