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*कविता* छंदों और भाव के रसिक मेल से # कविता का प्रस्फुटन होत ...
सिद्धांतो का चढ़ा हुआ था, जाने कैसा भूत । हार गए हम धीरे-धी ...
मैं अब इस तरह बड़ी हो गई कि अपनी सारी उदासी बिल्कुल उसी तरह ...
याद है तुमको तुमने कहा था तुम्हें कभी भूलेंगे नही, ख़ैर छोड़ो ...
बीता हुआ हर एक समंदर याद आता है मुझको मेरा बचपन बराबर या ...
इंतज़ार है गीत प्यार का इसे हर वक्त गुनगुनाना है उम्र भर इसी ...
दिन भर का महसूल तेरी इक मुस्कान है। जिससे थके जिस्म में आ ज ...
ग़लत फहमियां खा जाती है रिश्तों को अक्सर इंसान ग़लत नही होता। ...
पोशीदा सा हयात जीने का अंदाज़ है मुझ में। लाए लबो पे हँसी वो ...
रोज़-रोज़ नए किरदार निभाए जा रही है कब ख़त्म हो ज़िन्दगी का तमाश ...
मसअला ये नही कि तुम भूल गए मुझे, मसअला ये है कि कैसे भुलाऊँ ...
होगी कभी तो फ़ुरसत हमें भी, हम भी कभी ज़िंदगी जिएंगे। फ़हिमा
जितना सुलझाऊँ उतना उलझती ज़िन्दगी। ख़्वाहिशों की आग में झुल ...
धीरे धीरे बातों को फ़ुरसत हो रही है। तेरे बग़ैर जीने की आदत ह ...
दिल को तेरी वो आरज़ू ना रही, वो मसला ना रहा। अब वो दीदार-ए- ...
मेरे बाद मेरे अल्फ़ाज़ पढ़ के। देखना रोओगे मुझे याद करके। फ़हिमा
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