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तुम एक दारू कि...
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तुम एक दारू...
“
तुम एक दारू कि जाम हो जो सबको मदहोश के देती हो रूप जैसे पूर्णिमा की चांद हो सभी को शीतल कर देती हो।
”
By
PRAVESH KUMAR SINHA
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