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लहू-लुहान हैं...
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लहू-लुहान...
“
लहू-लुहान हैं जिस्म की पतंगे सारी डोर कोई रूहानी फेंकने दे। हक़ीक़त भले बेरंग दे दे ऐ मौला! मग़र ख्वाब रंगीन देखने दे।।
”
By
Rishabh Katiyar
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