Rishabh Katiyar
Literary Colonel
22
પોસ્ટ
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અનુસરતા
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ફોલોઈંગ

Civil Engineer by Profession and Writer by Passion

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लहू-लुहान हैं जिस्म की पतंगे सारी डोर कोई रूहानी फेंकने दे। हक़ीक़त भले बेरंग दे दे ऐ मौला! मग़र ख्वाब रंगीन देखने दे।।

मैं भी वहीँ था वो भी वहीं थी मगर दूरियाँ फिर भी अड़े खड़ी थीं उसे कुछ कहना था मुझे भी कुछ सुनना था मगर न जाने क्यों? ये फासलों की दीवारें इतनी बड़ी थीं

I am tired of walking alone. Even my moon was gone. Please come back, and hold my hand. I'm sure together we'll make hell be a lively land. Be my SOULMATE.

रोज चाँद को खूबसूरत लिखता था आज उसके सामने वो भी फीका नज़र आया फ़लक, जमीं कुछ नहीं माँगता अब मैं उस ख़ुदा से उसकी निगाहों में जन्मों का साथ जो नज़र आया

वो भी कभी चन्द्रयान सी थी फिर कुछ हुआ यूँ सम्पर्क ही टूट गया अब सिर्फ दिखाई देती है बात नहीं होती

यादों के सहारे हम तो जी रहें हैं आज भी, एक-एक घूंट उस ज़हर का पी रहें हैं आज भी, रहते थे जहाँ तुम वो जगह अभी तक खाली है, लाख टांके लगाए मगर कटे दिल को सी रहे हैं आज भी।


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