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लबो पे जो...

लबो पे जो ख़ामोशी थी भीतर उसने बहुत शोर मचाया हुवा था लब भलेही खामोश थे पर वो आंखे भीतर मचे उस तूफान की गवाही देरही थी !

By Tejeshwar Pandey
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