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जहाँ "मैं"...

जहाँ "मैं" एवं "तुम" का कोई भेद नहीं होता, वहाँ "मेरे" सुख से "तुम" को खेद नहीं होता। जहाँ 'मैं" और "तुम" का अन्तर सम्पन्न हुआ, वहाँ "अद्वैत" का उचित स्वरूप उत्पन्न हुआ।

By Amit Singhal "Aseemit"
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