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अपने मानने...
“
अपने मानने एवं स्नेह करने वालों के बीच प्रायः हमारे अवगुण कहे-लिखे गए हम सुनते पढ़ते नहीं हैं। हमें अपने अवगुणों की पहचान एवं उन्हें दूर करने के पुरुषार्थ स्वयं करने होते हैं। राचमजै
”
By
Rajesh Chandrani Madanlal Jain
58
अवगुण
तनहासीजिंदगीमेंलोगभीबेगानेसेलगतेहैंअपनेपरायेकीपहचानमेंसभीअनजानेसेलगतेहैं
पुरुषार्थी
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Rajesh Chandrani Madanlal Jain
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