STORYMIRROR

Kavita Nandan

Others

4  

Kavita Nandan

Others

ज़मीर-ओ-ईमान

ज़मीर-ओ-ईमान

1 min
427

किसी वृक्ष के तने की तरह

अँकुओं की तरह फूटती हैं तमाम राहें

राहों से, जैसे

बुला रहा हो मुझे कोई

अपनी फैली हुई लंबी बाहों से।


बढ़ते रहते हैं मेरे कदम

अपनी मंज़िल की ओर

बिना रुके, कभी नहीं चाहता हूँ

ख़ुद से किए हुए वायदों को तोड़ना

नहीं क़बूल है कि किसी ख़ुद्दार का सिर झुके।


ज़मीर और ईमान का सौदा करने का

फायदा क्या है

बड़ी मुश्किल से थोड़ा-थोड़ा

समझ सका हूँ ज़िंदगी जीने का कायदा क्या है !



Rate this content
Log in

More hindi poem from Kavita Nandan