Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!
Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!

BLACKDIARY PREEYANEGI

Others


5.0  

BLACKDIARY PREEYANEGI

Others


सज़ा: ख़ुद को या सब को?

सज़ा: ख़ुद को या सब को?

1 min 165 1 min 165

जो सज़ा मुजरिमों को मिलती है

वो उसने दे दी थी ख़ुद को

आखिर किस गुनाह के लिए

ख़ुद को कोसता था

वो खुश था एक दिन पहले तक तो


रंगों से पूरा दिन खेलता था

ऐसा हुआ क्या उस पल में

कि दुनिया इतनी बदल गई

कि हँसी उसकी शांत लम्हों में बदल गई


वो बन सकता था रंगों की दुनिया का राजा

पैसा और नाम उससे कमा सकता था वो

अरे क्या ज़रूरत थी कायरता दिखाने की

कुछ अंकों के लिए ज़िन्दगी गवाने की


एक बार अपनी बनाई

कलाकृतियों को देखा होता

खुद पर ना सही उनकी ख़ूबसूरती पर

भरोसा किया होता

अरे मछली नहीं है उड़ती आकाश में

परिंदे समंदर की गहराई नाप नहीं सकते


अरे वो था सबसे अलग

उससे प्यार करते थे हम सब

आज कमी है उसकी खलती

पर उसने तो ज़िन्दगी ही खत्म कर दी


काश वो होता

पास में बैठ चाहे दिन भर रोता

चिल्लाता कोसता ख़ुद को

पर ये कैसी सज़ा दे गया है सबको


Rate this content
Log in

More hindi poem from BLACKDIARY PREEYANEGI