प्रत्येक पंखे की विनती
प्रत्येक पंखे की विनती
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पंखा हूँ मैं पंखा
सिर पटकूं क्या अपना?
मोटर से मैं चलता
तीन पर हैं लगे मेरे,
कभी ना मिलता मुझे आराम
थक-थक के हो जाता धड़ाम।
पंखा हूँ मैं पंखा
सिर पटकूं क्या अपना?
रात को जब सब सो जाते
चलता हूँ मैं रहता ,
सबको हवा मैं देता
पर कोई मुझे ना हवा देता।
पंखा हूँ मैं पंखा
सिर पटकूं क्या अपना?
बिजली जब चली है जाती
जमकर आराम मैं करता,
महत्व तब मेरा सबको समझ आ जाता
बदला मैं ले लेता।
पंखा हूँ मैं पंखा
सिर पटकूं क्या अपना?
एक विनती सबसे मेरी
पंखा बेवजह छोड़ो ना खुला,
बिजली बचाओ
भविष्य बचाओ।
