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rakhi KI duniya

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प्रेम

प्रेम

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प्रेम बहुत मनमोहक शब्द है।

जिसकी क्षमता को मापना आसान नहीं है।

क्योंकि प्रेम तो एक विशाल समुद्र की भाँति होता है

जिसका एक छोर से दूसरे छोर तक और उतना ही गहरा होता है।

प्रेम की परिभाषा तो व्यक्त करना बड़ा ही कठिन कार्य है

क्योंकि शब्दों में भी इसे नहीं माप सकते।

प्रेम चाहे मीरा और कृष्णा के प्रति हो...

जिसने अपने प्रेम के खातिर कब विष पी लिया, उसे अमृत समझ कर।

क्योंकि वो प्रेम के सागर में इतनी डूबी हुई थी

बिना गहराई को मापे उसने छालंग लगा दी।

प्रेम बड़ा पवित्र होता है... चाहे वो पति और पत्नी के प्रति हो...

या माता -पिता के... भाई और बहन के सब में प्रेम की पवित्रता छलकती है।

प्रेम किसी से भी हो सकता है।



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