STORYMIRROR

Siddhi Phatangade

Others

3  

Siddhi Phatangade

Others

चाह

चाह

1 min
359

ख़्वाहिश बहुत बड़ी नहीं थी उनकी

बस कुछ वक्त हमारा चाहते थे।


कुछ सुनाने की चाह उन्हें नहीं थी

बस हमारी बातों पे गौर करना चाहते थे।


वो कुछ लम्हों में हमें

सालों की यादें देना चाहते थे।


गुस्सा भी बड़ी शिद्दत से किया करते थे

पर मान जाने की चाह भी वो रखते थे।


ना जाने क्या देख लिया था हममें

जो अपना वक्त वो हमें देना चाहते थे।


शायद कैद इस पंछी को वो

आज़ाद देखना चाहते थे।


पर उनको क्या बताये

उनके साथ वो आज़ादी भी चली गई।


उनके साथ जो हसीन जिंदगी हमने जी ली

वो भी कुछ पलों में गुजर गई।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Siddhi Phatangade

चाह

चाह

1 min पढ़ें