बचपन एक अनमोल समय
बचपन एक अनमोल समय
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बचपन में थे हाथों में खिलौने,
अब है बस कागज़ात रे।
बचपन में तितली बन जीते,
अब अभिमान से मरते रे।
पहले रंगीन दुनिया में हम ,
फूल बन इठलाते रे।
अब बेरस दुनिया में हम,
कांटे बन पछताते रे।
पहले थी ऊपर आसमान,
और नीचे थी हरी ज़मीन।
अब ऊपर है पंखा,
और नीचे सब काम में लीन।
पहले था खुशियों का झूला,
जिंदगी थी मीठी नमकीन।
अब सांसारिक समस्याओं में,
इंसान कैसे रहे हसीन।
जाने न दो इस बचपन को
क्रोध, अभिमान, घृणा न हो
रंगों में खुशियाँँ मनाओ
क्योंकि यह बचपन वापस न हो
