आचरण
आचरण
सिखाया है आचरण मुझे माँ ने,
इसलिए चुप रहती हूँ मैं,
तुमसे मिले हर अपमान को
चुपचाप ही सहती हूँ मैं।
सिखाया है आचरण मुझे माँ ने,
इसलिए चुप रहती हूँ मैं।
अपनी खुशी से पहले,
खुशी तुम्हारी चुन लेती हूँ मैं,
सही होकर भी हमेशा,
नज़रों में तुम्हारी गलत होती हूँ मैं,
सिखाया है आचरण मुझे माँ ने,
इसलिए चुप रहती हूँ मैं।
मेरे औरत होने को,
समझते हो तुम मेरी कमज़ोरी,
क्योंकि तुम्हारे सारे अत्याचारों को,
खामोशी से सहती हूँ मैं,
सिखाया है आचरण मुझे माँ ने,
इसलिए चुप रहती हूँ मैं।
अपनों की ख़ुशियों के ख़ातिर,
जाने कितना कुछ सहती हूँ मैं,
दो कुलों की लाज हूँ ये सोचकर,
कुछ नहीं कहती हूँ मैं,
सिखाया है आचरण मुझे माँ ने,
इसलिए चुप रहती हूँ मैं।
औरत हूँ इसलिए,
अपनों के जज़्बात समझती हूँ मैं,
परिवार के अपने हालात समझती हूँ मैं,
तुम्हारी झूठी शान के ख़ातिर,
घुट-घुट कर जी लेती हूँ मैं,
सिखाया है आचरण मुझे माँ ने,
इसलिए चुप रहती हूँ मैं।
