STORYMIRROR

अपर्णा गुप्ता

Others

3  

अपर्णा गुप्ता

Others

कान्हा

कान्हा

1 min
187

मां तुझसे मेरी सुब ,

होती तुझसे शाम

तू मेरी मैया यशोदा

मैं तेरा घनश्याम


दिन भर मैं गैया चराऊँ

शाम ढले घर आऊँ

तू बस मेरी बाट निहारे 

द्वार खड़े तुझको पाऊँ


याद तेरी जब आये मुझको

वन मे बस मै बंसी बजाऊ

तेरे हाथ से माखन खाकर

मैया मै बलिहारी जाऊं


मैं तेरा घनश्याम हूं मैया

मैं ही तेरा श्याम

देख तेरी तनी भृकुटि

तेरे मन की समझ जाऊ


कर गलबहियां चुपके से तुझको

बस यूं ही मनाता हूं मैं

हाथ मे तेरे माखन मिश्री 

देख समझ जाता हूं मैं

होठों पर मुस्कान तेरी 


आंखों में गुस्सा रहता है

मन में तेरे मगर ओ मैया 

मुरली वाला रहता है।


Rate this content
Log in

More english poem from अपर्णा गुप्ता