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Hare Prakash Upadhyay

  Literary Captain

अधूरे प्रेम का अँधेरा

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मैं कायर था प्रिय अँधेरे से डरता था

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आत्मीयता

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मुझे तो निपटाने हैं काम अर्जेंट बहुत अगली बार आओ तो धूम मचाते हैं

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फेसबुक

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दोस्त चार हज़ार नौ सौ सतासी थे पर अकेलापन भी कम न था

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ख़याली पुलाव

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आओ ख़याली पुलाव पकाते हैं...

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रास्ते रोकने वाले

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तुम्हारी आक्रामकता बढ़ती जाती है तुम्हारे भीतर एक राक्षस अट्टाहास करने लगता है

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समय

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एक दौर में कई दौर हैं,  किसके हिस्से कौन-सा छोर आएगा,  यह सवाल कौन सुलझाएगा...?

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सपना

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बच्चे ने गेंद के बारे में सोचते हुऐ उस दु:ख के बारे में सोचा

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