Artist,writer,influencer
क्यों दया नहीं रही अब मन में? स्वार्थी भाव भरे हैं जन-जन में, क्यों दया नहीं रही अब मन में? स्वार्थी भाव भरे हैं जन-जन में,
कभी हो जाती गुम झोंको में, जैसे गुम हो नायक किस्से से, कभी हो जाती गुम झोंको में, जैसे गुम हो नायक किस्से से,
अनछूए ओस की बूंद सी मासूमियत कहां होती है भला। अनछूए ओस की बूंद सी मासूमियत कहां होती है भला।
कतरे-कतरे को तरसे, आज धरा के जन-गण, कतरे-कतरे को तरसे, आज धरा के जन-गण,
जन-जन के अंतर की दुविधा.. कैसे मिटाए क्षुधा.... कैसे मिटे क्षुधा. जन-जन के अंतर की दुविधा.. कैसे मिटाए क्षुधा.... कैसे मिटे क्षुधा.
शांत चित्त बनो, उन्मुक्त रहो, तोड़ो रंजिशों के विषैले बाण शांत चित्त बनो, उन्मुक्त रहो, तोड़ो रंजिशों के विषैले बाण
तू इतना निर्दयी क्यों है बना, सर से पांव तक स्वार्थ से सना, तू इतना निर्दयी क्यों है बना, सर से पांव तक स्वार्थ से सना,
मन का जामा रंगों, मन की चोली आत्मनिर्भर मनाओ होली......... मन का जामा रंगों, मन की चोली आत्मनिर्भर मनाओ होली.........
शोहरत, दौलत, रुतबा, सब हुए बेमाने से, करवटें ली है साल ने बेहद फरेबी। शोहरत, दौलत, रुतबा, सब हुए बेमाने से, करवटें ली है साल ने बेहद फरेबी।
चमचमाती पोशाकों में सज रहे अंध कूप, चमचमाती पोशाकों में सज रहे अंध कूप,