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Sharada Yadav

Others

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Sharada Yadav

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अल्हड़ तजुर्बा- भाग १

अल्हड़ तजुर्बा- भाग १

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बालकनी में पसरी गुनगुनी धूप में मटर छीलती हुई मां को सपना चाय की प्याली पकड़ा कर तेल की कटोरी लेकर धम से बैठ गई। मां मटर छोड़ चाय का घूंट लेकर उसके बालो में तेल भरी उंगलियां फिराने लगती है;

रसीले आंवला के अचार को देख सपना पूछ पड़ती है ,मां ये बन गया क्या? "मां "नहीं अभी नहीं बना ,एक दो दिन की कसर है अभी , बनते ही तुझे दूंगी ,जानती हूं तेरी लार टपक रही है इससे देख देख कर "।मां बेटी हस पड़े ।

अचार के रंग बिरंगे मर्तबान सफेद बालकनी की आभा को रंगीला बनाते और सपना के मुंह में पानी दे जाते।

देसी रंगो से महकती सपना के सपने भी उतने ही सीधे जान पड़ते थे लेकिन कहते है ना किस्मत के आगे किसी की नहीं चलती ।सपना के ख़यालो में विघ्न एक भारीभरकम आवाज ने डाला "जीजी ,अरे कहाँ हो ?"

चिरपरिचित आवाज जिसके बाद सपना को चाय बनाने जाना पड़ेगा ,सपना उठ खड़ी हुई ।

सुमन चाची का काम निपटा कर अब सपना के हाथ ही चाय पीने का समय हो गया था ।"अरी सुमन ,भीतर आ ,फुरसत मिल गई तुझे ,आ मटर छील मेरे साथ " ।

सपना की मां के पैर छूकर सुमन चाची मटर को थाली से उठा लेती है,और मटर को बिना देखे ही उनके हाथ मटर के की दाने चिलको से अलग करने लगते है ।

मां- "और तूने लड्डू बना लिए "

चाची -"अरे अभी कहा जीजी , कामवाली नहीं आयी थी आज तो मत पूछो। इन लोगों का भी आ ऐसा ही रहता है रोज का नया बहाना कभी पैसे चाहिए उसकी कहानी, कभी बच्चे की तबीयत का रोना ,इसीलिए तो तरक्की नहीं कर पाते ,बस बच्चे पैदा करते रहते हैं ।इतनी ठंड में गरम पानी से भी हाथ जम जावे है ,बर्तन घीसत घिसत"।

चौके में सपना चाय बनाते बनाते सुमन चाची का रोज का दुखड़ा किसी शोर की तरह ना चाहते हुए भी सुन रही थी ।चाय लेते हुए सपना पर निगाह डालती चाची बोली ," अब जीजी आपके यहां तो फिर भी सपना है ,तो हाथ तो भी बटा देती है। हमारा विवेक तो पानी भी उबाल ना पावे है ।अब लड़कों का तो तुम जाने ही हो ,जीजी ,लाड़ प्यार में बिगड़ जावे हैं।"

सपना कुछ तुनकती हुई पैर पटक कर अपने कमरे में चली गई ,किताब खोल कर बैठ गई ,पर दिमाग अपना ही वार्तालाप कर रहा था तो सोचा चलो शालिनी से बात कर लूं।थोड़ा दिमाग हटेगा इन बातों से फिर देखूंगी क्या करना है ।

इधर उधर की बातों में समय का पता ही ना चला ।सुमन चाची कबकी चली गई और मां धूप में ऊंघने लगी।सपना ,मां को जगाकर अचार का डब्बा खोलने लगी ।मां ने हाथ पर चपेड़ मार कर डब्बा बंद कर एक ओर रख दिया ।सपना - "मम्मी ,ये सुमन चाची रोज रोज क्यों आ जाती है ।" मां ने ठंडी सांस भरी, दुनियादारी खूब देख रखी है मां ने , उनको पता है  किसको कैसे संभालना है ,उनको सुमन की रग रग भी पता थी ,उनको पता था सुमन भी वक्त जरूरत में काम आती है और उसको बातें करना पसंद है ,या बोले तो अपना रोना सुनाना। कुछ सोचकर मुस्कुराती हुई उठ कर बोली ," जा में कौन सी बात हो गई ,तुझसे तो कोई नहीं सधता ,चल अब नहा कर पढ़ले ,मैं तो चली खाना बनाने।"

मां की ये छोटी सी बात का गूढ़ रहस्य अभी कहां सपना के पल्ले पड़ने वाला था।



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