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कुछ रिश्ते ऐसे भी
कुछ रिश्ते ऐसे भी
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© jyoti singh

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आज के दौर ने दोस्त या प्रेमी मिल जाना जितना आसान है उतना ही मुश्किल है भाई बहन जैसा प्यारा रिश्ता मिल जाना। मैं अपने घर में सबसे बड़ी और एकलौती लड़की हूँ। यहाँ तक की मेरे चाचाजी की भी कोई लड़की नहीं है। मेरे घर में मेरे चार भाई है लेकिन इन भाइयो के आलवा भी मेरे दो भाई है जिन्हें चाहे मुँहबोले कहिये या राखी भाई कहिये। मेरे लिये मेरे 6 भाई है।

मैं सातवी कक्षा में थी जब मेरे ये दो भाई बने थे। उस उम्र में मैंने कभी सोचा नहीं था कि ऐसे दो रिश्ते जिंदगी भर के लिये बन जायेंगे। एक तो मेरी ही कक्षा लेकिन दूसरे वर्ग में पढ़ते थे जिनका नाम अंकुर मावी है। आज अंकुर भैया एक सरकारी अधिकारी है। दूसरे भाई मेरे ही विद्यालय में अध्यापक थे और आज वो भारतीय रेल में अधिकारी है। उनका नाम राधारमण मिश्रा है।

अंकुर भैया से मेरी पहचान वैदिक गणित की प्रतियोगिता की तैयारी के दौरान हुयी थी। हम एक ही टीम का हिस्सा था। मैं पहली बार इस प्रतियोगिता में हिस्सा ले रही थी जबकि अंकुर भैया इससे पहले भी हिस्सा ले चुके थे। जब मैं उनसे पहली बार मिली थी तो मुझे पता ही नहीं था कि वो मेरी ही कक्षा के है तो मैं उनको भैया कहकर बुलाने लगी थी । हम तैयारी के समय कभी कभी गप्पे भी मारते थे। उन्हीं गप्पो के दौरान अंकुर भैया ने बोला की उनको एक बहन चाहिये थी पर उनकी की बहन नही है। उस बात पर मैं बड़ी मासूमियत से बोल पड़ी मैं हूँ न आपकी बहन और उस साल के विद्यालय के रक्षाबंधन के कार्यक्रम पर मैंने उनको पहली बार राखी बांधी थी। वो दिन है और आज का दिन है मैं हर साल उनको राखी बांधती आयी हूँ।हम आम हमउम्र भाई बहनों की तरह ही बड़े होते रहे। हमारे बीच भी झगड़े हुये और हमने बात करना भी बंद किया है। लेकिब हमारे झगड़े कभी भी हमारे रिश्ते पर कोई बुरा असर नही हुया उल्टा इससे हमारा रिश्ता मजबूत होता गया एक आम भाई बहनों की तरह ।

राधारमण भैया उसी साल हमारे विद्यालय में अध्यापक के पद पर नियुक्त हुये थे। वो हमें नहीं पढ़ाते थे। पहली बार उनसे परिचय तब हुया था जब वो एक विकल्प अध्यापक के तौर पर हमारी कक्षा में आये थे। उनके स्वभाव ने हम सभी का दिल जीत लिया था। वो सभी विद्याथियों में काफी लोकप्रिय थे। इसी कारण उस साल के विद्यालय के रक्षाबंधन के कार्यक्रम में लगभग सभी लड़कियों ने उन्हें राखी बांधी थी। मैं भी उनमें से ही एक थी। लेकिन मेरी जान पहचान भैया से ज्यादा प्रतियोगिता के लिये जब हम बहार गये तब बढ़ी थी। हमे प्रतियोगिता के मंडल और क्षत्रिय स्तर के लिए अलग अलग जिले और राज्य के विद्यालय में जाना होता था। उस समय हमारे साथ कुछ अध्यापक भी जाते थे। उनमें से एक राधारमण भैया थे। उस सफर के दौरान हम सभी काफी घुलमिल गये थे। अगले साल जब विद्यालय में रक्षाबंधन का कार्यक्रम हुया तब किसी ने भी भैया को राखी नहीं बांधी थी। मैंने भी नहीं बांधी थी। उस साल जो मेरे साथ हुआ था वह किसी के साथ नहीं हुया था। भैया ने मुझे टोका और बोला "तूने मुझे राखी नहीं बँधी" और उस समय मैं कुछ बोल ही नहीं पायी लेकिन इस वाक्य ने मेरे दिल में एक एहसास जगा दिया कि भैया मुझे अपनी बहन मनाते है। उस साल से मैं आज तक उनको राखी बांधती आ रही हूँ। हम अलग अलग शहर में रहते है पर हर रक्षाबंधन पर उनके हाथ में मेरी राखी जरूर बांधी होती है।

कहते है कच्ची उम्र के अनुभव गहरा निशान छोड़ जाते है। मेरे साथ भी हुया ये पर ये निशान बहुत सुंदर है। जिस उम्र में हमें रिश्तों की समझ नहीं होती उस उम्र में मुझे ऐसे दो खूबसूरत रिश्ते मिले है।



स्नेह रिश्ता भाई-बहन

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