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Rashmi Prabha

Children Stories

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Rashmi Prabha

Children Stories

वो भी क्या दिन थे !

वो भी क्या दिन थे !

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हाय क्या दिन थे वो भी क्या दिन थे ...

बचपन कहते हम भाई बहनों की शरारती चुलबुली आँखें दबे पाँव ढेर सारे किस्से लिए पास आ बैठती हैं, टप टप पलकें झपका पूछती हैं - कौन सी कहानी सुनाऊं ? और होठों पर एक लम्बी सी शरारती मुस्कान फैल जाती है ।

गर्मी की कहानी ? कौन सी गर्मी ? सावन के अंधे बचपन को सब हरा ही नज़र आता है तो हमें भी सिर्फ हरियाली नज़र आती थी, चिलचिलाती मीठी धूप जन्नत जैसी लगती थी। रहता था इंतज़ार पापा माँ के सोने का (खासकर पापा का ),और हम पीछे के दरवाज़े से बाहर निकल जाते थे। अमरुद के पेड़ पर बन्दर की तरह बैठे बस अमरुद की शक्ल लिए अमरुद को तोड़ खाते और चेहरे पर ऐसा भाव होता कि इससे मीठा अमरुद न कभी हुआ न होगा। कसैलेपन में भी गजब की मिठास होती थी, नंगे पाँव जलते नहीं थे, पसीने की बूंदों में कमाल का सौन्दर्य दिखता था।

हमारी सबसे प्यारी जगह कौन सी थी, ये भी पता नहीं .... समझिये इस गाने में भी सार्थकता थी- 'जहाँ चार यार मिल जाएँ वहीं रात हो गुलज़ार ...' आँगन, अमरुद का पेड़, पेड़ से छत, गोलम्बर पर चकवा चकिया ....... पापा जब लाल आँखें दिखाते तो कुप्पा किये गाल से हँसी फूटती थी और बढ़ता था पापा का गुस्सा और हमें लगता- पापा को समझ कम है ! हा हा हा

एक वाकया सुनाती हूँ अपना-

गर्मी की सुबह की मीठी शीतल हवा में क्या मज़े की नींद आती थी .. और पापा, मुर्गे की बांग के साथ उनकी आवाज़ सबको हिलाती,

'उठो उठो, सुबह को देखो' अरे क्या देखूं सुबह ! सब धीरे धीरे उठ जाते पर मुझे तो बन्द आँखों के सपनों से प्यार था तो कोई आवाज़ तब तक नहीं सुनाई देती थी, जब तक उसमें कठोरता न आ जाए, वैसे उसका भी कोई ख़ास डर नहीं था, सबसे छोटी जो थी- खैर ! पापा उठाते, मैं बरामदे में जाकर लम्बी कुर्सी पर सो जाती, उन्हें लगता मैं उठ गई हूँ और मैं सपनों में सूरज को भी चाँद बना उसके पास घूमती।

एक दिन हमेशा की तरह पापा ने उठने का सम्मन जारी किया और मैं बाहर की कुर्सी पर .... ओह लेटते मेरी चीख निकल गई - अम्माआआआआआआआआआअ ! मधुमख्खी थी कुर्सी पर और उसने मुझे काट लिया था, मैं आंसुओं से सराबोर और अब बारी थी पापा की ... हँसकर बोले, 'ठीक हुआ' .... सच कहूँ , बहुत गुस्सा आया था।

पर अंत में भी यही कहूँगी- हाय क्या दिन थे वो भी क्या दिन थे !



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