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Fairy flicka

Children Stories

4  

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“शिक्षा का आईना”

“शिक्षा का आईना”

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कक्षा में घंटी बजी। बोर्ड पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था – “Education is the key to success”.
पर अंजलि, जो बारहवीं की छात्रा थी, सोच रही थी – “अगर सचमुच यही key है… तो इतने सारे ताले क्यों टूटे बिना पड़े हैं? क्यों इतने लोग डिग्रियाँ लेकर भी बेरोज़गार घूम रहे हैं?”

अंजलि के क्लासमेट्स कल के टेस्ट के लिए रट्टा मार रहे थे। किसी ने कहा, “बस definitions याद कर लो, examiner को वही चाहिए।”किसी और ने हंसते हुए कहा, “अरे मार्क्स चाहिए न, knowledge किसे देखना है?”

यही हाल भारत के शिक्षा तंत्र का है। यहाँ ज्ञान नहीं, मार्क्स गिने जाते हैं। बच्चा चाहे cheating करके पास हो, समाज को फर्क नहीं पड़ता—बस नंबर आने चाहिए। भाषा भी subject बन चुकी है। चौदह साल अंग्रेज़ी पढ़ने के बाद भी बच्चे दो line नहीं बोल पाते।

क्लासरूम में टीचर ने बोर्ड पर एक केमिकल रिएक्शन लिखा:
“Na + Cl₂ → NaCl”
और कह दिया: “एग्ज़ाम के लिए इम्पॉर्टेन्ट है, याद कर लो।”

अंजलि ने अपने दोस्त से धीरे से कहा:
“ये तो गूगल पर दो सेकंड में मिल जाता है, फिर हम 14 साल तक स्कूल में क्यों पढ़ रहे हैं?”

दोस्त ने थकी हुई आवाज़ में जवाब दिया:
“भाई, यहाँ नॉलेज नहीं चाहिए, यहाँ सिर्फ़ मार्क्स चाहिए।”

लैब का कमरा स्कूल में था, पर स्टूडेंट्स को कभी अंदर नहीं जाने दिया गया। सिर्फ़ थ्योरी रटवाई जाती थी। चीन में उसके कज़िन ने एक वीडियो भेजा था जिसमें स्क्रीन पर लाइव केमिकल बॉन्ड बनते और टूटते दिखाए जा रहे थे। स्टूडेंट्स खुद लैब में एक्सपेरिमेंट करते थे। आरव ने वीडियो देखकर सोचा—“वहाँ बच्चे सीखते हैं, और यहाँ हम सिर्फ़ लिखते हैं।

चीन और भारत कभी शिक्षा के मामले में एक बराबर थे। लेकिन चीन ने primary education को मज़बूत बनाया—जहाँ पहले चार साल बच्चों की नींव मजबूत होती है, curiosity को पोषित किया जाता है। भारत ने IIT जैसे बड़े-बड़े कॉलेज खड़े किए, पर base ही खोखला रह गया।

भारत आज गर्व करता है कि यहाँ से “दुनिया के सबसे ज्यादा CEOs” निकलते हैं। मगर सवाल है—Founder क्यों नहीं निकलते? क्यूंकि सिस्टम बच्चों को startup या innovation के लिए नहीं, बल्कि (job)जॉब ढूँढने के लिए तैयार करता है। यहाँ बच्चों को employee mindset दी जाती है, न कि entrepreneur mindset।

अंजलि को याद आया, ग्यारहवीं में उसके कई दोस्त किताब की एक साधारण line तक सही से पढ़ नहीं पा रहे थे। फिर भी सब pass हो गए, क्योंकि system को बस “mark-sheet भरनी” थी। यही कारण है कि India में बेरोज़गारी (unemployment) चरम पर है।

विदेशों में बच्चे 16–17 साल की उम्र में part-time jobs करके दुनिया को समझते हैं। India में अगर कोई बच्चा waiter की job कर ले, तो माता-पिता को लगता है “इज़्ज़त चली जाएगी”. नतीजा—डिग्री मिलने तक बच्चे protected bubble में रहते हैं, असल जीवन की समझ नहीं बनती। और जब नौकरी नहीं मिलती, तो frustration और depression में कुछ बच्चे extreme कदम उठा लेते हैं।

Family pressure एक और जंजीर है। बच्चा चाहे जितना अच्छा artist हो, या musician, या sportsperson, parents अक्सर कहते हैं – “Engineer बनो, doctor बनो”. अपनी पसंद का career चुनने की आज़ादी शायद ही किसी को मिलती है।
अंजली का दोस्त आरव की बहन सिया की कहानी और भी दर्दनाक थी।
उसके सपने थे कि वह बाहर जाकर रोबोटिक्स पढ़े, नए-नए प्रयोग करे और दुनिया को कुछ नया दे।

लेकिन जब उसने अपने सपनों की बात घरवालों से कही, तो जवाब मिला:
“लड़की हो, घर के पास ही कॉलेज करो। बाहर जाने की ज़रूरत नहीं।”
 खासकर लड़कियों को तो higher studies या बाहर पढ़ने की अनुमति भी मुश्किल से मिलती है।

पर क्या ये हमेशा से ऐसा था?
नहीं।

5000 BC से पहले भारत का literacy rate करीब 100% था। गुरुकुल प्रणाली में बच्चे अपने गुरुओं के साथ रहते थे। materialistic चीज़ें पीछे छोड़कर, सिर्फ ज्ञान पर ध्यान। fast learner अपने pace से आगे बढ़ता था, slow learner को भी उतनी ही patiently पढ़ाया जाता था। subjects केवल गणित या भाषा नहीं, बल्कि  खगोलशास्त्र (Astronomy), चिकित्सा (Medicine), दर्शन (Philosophy), मनोविज्ञान (Psychology),योग, ध्यान, रक्षा तक थे। शिक्षा का उद्देश्य जीवन को समझना था, न कि केवल नौकरी पाना।

फिर आया 1835।
Lord Macaulay ने India का survey करवाया। जब उन्हें पता चला कि उत्तर भारत का literacy rate 97% और दक्षिण का 100% है, तो ब्रिटिश हिल गए। उन्होंने Education Act लाया, जहाँ सारा fund अंग्रेज़ी शिक्षा पर खर्च किया गया—भारतीय भाषाओं और गुरुकुल प्रणाली को धीरे-धीरे खत्म कर दिया गया।
उनका मक़सद साफ़ था—भारतीयों को नौकरी करने वाला बनाओ, सोचने वाला नहीं।

आज भी वही system चला आ रहा है। वही रट्टा, वही परीक्षा, वही डिग्री।
तो सवाल उठता है—
क्या भारत सचमुच अंग्रेज़ों से आज़ाद हुआ है? या हम अब भी उन्हीं की बनाई शिक्षा की जंजीरों में जकड़े हैं?

अंजलि खिड़की से बाहर देख रही थी। किताब उसके सामने थी, पर मन कहीं और।
उसने मन ही मन ठान लिया—

“मैं इस system को challenge करूंगी। मैं knowledge ढूँढूँगी, marks नहीं। और अगर हम सबने मिलकर ये सोच बदल दी… तभी सच्ची आज़ादी आएगी।”

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