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Rakesh Sahu

Children Stories

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Rakesh Sahu

Children Stories

फिर वो बचपन

फिर वो बचपन

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सोचता हूँ काश वो दिन लौट आते

जहाँ दोस्त सारे साथ ही साथ होते

आँगन में हँसी, छत पर शरारतें

और छोटी-छोटी बातों में बड़ी बातें


धूल भरे खेल, मिट्टी की ख़ुशबू

काँधे पे हाथ, और खुली हुई हँसी

वो खाली जेबें, फिर भी था संसार

एक गेंद, एक डोरी, और पूरा अपना यार


अब वो पल कहाँ, जो हाथ से फिसल गए

कितना भी चाहूँ, वो फिर से न मिलें

पर दिल के कोने में रखे हुए

उन सुनहरे दिनों के रंग तो खिले रहें


फिर वो बचपन

फिर वो बचपन

कहाँ से लाऊँ, फिर वो बचपन


फिर वो बचपन

फिर वो बचपन

बस यादों में चमके वो बचपन

अब तो सब अपने-अपने घरों में बस गए

नगर की गलियों में, गाँव की राहों से दूर

किसी के माथे पर जिम्मेदारियों का बोझ

किसी के सपनों में नई दुनिया का नूर


अब किसके पास है, वो पुराना समय

पन्ने पलटने को, बैठी हुई शाम

फिर भी कभी-कभी नामों के साथ

हँस पड़ती है मन में बचपन की शाम

वो टूटी पतंग, वो गीली सी सड़क

वो छुपन-छुपाई, वो देर तक जगना

जिन्हें ढूँढूँ तो बस यादें मिलें

और यादों में ही उनका लौटना

फिर वो बचपन

फिर वो बचपन

कहाँ से लाऊँ, फिर वो बचपन


फिर वो बचपन

फिर वो बचपन

बस यादों में चमके वो बचपन

अगर लौट न सकेवो दिन पुराने

तो दिल को मैं क्यों इतना रोकूँ

उन हँसी भरे सुनहरे लम्हों को

आँखों में रखूँ, और चुपचाप संजोऊँ


जो दूर गए, वो दूर नहीं

मेरे भीतर अब भी चलते हैं

वो दोस्त, वो गलियाँ, वो मासूम पल

आज भी मेरे साथ रहते हैं

फिर वो बचपन

फिर वो बचपन

कहाँ से लाऊँ, फिर वो बचपन


फिर वो बचपन

फिर वो बचपन

बस यादों में चमके वो बचपन


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