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मन बहुरूपिया है, कभी तो थाली में चांद देखकर भी खुश हो जाता ...
पिता सा दुनिया में कोई हो ही नहीं सकता । हर जिद्द ,हक ,दावा ...
भूख की बीमारी लाईलाज है फिर चाहे वह अनाज की हो या सत्ता की
बिमारीयों से पूछा कब छोड़ेगी मेरा साथ उन्होंने मुस्कुरा कहा ...
मेरे तजुर्बे ने तो यहां हर किसी के दर्द का बस इतना सा इलाज ...
भले ही वो हमसे झगड़े ना हमसे कभी मिलने आएं ग़र पड़ोसी मुसीब ...
आरजू जैसी बिमारी की दवा केवल सन्तोष ही है --कंचन प्रभा
कुछ ख़ास तो है तेरे मेरे रिश्ते में मेरे वीर... तू जो सारा ...
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