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शनिवार: ज़िं...
“
शनिवार: ज़िंदगी आम थी, नीरस ही तो थी। प्रकृति हो गई थी, रूष्ट और नाराज़ 3072021:10:34am
”
By
Sumit. Malhotra
247
ज़िंदगी
मराठीअसेआमुचीमायबोली
साथीतेराप्यार।
नीरस ही
प्रकृति
बांहों
गई थी
रुष्ठ
हमप्यारऔररिस्तोंकोकिसीकेदिलपरजबरदस्तीथोपनहीसकते।🌸अस्मिताप्रशांतपुष्पांजलि🌸
नाराज़
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Sumit. Malhotra
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